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मामले की पृष्ठभूमि और संवैधानिक तर्क
- फर्जी नोटिस और धारा 356 BNS का बेजा इस्तेमाल:याचिकाकर्ताओं को मिले एक नोटिस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के खिलाफ मानहानिकारक सामग्री पोस्ट करने का आरोप लगाया गया था और भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 (Section 356 BNS) [आपराधिक मानहानि] का हवाला दिया गया था। दूसरे नोटिस के जरिए IFF, SFLC और ‘Geo Blocked in India’ सहित 40 URLs और संपूर्ण सोशल मीडिया अकाउंट्स को ब्लॉक करने की मांग की गई थी।
- याचिकाकर्ताओं की दलीलें (Article 19(1)(a)):वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल के नेतृत्व में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि आपराधिक मानहानि एक असंगेय अपराध (Non-Cognisable Offence) है, और पुलिस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना इसकी जांच या सीधे अकाउंट बंद करने के निर्देश नहीं दे सकती। संपूर्ण संस्थागत अकाउंट्स को बंद करने की मांग अत्यधिक असंगत (Disproportionate) थी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन थी।
- ईमेल डिलीवरी बाउंस व सत्यापन में विफलता:SFLC ने अपनी याचिका में खुलासा किया था कि जब उन्होंने दिल्ली पुलिस और X Corp को नोटिस की प्रामाणिकता की पुष्टि के लिए ईमेल भेजे, तो ईमेल “अवितरित” (Undeliverable) होकर वापस आ गए। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल (IFSO) से भी कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला था, जिसके बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था।
मुख्य विधिक व डिजिटल राइट्स निष्कर्ष
1. डिजिटल टेकडाउन प्रक्रिया और सत्यापन (Digital Takedown Verification):
यह घटना उजागर करती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पुलिस या सरकारी एजेंसियों से प्राप्त ब्लॉक/टेकडाउन नोटिसों के क्रियान्वयन से पहले उनकी प्रामाणिकता और आधिकारिक चैनलों का कड़ा सत्यापन करना अनिवार्य है, ताकि किसी तीसरे पक्ष द्वारा कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर अभिव्यक्ति की आजादी को न दबाया जा सके।
2. संपूर्ण अकाउंट ब्लॉकिंग पर संवैधानिक सीमाएं:
याचिकाकर्ताओं का यह तर्क पुनः प्रासंगिक हो जाता है कि धारा 69A IT Act या आपराधिक जांच के बहाने किसी संगठन के पूरे सोशल मीडिया अकाउंट को ब्लॉक करना असंवैधानिक है, जब तक कि केवल विशिष्ट गैर-कानूनी सामग्री (Specific Content) पर ही लक्षित कार्रवाई न की जाए।
नई दिल्ली: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) की धारा 69A (ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की केंद्र सरकार की वैधानिक शक्तियां) व धारा 79 (मध्यवर्ती संरक्षण / Intermediary Safe Harbour), सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 356 (आपराधिक मानहानि / Criminal Defamation—असंज्ञेय अपराध), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 174 (असंज्ञेय अपराधों में बिना मजिस्ट्रेट आदेश के पुलिस जांच पर रोक), तथा भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) व अनुच्छेद 21 के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष सोशल मीडिया अकाउंट्स को अवैध रूप से ब्लॉक कराने की गंभीर धोखाधड़ी का मामला सामने आया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) की एकल पीठ के समक्ष सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर — X Corp) के विधिक परामर्शदाता ने शुक्रवार को आधिकारिक बयान देते हुए स्पष्ट किया कि डिजिटल अधिकार संस्थाओं—इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (Internet Freedom Foundation – IFF) और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (Software Freedom Law Centre – SFLC.in)—के सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक करने हेतु दिल्ली पुलिस के नाम पर जो नोटिस भेजे गए थे, वे पूरी तरह फर्जी थे और उन्हें किसी धोखेबाज/ढोंगी (Imposter) द्वारा दुर्भावनापूर्ण तरीके से भेजा गया था।
