Sunday, November 8, 2026
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Victim Fear vs Evidence: जुलाई छात्र आंदोलन हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी जांच पैनल को रिकॉर्ड सौंपने की दी अनुमति

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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क

  1. समिति की रिपोर्ट और कम शिकायतें:जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी समिति ने कोर्ट को बताया कि 29 अक्टूबर को कार्यालय में बैठक और मीडिया में व्यापक प्रचार के बावजूद केवल एक शिकायतकर्ता ने शपथ पत्र प्रस्तुत किया। डिजिटल पोर्टल और ईमेल पर सीधी शिकायतें न के बराबर आई हैं।
  2. याचिकाकर्ताओं का पक्ष बनाम सॉलिसिटर जनरल:वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और वृंदा ग्रोवर ने तर्क दिया कि पीड़ित व्यक्तिगत रूप से डर के कारण सामने आने में असमर्थ हो सकते हैं। उन्होंने अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट के पास पहले से जमा पुलिस हिंसा के वीडियो साक्ष्य HPEC को सौंपे जाएं। वहीं, सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने दलील दी कि जनहित याचिकाकर्ताओं को घटनाओं का सीधा व्यक्तिगत ज्ञान नहीं हो सकता।
  3. अदालत का स्पष्टीकरण और निर्देश:CJI सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता पीड़ितों की ओर से कार्य करने के हकदार हैं, परंतु वे पीड़ितों को समिति के समक्ष पेश होने या समन कराने हेतु प्रेरित करें। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि HPEC के गठन का मतलब पुलिस अधिकारियों को दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने से रोकना नहीं है।
  4. समिति में सांगठनिक बदलाव:अदालत ने मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) डॉ. एल.आर. बिश्नोई का HPEC समिति से इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

मुख्य विधिक व सार्वजनिक जांच न्यायशास्त्र निष्कर्ष

1. सार्वजनिक जांच आयोगों में साक्ष्य हस्तांतरण का दायरा:

यह निर्णय स्थापित करता है कि जब किसी स्वतंत्र जांच समिति (Enquiry Committee) के पास भय या अन्य कारणों से पीड़ित सीधे नहीं पहुंच पाते, तो अदालतें जनहित याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए तृतीय-पक्षीय साक्ष्यों (Third-Party Materials) और हलफनामों को सीधे समिति के विचारार्थ स्थानांतरित कर सकती हैं।

2. विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही की स्वतंत्रता:

अदालत ने पुनर्गठित किया कि एक तथ्य-अन्वेषण समिति (Fact-Finding Committee) की समानांतर कार्यवाही पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों को दोषी पाए गए अधिकारियों पर अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई करने से नहीं रोकती।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु शीर्ष अदालत का रिट क्षेत्राधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन, शारीरिक सुरक्षा एवं निष्पक्ष जांच का मूल अधिकार), जांच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) के तहत गठित उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (High-Powered Enquiry Committee – HPEC), राज्य प्रायोजित पुलिस बल प्रयोग और पैलेट गन फायरिंग के विरुद्ध पीड़ितों के साक्ष्य संकलन के विधिक मानकों, तथा जनहित याचिका न्यायशास्त्र में ‘पीड़ितों की ओर से प्रतिनिधियों द्वारा सामग्री प्रस्तुत करने की वैधता’ (Locus of Petitioners on Behalf of Victims) के सिद्धांतों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की खंडपीठ ने जुलाई में हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा की जांच कर रही उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPEC) की ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ (Action-Taken Report) पर सुनवाई करते हुए यह अनुमति दी है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पीड़ितों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जमा कराई गई सभी सामग्रियां—जिनमें वीडियो क्लिप, शपथ पत्र और दस्तावेज शामिल हैं—अब सीधे जांच समिति को सौंपी जाएंगी और समिति उनका आधिकारिक परीक्षण करेगी।

अदालत को पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आर. सुभाष रेड्डी (Justice R Subhash Reddy) की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने सूचित किया था कि व्यापक प्रचार-प्रसार, ऑनलाइन पोर्टल और समर्पित ईमेल आईडी सक्रिय करने के बावजूद जमीनी स्तर से पीड़ितों की बहुत कम शिकायतें प्राप्त हुई हैं। शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि समिति को अनिश्चितकाल तक शिकायतों का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है; समिति उपलब्ध सामग्रियों और याचिकाकर्ताओं द्वारा सौंपी गई फाइलों के आधार पर अपनी तथ्यान्वेषी रिपोर्ट (Fact-finding Report) तैयार करने की दिशा में आगे बढ़े। साथ ही, अदालत ने मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) डॉ. एल.आर. बिश्नोई (Dr. L.R. Bishnoi) का समिति की सदस्यता से दिया गया त्यागपत्र भी औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य विधिक निर्देश एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘पीड़ितों की ओर से जमा की गई सामग्री और वीडियो जांचेगी समिति; नाम उजागर करना अनिवार्य नहीं’:

