Dying Declaration: सुप्रीम कोर्ट ने 28 साल पुराने एक हत्या के मामले में सजा को बरकरार रखते हुए ‘मृत्युपूर्व कथन’ (Dying Declaration) पर एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य / कोर्ट का निर्णय |
| मुख्य सिद्धांत | विश्वसनीय ‘मृत्युपूर्व कथन’ सजा का एकमात्र आधार हो सकता है। |
| मामला | 11 दिसंबर 1998 को हुई हत्या (गुजरात)। |
| कानूनी धारा | IPC की धारा 302 और बॉम्बे पुलिस एक्ट। |
| अदालत का रुख | अभियोजन पक्ष ने “संदेह से परे” (Beyond reasonable doubt) मामला साबित किया। |
| राहत | चूंकि आरोपी लंबी सजा काट चुका है, वह छूट (Remission) के लिए आवेदन कर सकता है। |
मामूली विवाद में एक चाय वाले की बेरहमी से हत्या
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने गुजरात हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मृत्युपूर्व कथन सच्चा, स्वैच्छिक और विश्वसनीय है, तो बिना किसी अन्य पुष्ट साक्ष्य (Corroboration) के भी यह सजा का एकमात्र आधार बन सकता है। यह मामला 1998 का है, जब सिगरेट फेंकने जैसे मामूली विवाद में एक चाय वाले की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। कोर्ट ने माना कि निचली अदालतों ने मृतक द्वारा अपने भाई को दिए गए बयानों पर भरोसा करके सही फैसला लिया था।
मृत्युपूर्व कथन (Dying Declaration) की कानूनी स्थिति
- कानून में यह माना जाता है कि “एक व्यक्ति अपने निर्माता (ईश्वर) से मिलने जाते समय अपने होठों पर झूठ लेकर नहीं जाएगा।
- एकमात्र आधार: यदि अदालत संतुष्ट है कि बयान बिना किसी दबाव के और होशोहवास में दिया गया है, तो सजा देने के लिए किसी और गवाह की आवश्यकता नहीं है।
- पुष्टि (Corroboration): हालांकि इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य और अन्य गवाहों (PW-12) ने भी बयान की पुष्टि की थी, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से इसकी अनिवार्य आवश्यकता नहीं है यदि मुख्य बयान विश्वसनीय हो।
मामले की पृष्ठभूमि (1998-2026)
- विवाद की वजह: मृतक सोमाभाई राबारी एक चाय की दुकान चलाते थे। आरोपी ने उनकी दुकान की बाल्टी में (जिसमें कप धोए जाते थे) अधजली सिगरेट फेंक दी थी, जिससे झगड़ा हुआ।
- घटना: अगले दिन सुबह सोमाभाई घायल अवस्था में मिले। अस्पताल ले जाते समय उन्होंने अपने भाई (शिकायतकर्ता) को दो बार बताया कि आरोपी ने उन पर हमला किया है।
- अस्पताल में मौत: अस्पताल पहुँचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने बाद में आरोपी की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल चाकू बरामद किया।
कोर्ट का तर्क: मकसद और इरादा (Motive & Mens Rea)
- सुप्रीम कोर्ट ने सजा बरकरार रखने के लिए तीन प्रमुख तत्वों का उल्लेख किया।
- मकसद (Motive): पिछले दिन हुआ झगड़ा और आरोपी द्वारा दी गई धमकी।
- इरादा (Mens Rea): हमले की प्रकृति और परिस्थितियों से स्पष्ट था कि इरादा हत्या का था।
- अपराध (Actus Reus): घायल अवस्था में मृतक द्वारा आरोपी का नाम लिया जाना।
- पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही भरोसेमंद है और मेडिकल साक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। आरोपी की अपील में कोई दम नहीं पाया गया।
न्याय में देरी, पर न्याय का अंत नहीं
यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो सोचते हैं कि समय बीतने के साथ गवाह और सबूत कमजोर पड़ जाएंगे। 28 साल बाद भी, सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी खामियों के बजाय “सच्चाई की पुकार” (मृतक के अंतिम शब्द) को प्राथमिकता दी। यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 की शक्ति को पुन: स्थापित करता है।