एक्स (X) के वकील ने पीठ को आश्वस्त किया कि उनकी आंतरिक जांच में इस फर्जीवाड़े की पुष्टि हो चुकी है और इसके विरुद्ध दिल्ली पुलिस में औपचारिक आपराधिक शिकायत दर्ज करा दी गई है; साथ ही यह स्पष्ट किया कि IFF और SFLC के सोशल मीडिया खातों को बिल्कुल भी नहीं हटाया/ब्लॉक किया जाएगा। एक्स द्वारा दिए गए इस बयान और आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए न्यायमूर्ति अमित महाजन ने दोनों संस्थाओं द्वारा दायर रिट याचिकाओं को अंतिम रूप से निस्तारित (Disposed of) कर दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही एवं X कॉर्प का आधिकारिक पक्ष
1. X का बयान: ‘आंतरिक जांच में फर्जीवाड़े का खुलासा; दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज’:
न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ के समक्ष एक्स (X) के अधिवक्ता ने औपचारिक रूप से अदालत को अवगत कराया: “यह किसी धोखेबाज (Imposter) का कृत्य था। हमने इस मामले में आंतरिक जांच (Internal Investigation) की है और यह निष्कर्ष निकला है कि यह नोटिस दिल्ली पुलिस द्वारा नहीं बल्कि किसी बहरूपिए/ढोंगी द्वारा भेजा गया था।
हमने इस फर्जीवाड़े के संबंध में दिल्ली पुलिस के समक्ष औपचारिक आपराधिक शिकायत दर्ज करा दी है। हम न्यायालय को आश्वस्त करते हैं कि IFF और SFLC के सोशल मीडिया हैंडल्स को नहीं हटाया जाएगा (Handles will not be taken down)।”
2. याचिकाओं का निस्तारण:
- चूंकि याचिकाकर्ताओं की मुख्य आशंका उनके खातों और पोस्ट्स के अनधिकृत ब्लॉकिंग को लेकर थी और एक्स ने खातों को सुरक्षित रखने का आश्वासन दे दिया, इसलिए अदालत ने याचिकाओं को आगे लंबित रखने का कोई औचित्य न पाते हुए उन्हें विधिवत निस्तारित कर दिया।
फर्जी नोटिसों की सामग्री और याचिकाओं के मुख्य कानूनी आक्षेप
1. फर्जी नोटिसों का दायरा:
- आरएसएस (RSS) के खिलाफ मानहानि का मनगढ़ंत आरोप: नोटिसों में यह झूठा आरोप लगाया गया था कि इन संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विरुद्ध अपमानजनक सामग्री प्रकाशित की है, और इसके लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 (आपराधिक मानहानि) का हवाला दिया गया था।
- 40 यूआरएल और 3 पूरे अकाउंट्स को बंद करने की मांग: दूसरे नोटिस में 37 व्यक्तिगत पोस्ट्स और 3 प्रमुख संस्थाओं के पूरे आधिकारिक एक्स अकाउंट्स—IFF, SFLC और Geo Blocked in India—को पूर्णतः ब्लॉक करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही विवाद पर टिप्पणी करने वाले 16 अन्य उपयोगकर्ताओं के पोस्ट हटाने की भी मांग की गई थी।
2. याचिकाकर्ताओं के मुख्य विधिक तर्क (वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल द्वारा):
- आपराधिक मानहानि असंज्ञेय अपराध (Non-Cognisable Offence):
- BNS की धारा 356 (पूर्ववर्ती IPC 499/500) एक असंज्ञेय अपराध है। कानूनन (BNSS धारा 174 / CrPC धारा 155), पुलिस असंज्ञेय अपराधों में न्यायिक मजिस्ट्रेट के पूर्व आदेश (Magistrate’s Order) के बिना न तो जांच कर सकती है और न ही किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को नोटिस जारी कर सकती है।
- अनुपातिकता का अभाव और अनुच्छेद 19(1)(a) का हनन:
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि किसी विशिष्ट पोस्ट पर कोई कानूनी आपत्ति थी, तो उसके लिए पूरे के पूरे आधिकारिक अकाउंट को ही बंद (Blanket Takedown of Entire Accounts) करने की मांग करना अत्यधिक असंगत, अनुचित और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का घोर हनन है।
- सत्यापन में विफलता और विधिक शून्यता:
- SFLC ने अपनी याचिका में बताया कि जब उन्हें इस नोटिस की भनक लगी, तो उन्होंने दिल्ली पुलिस और एक्स कॉर्प से संपर्क कर इसकी प्रामाणिकता जांचने की कोशिश की। किंतु नोटिस में लिखे ईमेल पते पर भेजे गए ईमेल “डिलीवर नहीं हो सके” (Undeliverable) के रूप में वापस आ गए।
- SFLC ने दिल्ली पुलिस की साइबर सेल—इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस यूनिट (IFSO Unit)—से भी संपर्क किया था, किंतु याचिका दाखिल होने तक पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) (एकल पीठ) |
