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मामले की पृष्ठभूमि और जनसांख्यिकीय तर्क (Demographic Reality)
- मामले की पृष्ठभूमि (मंगला भीमराव इंगले का मामला):महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले की काकोडा ग्राम पंचायत की चुनी हुई सरपंच मंगला इंगले को अक्टूबर 2024 में तीसरा बच्चा होने पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया था। अमरावती के अतिरिक्त आयुक्त और तत्पश्चात अगस्त 2025 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भी उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा था, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
- चीन का उदाहरण और प्रजनन दर में गिरावट (TFR below 2.1):अदालत ने उल्लेख किया कि 2003 के Javed निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने चीन की सख्त एक-बच्चा नीति (One-Child Policy) का उदाहरण दिया था। हालांकि, चीन ने 2015 में ही इस नीति को खत्म कर दिया और अब तीन बच्चे पैदा करने पर प्रोत्साहन (Incentives) दे रहा है। भारत की प्रजनन दर 1.9 हो चुकी है, जो प्रतिस्थापन दर (Replacement Rate – 2.1) से भी कम है।
- राज्यों का असंगत रुख (Amicus Curiae रिपोर्ट):मामले में नियुक्त न्यायमित्र (Amicus Curiae) अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 7 राज्यों ने दो-बच्चों के नियम को निरस्त (Repeal) कर दिया है, जबकि 15 राज्यों में ऐसी कोई नीति कभी लागू ही नहीं थी। केवल असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों में ही यह कानून अभी भी लागू है।
संवैधानिक व विधिक निष्कर्ष
1. अनुच्छेद 21 और प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy):
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी नागरिक को चुनाव लड़ने या जन-प्रतिनिधित्व का अधिकार देने के लिए उसके व्यक्तिगत/पारिवारिक निर्णयों (बच्चे पैदा करने) पर प्रतिबंध लगाना मौलिक अधिकारों का हनन है, जिसका सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से कोई तार्किक संबंध (Rational Connection) नहीं है।
2. जनसांख्यिकीय नीति में बदलाव:
यह फैसला दर्शाता है कि 20 साल पुराने विधिक सिद्धांतों को बदलते सामाजिक और जनसांख्यिकीय डेटा (Demographic Data) के आलोक में पुनः परखा जाना संवैधानिक जीवंतता (Living Constitution Concept) के लिए आवश्यक है।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अंतर्गत प्रजनन स्वायत्तता / Reproductive Autonomy का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार व ‘मनमानापन’ / Manifest Arbitrariness के विरुद्ध संरक्षण), महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 (Maharashtra Village Panchayats Act, 1959) की धारा 14(1)(j-1) (दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर पंचायत पद हेतु अयोग्यता), भारत में कुल प्रजनन दर (TFR) का प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से गिरकर 1.9 पर पहुंचना, तथा तीन-न्यायाधीशों की पीठ के ऐतिहासिक पूर्ववर्ती निर्णय जावेद बनाम हरियाणा राज्य [(2003) 8 SCC 369] के पुनर्परीक्षण पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत युगांतरकारी फैसला सुनाया है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा (Justice P.S. Narasimha) और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe) की खंडपीठ ने महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले (Mangala Bhimrao Ingle) को तीसरे बच्चे के जन्म पर अयोग्य ठहराने वाले बॉम्बे उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त/स्थगित करते हुए उन्हें पद पर बने रहने की अंतरिम अनुमति दी।
पीठ ने सुविचारित और दृढ़ मत व्यक्त करते हुए कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर नागरिकों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून अब पूरी तरह अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, क्योंकि जिस “अत्यधिक जनसंख्या के भय” (Fear of Overpopulation) पर यह नीति आधारित थी, वह भारत में पिछले दो दशकों के जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ढह चुका है।
