Wednesday, September 30, 2026
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SC News: न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग वहां हो, जहां वह कानून के विरुद्ध हो, एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी…

SC News:सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अदालतों को शैक्षणिक मानकों से जुड़े मामलों में विशेषज्ञों की राय में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

विशेषज्ञ वैधानिक निकायों द्वारा लिए गए निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करें

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि आमतौर पर अदालतों को विशेषज्ञ वैधानिक निकायों द्वारा लिए गए निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, चाहे वह छात्रों के प्रवेश के लिए आवश्यक योग्यता हो या शिक्षकों की नियुक्ति, वेतन, पदोन्नति आदि से संबंधित योग्यता हो। पीठ ने कहा, इसका केवल यह अर्थ है कि अदालतों को शैक्षणिक मानकों से संबंधित विशेषज्ञों की राय में हस्तक्षेप करने में धीमी गति से काम लेना चाहिए। न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां निर्धारित योग्यता या शर्तें कानून के विरुद्ध हों, मनमानी हों या किसी कानूनी सिद्धांत की व्याख्या आवश्यक हो।

बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को दी गई है चुनौती

शीर्ष अदालत का यह फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आया, जिसमें एक समाज (सोसाइटी) को छठे केंद्रीय वेतन आयोग के तहत संशोधित वेतनमान का लाभ कुछ शिक्षकों को देने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने बताया कि ये शिक्षक इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थानों में पढ़ाते थे, जिन्हें समाज द्वारा संचालित और प्रबंधित किया जाता था।

AICTE द्वारा निर्धारित शिक्षकों की योग्यता पर सुप्रीम कोर्ट का किया रुख

शीर्ष अदालत ने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा इंजीनियरिंग संस्थानों में शिक्षकों के लिए निर्धारित योग्यता आवश्यकताओं का संदर्भ दिया। यह अदालत कई बार दोहरा चुकी है कि नियुक्ति, पदोन्नति आदि के लिए योग्यता तय करने की जिम्मेदारी विशेषज्ञ निकायों (इस मामले में AICTE) की होती है। जब तक निर्धारित योग्यता को मनमाना या गलत साबित नहीं किया जाता, तब तक अदालतें इसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालतों के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति नहीं है।

इस मामले में शीर्ष कोर्ट का निष्कर्ष

पहली श्रेणी के शिक्षकों के मामले में, अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया और कहा कि वे छठे वेतन आयोग के लाभ पाने के हकदार हैं। दूसरी श्रेणी के शिक्षक, जो पीएचडी धारक नहीं थे और नियुक्ति के सात साल के भीतर इसे हासिल करने में विफल रहे, उन्हें उच्च वेतनमान नहीं दिया जा सकता और न ही उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में पुनर्नियुक्त किया जा सकता।

पीएचडी प्राप्त करने के बाद आवेदन करने की छूट

अदालत ने कहा कि जब भी ये शिक्षक पीएचडी प्राप्त कर लेंगे, तो वे अपने संबंधित संस्थानों और AICTE के समक्ष उच्च वेतनमान और एसोसिएट प्रोफेसर की पदवी के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होंगे। ऐसे आवेदनों पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा।

शिक्षकों की दो श्रेणियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

पीठ ने कहा कि 15 मार्च, 2000 से पहले, व्याख्याताओं (लेक्चरर) या सहायक प्रोफेसरों (असिस्टेंट प्रोफेसर) के लिए पीएचडी अनिवार्य योग्यता नहीं थी। इस मामले में शिक्षकों की दो अलग-अलग श्रेणियां थीं। इसमें पहली श्रेणी के वे शिक्षक जो 15 मार्च, 2000 से पहले नियुक्त किए गए थे, जब पीएचडी पहली बार न्यूनतम योग्यता के रूप में आवश्यक नहीं थी। दूसरी श्रेणी के वे शिक्षक जो 15 मार्च, 2000 के बाद नियुक्त किए गए थे, जब पीएचडी एक अनिवार्य योग्यता बन गई थी।

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