| निर्णय / आदेश की तिथि | 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार) |
| केस संदर्भ | इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन व अन्य बनाम भारत संघ, दिल्ली पुलिस व एक्स कॉर्प [W.P.(C) … / 2026] |
| याचिकाकर्ता पक्ष | 1. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (Internet Freedom Foundation – IFF) 2. सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC.in) — डिजिटल अधिकार, निजता और ओपन-सोर्स की प्रमुख संस्थाएं। |
| याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल (Senior Advocate Akhil Sibal)। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. भारत संघ (इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय – MeitY) 2. दिल्ली पुलिस आयुक्त (साइबर क्राइम सेल / IFSO) 3. एक्स कॉर्प (X Corp) (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म)। |
| विवाद का मूल उद्भव | सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स को दिल्ली पुलिस के आधिकारिक लेटरहेड/नाम से नोटिस प्राप्त हुए थे, जिनमें दावा किया गया था कि IFF, SFLC और ‘Geo Blocked in India’ द्वारा आरएसएस के खिलाफ मानहानिकारक सामग्री पोस्ट की जा रही है, अतः BNS 356 के तहत उनके पूरे अकाउंट्स और 40 यूआरएल को तत्काल ब्लॉक किया जाए। |
| याचिकाकर्ताओं का विधिक रुख | याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर इन नोटिसों को अधिकार-विहीन, गैर-कानूनी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताते हुए रद्द करने की मांग की थी। |
| एक्स कॉर्प (X) का अंतिम खुलासा | एक्स ने आंतरिक जांच पूरी करने के बाद अदालत में स्वीकार किया कि नोटिस भेजने वाला कोई अज्ञात बहरूपिया (Imposter) था, दिल्ली पुलिस नहीं। एक्स ने खातों को न हटाने का वचन दिया और दोषी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। |
| न्यायालय का अंतिम आदेश | एक्स के आश्वासन के आधार पर रिट याचिकाएं निस्तारित (Disposed of) की गईं। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘आईटी एक्ट धारा 69A, असंज्ञेय अपराध और डिजिटल प्रतिरूपण’
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A की विधिक प्रक्रिया:
- देश की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर किसी ऑनलाइन सामग्री या सोशल मीडिया अकाउंट को ब्लॉक करने की शक्ति केवल आईटी अधिनियम की धारा 69A और आईटी (ब्लॉकिंग रूल्स), 2009 के तहत केंद्र सरकार के नामित नोडल अधिकारी (Designated Officer) के पास है।
- कोई भी राज्य पुलिस या स्थानीय थाना सीधे किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को पूरा अकाउंट सस्पेंड करने का निर्देश नहीं दे सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ [(2015) 5 SCC 1] में स्पष्ट किया था कि ब्लॉकिंग आदेश जारी करने से पूर्व समीक्षा समिति द्वारा सुनवाई और कारण दर्ज करना अनिवार्य है।
- आपराधिक मानहानि (BNS 356) का दुरुपयोग और कानून की प्रक्रिया:
- आपराधिक मानहानि एक गैर-संज्ञेय अपराध है, जिसमें कानूनी उपचार यह है कि पीड़ित व्यक्ति सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी आपराधिक शिकायत (Private Complaint under BNSS Section 223 / CrPC Section 200) दाखिल करे।
- पुलिस का नाम भुनाकर सोशल मीडिया कंपनियों को धमकाना और संस्थाओं की आवाज दबाने के लिए मानहानि का सहारा लेना कानून के शासन के साथ खुला खिलवाड़ है।
- सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (Intermediaries) की तकनीकी लापरवाही:
- इस घटना ने ‘एक्स’ जैसी वैश्विक टेक कंपनियों के आंतरिक अनुपालन और सत्यापन तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
- यदि कोई ढोंगी आधिकारिक सरकारी डोमेन (जैसे
@delhipolice.gov.inया@nic.in) के बिना सामान्य फर्जी ईमेल से नोटिस भेजता है और मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म बिना प्राथमिक तकनीकी सत्यापन के प्रमुख कानूनी संस्थाओं के खातों को सस्पेंड करने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं, तो यह साइबर सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के लिए अत्यंत खतरनाक है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