खंडपीठ ने रेखांकित किया कि वर्ष 2003 में जब जावेद फैसले में इस पाबंदी को वैध ठहराया गया था, तब देश की प्रजनन दर 3.0 थी, जो अब गिरकर 1.9 रह गई है। अदालत ने माना कि यह कानून नागरिकों को “संतान पैदा करने” और “लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व” के बीच एक अमानवीय विकल्प चुनने के लिए विवश करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वतंत्रता पर सीधा आघात है। इस आधार पर खंडपीठ ने जावेद (2003) के फैसले पर पुनर्विचार हेतु मामले को बड़ी पीठ (Larger Bench) को संदर्भित कर दिया।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘जनसंख्या विस्फोट का भय ढह चुका है; TFR 2.1 से नीचे गिरकर 1.9 रह गई’:
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा द्वारा उच्चारित निर्णय में खंडपीठ ने जनसांख्यिकीय बदलावों का विस्तृत विश्लेषण करते हुए दर्ज किया: *”हमारा यह दृढ़ और स्पष्ट मत है कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंडित या अयोग्य घोषित करने वाले कानूनों ने अपनी प्रासंगिकता पूरी तरह खो दी है (Laws that penalise having more than two children have lost their relevance)। ऐसे कानूनों की बुनियादी नींव—अर्थात अत्यधिक जनसंख्या का भय (Fear of overpopulation)—पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण पूरी तरह ढह चुकी है। हमने विस्तार से स्पष्ट किया है कि वर्ष 2003 में, जब जावेद बनाम हरियाणा राज्य में ऐसे कानूनों को संवैधानिक ठहराया गया था, तब से अब तक भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 3.0 से गिरकर 1.9 पर आ चुकी है।
2.1 की कुल प्रजनन दर को ‘प्रतिस्थापन दर’ (Replacement Rate) माना जाता है, जो बिना प्रवास के एक पीढ़ी को पूरी तरह प्रतिस्थापित करने हेतु आवश्यक है। भले ही जनसंख्या अभी घटनी शुरू न हुई हो, किंतु प्रतिस्थापन दर से नीचे TFR जाना भारत को तेजी से एक वृद्ध समाज (Ageing Population) और घटती कामकाजी आबादी (Declining Working-age Share) की ओर धकेलेगा। यदि हम इस बदलाव को दर्ज करने में विफल रहे, तो देश को गंभीर जनसांख्यिकीय संकट का सामना करना पड़ेगा।”*
2. ‘प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और लोकतांत्रिक अधिकार के बीच अनुचित विकल्प’:
- पीठ ने जावेद निर्णय के तर्कों को मनमाना ठहराते हुए टिप्पणी की:*”जावेद मामले में एक प्रत्यक्ष रूप से मनमाने कानून (Manifestly Arbitrary Act) को सही ठहराने के लिए अपनाए गए तर्क समान रूप से चिंताजनक हैं।ऐसे कानून को कायम रखने की अनुमति देना नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से केवल ऐसे आधार पर बाहर करता है, जिसका सार्वजनिक पद धारण करने की उनकी क्षमता या योग्यता से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है।इसके अतिरिक्त, यह कानून नागरिकों को ‘संतान पैदा करने’ और ‘लोकतांत्रिक भागीदारी’ के बीच एक अमानवीय व अंतरात्मा के विरुद्ध विकल्प (Unconscionable choice between bearing children and democratic participation) चुनने को विवश करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) के अधिकार पर सीधा अतिक्रमण है। यह स्थिति हमें कार्यवाही स्थगित करने और संदर्भ बड़ी पीठ को भेजने के लिए विवश करती है।”*
3. चीन और वैश्विक जनसांख्यिकीय विफलताओं का उल्लेख:
- अदालत ने रेखांकित किया कि जावेद मामले में चीन की ‘एक-बच्चा नीति’ (One-Child Policy) को सख्त जनसंख्या नियंत्रण के सफल उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया था।
- खंडपीठ ने कहा कि चीन ने भी अपनी उस नीति के विनाशकारी परिणाम (वृद्ध आबादी और युवाओं की कमी) देखकर 2015 में इसे खत्म किया, दो बच्चों की अनुमति दी और 2021 में तीन बच्चों के लिए प्रोत्साहन देना शुरू किया। इसी प्रकार जापान में घटती प्रजनन दर, कर्ज और स्वास्थ्य खर्च का उदाहरण यह साबित करता है कि जनसंख्या घटाने के लिए दंडात्मक कानून बनाना देश के आर्थिक भविष्य को पंगु बना सकता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2000–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार) |
| पीठ | न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा (Justice PS Narasimha) एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe) |
| निर्णय की तिथि | 4 नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | मंगला भीमराव इंगले बनाम अपर आयुक्त, अमरावती संभाग व अन्य [Civil Appeal / SLP (C) No. … / 2025-2026] |
| अपीलकर्ता | मंगला भीमराव इंगले (Mangala Bhimrao Ingle) — ग्राम पंचायत काकोडा (बुलढाणा, महाराष्ट्र) की पूर्व निर्वाचित सरपंच। |
| अपीलकर्ता के अधिवक्ता | अधिवक्ता प्रतीक बोंबार्डे (Advocate Pratik Bombarde)। |
| अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमित्र | वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे (Advocate Rukmini Bobde) — एमिकस क्यूरी। |
