Tuesday, September 29, 2026
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Maharishi Mahesh Yogi: संस्था जन कल्याण के लिए थी, गुटबाजी और निजी स्वार्थ के लिए नहीं…ऐसी टिप्पणी पर क्या थी सुप्रीम भावना, पढ़ें

Maharishi Mahesh Yogi: सुप्रीम कोर्ट ने आध्यात्मिक गुरु महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित संस्था ‘स्पिरिचुअल रीजनेरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ की संपत्तियों की कथित अवैध बिक्री की एसआईटी जांच का आदेश दिया है।

महर्षि महेश योगी के निधन के बाद संपत्ति पर नियंत्रण का मामला

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस संस्था का निर्माण जन कल्याण के लिए किया गया था, न कि महर्षि महेश योगी की मृत्यु के बाद उनके गुटों द्वारा संपत्तियों के व्यावसायिक दोहन और निजी स्वार्थ के लिए। यह मामला महर्षि महेश योगी के निधन के बाद संस्था के भीतर प्रबंधन और बेशकीमती संपत्तियों पर नियंत्रण को लेकर शुरू हुए दो गुटों के आपसी विवाद से जुड़ा है। एक गुट ने आरोप लगाया था कि प्रतिद्वंद्वी गुट के लोग फर्जी दस्तावेजों (Forged Documents) के जरिए गैर-कानूनी तरीके से संस्था की जमीनें निजी कंपनियों को बेच रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा हाई कोर्ट का आदेश?

  • यह अपील शिकायतकर्ता श्रीकांत ओझा द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसने पुलिस को इस मामले के एक मुख्य आरोपी (राघवेन्द्र प्रताप सिंह) के खिलाफ चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल करने से रोक दिया था और उसकी गिरफ्तारी पर स्टे लगा दिया था।
  • Wholly Unjustified (पूरी तरह से अनुचित): सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस निर्देश को पूरी तरह अनुचित बताते हुए रद्द कर दिया।
  • जांच पूरी करने के निर्देश: कोर्ट ने जांच अधिकारी को कानून के मुताबिक अपनी जांच पूरी कर पुलिस रिपोर्ट (चार्जशीट) दाखिल करने का आदेश दिया।

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निष्पक्ष जांच के लिए SIT का गठन

  • अदालत ने माना कि चूंकि इस मामले में कई राज्यों में एफआईआर (FIR) और दीवानी (Civil) विवाद लंबित हैं, इसलिए एक निष्पक्ष और अबाधित जांच के लिए SIT बेहद जरूरी है।
  • 3 महीने की डेडलाइन: SIT को आदेश दिया गया है कि वह उन सभी जमीनों की तथ्यात्मक जांच (Fact-finding inquiry) करे, जिन्हें संस्था के मूल पदाधिकारियों के अलावा अन्य लोगों द्वारा बेचा गया है। SIT को 3 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।
  • दंडात्मक कार्रवाई पर रोक: जब तक SIT अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देती और जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक आरोपियों के खिलाफ कोई दंडात्मक (Coercive) कार्रवाई नहीं की जाएगी, लेकिन उन्हें जांच में पूरा सहयोग करना होगा।

कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: संस्थापक की मंशा यह नहीं थी

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने महर्षि महेश योगी की मूल भावना का सम्मान करते हुए कहा, फाउंडेशन का पंजीकरण समाज के व्यापक विकास के लिए किया गया था। इसके संस्थापक की मृत्यु के बाद उनकी यह मंशा बिल्कुल नहीं थी कि गुटों के आपसी मतभेदों के कारण मूल्यवान संपत्तियों को उनके मूल उद्देश्य के विपरीत निजी स्वार्थ के लिए बेच दिया जाए। यह भी स्वीकार्य नहीं है कि दीवानी और आपराधिक मुकदमे लंबित होने के बावजूद पदाधिकारियों के मन में कोई डर न हो और वे लगातार संपत्तियां बेचते रहें।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणसुप्रीम कोर्ट का निर्देश / निष्कर्ष
संस्थास्पिरिचुअल रीजनेरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित)।
आरोपफर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी कंपनियों को संस्था की जमीनें बेचना।
अदालत की कार्रवाईमामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन।
समय सीमाSIT को 3 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी।
हाई कोर्ट का आदेशचार्जशीट दाखिल करने पर लगाई गई रोक को सुप्रीम कोर्ट ने हटाया।

धार्मिक और सामाजिक ट्रस्टों की सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के अन्य धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक ट्रस्टों के लिए भी एक नजीर है। अक्सर देखा जाता है कि बड़े आध्यात्मिक गुरुओं के महाप्रयाण के बाद उनकी संस्थाओं की संपत्तियों को लेकर आंतरिक विवाद शुरू हो जाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ऐसी संस्थाओं की संपत्ति सार्वजनिक कल्याण की धरोहर होती है और कानून जालसाजी या धोखाधड़ी (Forgery and Cheating) के जरिए इसके व्यावसायिक दोहन की इजाजत कभी नहीं देगा।

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