- केस संदर्भ: इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन व अन्य बनाम भारत संघ, दिल्ली पुलिस व एक्स कॉर्प [Writ Petition (Civil) / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
- कार्यवाही का परिणाम: एक्स (X) द्वारा फर्जीवाड़े की पुष्टि करने और खाते ब्लॉक न करने के आश्वासन के बाद रिट याचिकाएं निस्तारित (Disposed of)।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (IFF व SFLC) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल (Senior Advocate Akhil Sibal)।
- SFLC की ओर से अधिवक्तागण: नकुल गांधी (Advocate-on-Record), जयंत, अनुष्का खेतान, कबीर दर्शन सिंह, प्रशांत सुगाथन एवं नयन ग्रोवर।
- IFF की ओर से अधिवक्तागण: अभीक चिमनी, प्रांजल अब्रोल, प्रज्ञा जैन, ऋषभ रंजन, साहिल मंडेर, गुरुपाल सिंह, अयान दासगुप्ता, मोक्षा शर्मा, यशप्रिया सहारण एवं राहुल।
- प्रतिवादी ‘एक्स’ (X Corp) की ओर से: एक्स के वरिष्ठ स्थायी अधिवक्तागण।
- प्रतिवादी भारत संघ (Union of India) की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता (CGSC) आशीष दीक्षित (Ashish Dixit)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — धारा 69A (सामग्री ब्लॉकिंग की शक्ति), धारा 66D (कंप्यूटर संसाधन से प्रतिरूपण/धोखाधड़ी) एवं धारा 79
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — धारा 356 (आपराधिक मानहानि) एवं धारा 319/336 (प्रतिरूपण द्वारा छल)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 174 (असंज्ञेय मामलों में सूचना व जांच सीमा)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल प्रतिरूपण, सोशल मीडिया इंटरमीडियरी और विधि सम्मत प्रक्रिया का मानक: ‘जांच एजेंसियों या पुलिस के नाम का दुरुपयोग कर किसी बहरूपिए (Imposter) द्वारा सोशल मीडिया मध्यवर्तियों को नोटिस भेजकर डिजिटल अधिकार संस्थाओं के खातों को ब्लॉक कराने का कृत्य विधि की स्थापित प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) पर एक गंभीर प्रहार है; सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का यह वैधानिक दायित्व है कि वे किसी भी वैधानिक आदेश या नोटिस पर कार्रवाई करने से पूर्व उसकी सत्यता और उत्पत्ति का पुख्ता सत्यापन करें; आपराधिक मानहानि (BNS 356) जैसे असंज्ञेय मामलों में बिना सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश के खातों को हटाने का कोई वैधानिक प्राधिकार किसी एजेंसी के पास नहीं है; तथा विधि सम्मत प्रक्रिया (Due Process) के अभाव में संपूर्ण आधिकारिक अकाउंट्स को मनमाने ढंग से ब्लॉक नहीं किया जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष एक्स द्वारा दिए गए इस बयान के बाद इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC) के एक्स हैंडल्स पूरी तरह सुरक्षित और क्रियाशील बने रहेंगे; वहीं दिल्ली पुलिस की साइबर सेल अब इस बात की आपराधिक जांच करेगी कि दिल्ली पुलिस के नाम और जाली ईमेल का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया कंपनी को भ्रमित करने वाला वह अज्ञात व्यक्ति कौन था।
Fraud Notice: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) |
| केस / याचिकाकर्ता | SFLC एवं IFF बनाम भारत संघ व अन्य (Software Freedom Law Centre & IFF v. UOI & Ors.) |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल (Senior Advocate Akhil Sibal), अधिवक्ता नकुल गांधी, अभीक चिमनी आदि। | केंद्र सरकार: सीजीएससी आशीष दीक्षित। |
| मूल विवाद | दिल्ली पुलिस के फर्जी पत्रशीर्ष पर RSS की मानहानि का आरोप लगाकर IFF, SFLC और 40 अन्य URLs/अकाउंट्स को बंद करने हेतु भेजे गए फर्जी नोटिस। |
| X Corp का खुलासा | आंतरिक जांच में नोटिस फर्जी/इम्पोस्टर साबित; दिल्ली पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिकाएं निस्तारित: X कॉर्प द्वारा हैंडल ब्लॉक न करने और स्थिति स्पष्ट करने पर केस बंद। |