| मूल अधिनियम व आक्षेपित धारा | महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) [13 सितंबर 2000 को संशोधित], जिसके अनुसार कट-ऑफ तारीख के बाद दो से अधिक संतान होने पर व्यक्ति पंचायत सदस्य या सरपंच रहने के अयोग्य हो जाता है। |
| प्रशासनिक व उच्च न्यायालय की कार्यवाही | • अक्टूबर 2024: अपर कलेक्टर, बुलढाणा ने शिकायत पर संज्ञान लेकर मंगला इंगले को सरपंच पद से अयोग्य घोषित किया। • अपर आयुक्त, अमरावती संभाग ने अपील खारिज की। • 5 अगस्त 2025: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने दोनों आदेशों को बरकरार रखते हुए कहा कि नगर निगम का जन्म प्रमाण पत्र सार्वजनिक दस्तावेज है और सरपंच यह साबित करने में विफल रहीं कि तीसरा बच्चा उनका नहीं है। |
| सुप्रीम कोर्ट का पूर्व रुख (2025) | 4 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी और प्रारंभिक सुनवाई में इस दो-बच्चा नीति को “व्यर्थ/अप्रासंगिक” (Useless Policy) बताया था। |
| 4 नवंबर 2026 का अंतिम आदेश | • अपीलकर्ता की अयोग्यता पर रोक बरकरार रखी गई; उन्हें सरपंच पद पर कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई। • जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) के तीन-न्यायाधीशों के निर्णय की संवैधानिक वैधता और दो-बच्चा अयोग्यता नियम को बड़ी संविधान पीठ (Larger Bench) को संदर्भित किया गया। |
राज्यों में दो-बच्चा नीति की वर्तमान स्थिति (एमिकस क्यूरी रुक्मिणी बोबडे की संकलित रिपोर्ट)
अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी रुक्मिणी बोबडे द्वारा देश के सभी राज्यों के कानूनों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि देश में कोई एकरूप दृष्टिकोण नहीं है:
| विधिक वर्गीकरण | राज्यों की संख्या | संबंधित राज्य / संघ राज्य क्षेत्र |
|---|---|---|
| दो-बच्चा अयोग्यता नियम समाप्त करने वाले राज्य | 7 राज्य | मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा (आंशिक संशोधन), राजस्थान (संशोधित), हिमाचल प्रदेश आदि। |
| जहाँ कभी यह नियम लागू ही नहीं हुआ | 15 राज्य | केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, पंजाब, उत्तर प्रदेश (पंचायत स्तर पर लागू नहीं) आदि। |
| जहाँ आज भी यह दंडात्मक नियम लागू है | 6 राज्य | महाराष्ट्र, गुजरात, असम, ओडिशा, उत्तराखंड एवं गोवा। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और अनुच्छेद 21’
- ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ (2003) और बदले हुए विधिक मानक:
- 2003 में न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 की दो-बच्चा शर्त को यह कहते हुए वैध माना था कि चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक सांविधिक अधिकार (Statutory Right) है। अदालत ने जनसंख्या नियंत्रण को राष्ट्रीय दायित्व माना था।
- न्यायमूर्ति नरसिम्हा की पीठ ने इस तर्क पर गंभीर प्रश्न उठाया है। अदालत ने कहा कि यद्यपि चुनाव लड़ना सांविधिक है, किंतु राज्य ऐसी शर्तें नहीं थोप सकता जो नागरिक के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता) को बंधक बना दे।
- ‘पुट्टास्वामी’ [(2017) 10 SCC 1] और प्रजनन स्वतंत्रता का संवैधानिक दर्जा:
- 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने के.एस. पुट्टास्वामी (निजता का अधिकार) और बाद में एक्स बनाम प्रधान सचिव, दिल्ली सरकार (2022 – गर्भपात अधिकार) में यह सुस्थापित किया है कि महिला का अपने शरीर, मातृत्व और कितने बच्चे पैदा करने हैं, इसका निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक अखंडता (Bodily Integrity) और व्यक्तिगत स्वायत्तता का गैर-हस्तांतरणीय हिस्सा है।
- किसी महिला को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरपंच बनने से केवल इसलिए वंचित कर देना क्योंकि उसने तीसरे बच्चे को जन्म दिया है, लैंगिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता के विपरीत है।
- जनसांख्यिकीय वास्तविकता: भारत का आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26:
- पीठ ने भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों को संज्ञान में लिया:
- वर्ष 2014 में 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों की हिस्सेदारी 8.3% थी, जो 2024 में बढ़कर 9.7% हो गई है और 2036 तक 15% होने का अनुमान है।
- भारत की कुल प्रजनन दर 1.9 हो चुकी है। शिक्षा के प्रसार, विलंबित विवाह और गर्भनिरोधकों के उपयोग से आबादी स्वाभाविक रूप से स्थिर हो रही है।
