Sunday, June 28, 2026
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Mizo marriage law: मिजो विवाह, तलाक और संपत्ति का उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, जानिए सुप्रीम अदालत में दायर याचिका में क्या-क्या है

Mizo marriage law: सुप्रीम कोर्ट में मिजो विवाह, तलाक और संपत्ति का उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह नया संशोधन मिजो पुरुषों के अधिकारों की रक्षा तो करता है, लेकिन उन मिजो महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और जनजातीय पहचान से वंचित कर देता है जो समुदाय से बाहर (Inter-community) विवाह करती हैं। यह कानून मिजो समाज की पारंपरिक प्रथाओं, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और आधुनिक महिला अधिकारों के बीच एक बड़ा विवाद बन गया है।

विवाह के दायरे में बदलाव (Scope of Marriage)

  • संशोधन ने इस बात को पूरी तरह बदल दिया है कि यह कानून किस प्रकार के विवाहों पर लागू होगा।
  • मूल कानून (2014): यह कानून किसी भी ऐसे व्यक्ति पर लागू होता था जो मिजो जनजाति से हो, या जहां विवाह में पुरुष मिजो हो। इसका मतलब था कि यदि कोई मिजो महिला किसी गैर-मिजो पुरुष से शादी करती थी, तब भी उसे इस अधिनियम के तहत कानूनी सुरक्षा प्राप्त थी।
  • 2026 का संशोधन: अब धारा 2 को बदलकर यह कर दिया गया है कि कानून केवल तभी लागू होगा जब “दोनों पक्ष मिजो हों” या “विवाह में पुरुष सदस्य मिजो हो”।
  • असर: यदि कोई मिजो पुरुष किसी गैर-मिजो महिला से शादी करता है, तो उसे इस कानून का संरक्षण मिलता रहेगा। लेकिन यदि कोई मिजो महिला किसी गैर-मिजो पुरुष से शादी करती है, तो वह इस कानून के दायरे से बाहर हो जाएगी। शादी करते ही उसकी जनजातीय पहचान का कानूनी वजन समाप्त हो जाता है।

‘मिजो’ कौन है? परिभाषा का संकुचन (Definition of Mizo)

  • कानून की धारा 3(m) में ‘मिजो’ की परिभाषा को बेहद सीमित कर दिया गया है, जिससे पहचान अब पूरी तरह पितृसत्तात्मक (Paternal) हो गई है।
  • मूल कानून (2014): इसमें जन्म से मिजो, गोद लिए गए बच्चे और वे लोग शामिल थे जिन्हें “समाज और समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर मिजो के रूप में स्वीकार” किया गया था।
  • 2026 का संशोधन: “समुदाय द्वारा स्वीकृति” वाले इस पूरे क्लॉज को हटा दिया गया है। अब नई परिभाषा के अनुसार केवल वही मिजो है जो “जन्म से मिजो है या जिसके पिता किसी मिजो जनजाति से हैं”।
  • असर: अब पहचान केवल पिता के वंश से तय होगी। यदि किसी व्यक्ति की मां मिजो है और पिता गैर-मिजो, तो वह कानूनी रूप से मिजो नहीं माना जाएगा।

तलाक और संपत्ति के अधिकारों में कटौती (Property Rights After Divorce)

संशोधन ने मिजो समुदाय की दो पारंपरिक तलाक प्रथाओं—’सुमछुआह’ (Sumchhuah) और ‘मक’ (Mak) के तहत महिलाओं को मिलने वाले संपत्ति के अधिकारों को भी प्रभावित किया है।

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सुमछुआह (Sumchhuah) – पत्नी द्वारा दिया जाने वाला तलाक

  • यह मिजो प्रथा है जहां महिला विवाह मूल्य (Marriage Price) लौटाकर अपने पति को छोड़ देती है।
  • मूल कानून: सामान्यतः ऐसी स्थिति में महिला का अर्जित संपत्ति पर अधिकार नहीं होता था। लेकिन, यदि महिला पति की घरेलू हिंसा, क्रूरता, बेवफाई या पागलपन के कारण घर छोड़ने पर मजबूर होती थी, तो कानून उसे अर्जित संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं करता था।
  • संशोधन: संशोधन ने क्रूरता वाले अपवाद को तो बरकरार रखा है, लेकिन यह जोड़ दिया है कि ऐसी स्थिति में महिला को “अर्जित संपत्ति के 50% से अधिक का हिस्सा नहीं दिया जाएगा” (यानी हिस्से की एक ऊपरी सीमा तय कर दी गई है)। साथ ही, कानून से ‘सुमछुआह’ की व्याख्या करने वाली परिभाषा को हटा दिया गया है, जिससे अब इसकी व्याख्या अदालतों या रूढ़ियों पर निर्भर करेगी।

मक (Mak) – पति द्वारा दिया जाने वाला तलाक

  • यह वह प्रथा है जहां पति अपनी पत्नी को तलाक देता है।
  • मूल कानून: यदि पति अपनी पत्नी को ‘मक’ देता था (व्यभिचार या दांपत्य अधिकारों से वंचित करने के आधारों को छोड़कर), तो पत्नी का अर्जित संपत्ति पर अधिकार होता था और स्पष्ट लिखा था कि “महिला की व्यक्तिगत संपत्ति (Personal Property) को छुआ नहीं जाएगा”।
  • संशोधन: नए संशोधन में इस अंतिम पंक्ति—कि “महिला की व्यक्तिगत संपत्ति सुरक्षित रहेगी”—को पूरी तरह हटा (Omit) दिया गया है। इसके बदले महिलाओं को कोई वैकल्पिक सुरक्षा नहीं दी गई है।

कानून में बदलाव: एक नजर में (Quick Comparison)

कानूनी प्रावधानमूल अधिनियम (2014)नया संशोधन (2026)महिलाओं पर प्रभाव
बाहर विवाह करने परमिजो महिला को कानून का संरक्षण प्राप्त था।केवल मिजो पुरुष को संरक्षण, महिला दायरे से बाहर।गैर-मिजो से शादी करने वाली मिजो महिला के अधिकार खत्म।
पहचान का आधारसमुदाय द्वारा स्वीकार्य व्यक्ति भी मिजो था।पहचान केवल पिता के वंश (Paternal Lineage) से तय होगी।मिजो मां के बच्चों को जनजातीय पहचान मिलना मुश्किल।
‘मक’ (पति द्वारा तलाक)महिला की व्यक्तिगत संपत्ति पूरी तरह सुरक्षित थी।सुरक्षा देने वाली इस कानूनी गारंटी को हटा दिया गया।तलाक के बाद महिला की निजी संपत्ति पर जोखिम।
‘सुमछुआह’ (घरेलू हिंसा पर)अर्जित संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था।हिस्सा अधिकतम 50% तक सीमित (कठिन व्याख्या)।संपत्ति के अधिकार पर अधिकतम सीमा (Cap) तय।

समानता बनाम परंपरा का विवाद

सुप्रीम कोर्ट में दायर यह याचिका भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) के आधार पर इस संशोधन को चुनौती देती है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यही है कि यह कानून एक ही तरह की परिस्थिति (अंतर-सामुदायिक विवाह) में मिजो पुरुषों को विशेषाधिकार देता है, जबकि मिजो महिलाओं को उनकी पहचान और संपत्ति से बेदखल कर देता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट जनजातीय प्रथाओं के संरक्षण और लैंगिक समानता (Gender Equality) के बीच कैसे संतुलन बनाता है।

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