- ऐसे समय में 20-30 साल पुराने दंडात्मक जनसंख्या कानूनों को बनाए रखना एक वृद्ध होते देश के लिए आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से आत्मघाती है।
- पीठ ने भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों को संज्ञान में लिया:
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: मंगला भीमराव इंगले बनाम अपर आयुक्त, अमरावती संभाग व अन्य [Civil Appeal No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा (Justice PS Narasimha) एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe)
- निर्णय की तिथि: 4 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: अपील स्वीकार; बॉम्बे उच्च न्यायालय का अयोग्यता आदेश स्थगित/निरस्त; जावेद (2003) के पुनर्परीक्षण हेतु मामला बड़ी पीठ (Larger Bench) को संदर्भित। Outlook India
विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (सरपंच मंगला इंगले) की ओर से: अधिवक्ता प्रतीक बोंबार्डे (Advocate Pratik Bombarde)।
- अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे (Advocate Rukmini Bobde)।
- महाराष्ट्र राज्य की ओर से: राज्य के स्थायी विधि अधिकारी।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन, दैहिक स्वतंत्रता एवं प्रजनन स्वायत्तता), अनुच्छेद 14 (समानता एवं मनमानेपन पर रोक), एवं अनुच्छेद 243F (पंचायत सदस्यता हेतु अयोग्यताएं)
- महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 (Maharashtra Village Panchayats Act, 1959) — धारा 14(1)(j-1) (दो से अधिक संतान होने पर अयोग्यता)
- हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 — धारा 175(1)(q)
- पूर्ववर्ती संविधान पीठ नज़ीर — जावेद बनाम हरियाणा राज्य [(2003) 8 SCC 369] (पुनर्विचार हेतु संदर्भित) Outlook India
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रजनन स्वायत्तता, जनसांख्यिकीय संक्रमण और चुनावी अयोग्यता का विधिक मानक: ‘दो से अधिक बच्चे होने के आधार पर नागरिकों को स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने या सार्वजनिक पद धारण करने से अयोग्य घोषित करने वाले कानून जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के चलते अपनी प्रासंगिकता और औचित्य खो चुके हैं; जब देश की कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन दर 2.1 से नीचे गिरकर 1.9 पर पहुंच चुकी हो, तब अत्यधिक जनसंख्या के कल्पित भय के आधार पर दंडात्मक कानून बनाए रखना मनमाना है; किसी भी नागरिक को लोकतांत्रिक भागीदारी और अपनी पसंद से संतान पैदा करने के बीच चयन करने के लिए बाध्य करना अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और निजता के मौलिक अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है; पंचायत प्रतिनिधि के रूप में सेवा करने की योग्यता का व्यक्ति के बच्चों की संख्या से कोई तर्कसंगत संबंध (Rational Nexus) नहीं है; तथा 2003 के ‘जावेद’ निर्णय में अपनाए गए तर्कों का आधुनिक संवैधानिक न्यायशास्त्र और वर्तमान जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के आलोक में एक बड़ी संविधान पीठ द्वारा पुनर्परीक्षण किया जाना अपरिहार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) अब जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) के फैसले की समीक्षा हेतु कम से कम 5-न्यायाधीशों की एक वृहद संविधान पीठ का गठन करेंगे; यह बड़ी पीठ तय करेगी कि क्या महाराष्ट्र, गुजरात, असम, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में आज भी लागू दो-बच्चा अयोग्यता कानून असंवैधानिक और शून्य घोषित किए जाने योग्य हैं।
Two Child Rule:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति अलोक अराधे |
| केस/याचिकाकर्ता | मंगला भीमराव इंगले बनाम अपर आयुक्त, अमरावती मंडल व अन्य (Mangala Bhimrao Ingle v. The Additional Commissioner, Amravati Division & Ors) |
| मूल विवाद | तीसरा बच्चा होने पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत महिला सरपंच का अयोग्यता का आदेश। |
| पुनर्विचार हेतु संदर्भित नजीर | Javed v. State of Haryana (2003) – 3-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दो बच्चों के नियम को वैध ठहराया गया था। |
| अदालत का अंतिम आदेश | 1. सरपंच का निलंबन रद्द: याचिकाकर्ता मंगला इंगले की अयोग्यता की कार्यवाही पर रोक लगाई गई। 2. बड़ी पीठ को संदर्भ: 2-चाइल्ड नॉर्म की संवैधानिक वैधता और Article 21 (प्रजनन स्वायत्तता) पर अंतिम फैसले हेतु मामला बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजा गया। |