पीठ ने आदेश पारित करते हुए पीड़ितों के मन से पुलिस प्रताड़ना के भय को दूर करने हेतु स्पष्ट किया: “हमने पक्षकारों के विद्वान वकीलों को स्पष्ट किया है कि चूंकि शिकायतकर्ताओं/पीड़ितों के नाम और व्यक्तिगत विवरण उजागर करने की कोई वैधानिक अनिवार्यता नहीं है (No requirement of disclosure of names), अतः उनके कब्जे में मौजूद संपूर्ण सामग्री को उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPEC) के दिए गए पते या पोर्टल पर अग्रेषित किया जाए, ताकि समिति उस पर विचार कर सके। इस न्यायालय के समक्ष दायर याचिकाएं और शपथ पत्र भी समिति को भेजे जाएं। हम स्पष्ट करते हैं कि पीड़ितों की ओर से पक्षकारों द्वारा अग्रेषित की गई सामग्री/सूचना का भी समिति द्वारा विधिवत परीक्षण और मूल्यांकन किया जाएगा।”

2. ‘शिकायतें न आने और याचिकाकर्ताओं के दावों के बीच का अंतर पाटना जरूरी’:

  • सीजेआई सूर्यकांत ने पीड़ितों की वास्तविक शिकायतों के समिति तक न पहुंचने पर चिंता व्यक्त की:“समिति द्वारा किए गए प्रयासों के बावजूद, पोर्टल पर केवल कुछ ही शिकायतें प्राप्त हुईं, और ईमेल, डाक या व्यक्तिगत रूप से कोई शिकायत नहीं आई। याचिकाकर्ता जो सामग्री जमा करने का दावा कर रहे हैं और जो वास्तव में समिति तक पहुंचा है, उसके बीच एक स्पष्ट अंतर (Gap) दिखाई देता है।आप पीड़ितों की ओर से कार्य कर रहे हैं, जो विधिक रूप से अनुमेय (Permissible) है। ऐसी स्थिति में, आपको समिति से अनुरोध करना चाहिए कि वह संबंधित पीड़ितों को बयान दर्ज करने हेतु समन जारी करे।”

3. विभागीय कार्रवाई पर कोई न्यायिक रोक नहीं:

  • जब वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने आरोप लगाया कि समिति बनने के बाद पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया:“हमने पूर्व में यह स्पष्ट किया था कि जांच समिति के गठन को यह नहीं समझा जाना चाहिए कि वह पुलिस अधिकारियों या उनके वरिष्ठों को अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से रोकता है, यदि वे पाते हैं कि स्थल पर तैनात किसी अधिकारी या कर्मी ने अपने अधिकारों का उल्लंघन (Committed a transgression) किया है।”

4. ‘अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं; उपलब्ध साक्ष्यों पर तथ्य-खोज रिपोर्ट दे समिति’:

  • सीजेआई ने समिति का प्रतिनिधित्व कर रहीं न्यायमित्र (Amicus) अधिवक्ता मोनिका गुसाईं को निर्देश दिया:“जो भी सामग्री अब तक आई है, समिति को शिकायतों के लिए अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। उस सामग्री के आधार पर, हम चाहते हैं कि समिति अपनी तथ्यान्वेषी रिपोर्ट (Fact-finding report) अदालत को सौंपे।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (जुलाई – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
पीठभारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi)
आदेश की तिथिनवंबर 2026 (बुधवार)
केस संदर्भछात्र विरोध प्रदर्शन हिंसा जांच — उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) की प्रगति रिपोर्ट [Writ Petition (Civil) / 2026]
जांच समिति (HPEC)जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी (Justice R Subhash Reddy) (सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज) की अध्यक्षता में गठित स्वतंत्र न्यायिक आयोग।
समिति की ओर से न्यायमित्रअधिवक्ता मोनिका गुसाईं (Advocate Monika Gusain)।
केंद्र सरकार / पुलिस की ओर सेभारत के सॉलिसिटर जनरल (Solicitor General – SG) तुषार मेहता (Tushar Mehta)।
पीड़ितों / याचिकाकर्ताओं के अधिवक्तागणवरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Senior Advocate Gopal Sankaranarayanan), वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन (Senior Advocate N Hariharan), एवं प्रसिद्ध मानवाधिकार अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर (Advocate Vrinda Grover)।
मूल विवाद का उद्भवजुलाई 2026 में हुए बड़े पैमाने पर छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल द्वारा कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग, बर्बर लाठीचार्ज और पैलेट गन (Pellet Guns) की फायरिंग की गई थी, जिसमें कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जांच हेतु HPEC का गठन किया था।
समिति की ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ का खुलासासमिति ने बताया कि उसने 29 अक्टूबर 2026 को अपनी पहली औपचारिक बैठक की, समाचार पत्रों और टीवी में सार्वजनिक नोटिस जारी किए और एक समर्पित शिकायत पोर्टल व ईमेल सक्रिय किया। इसके बावजूद 29 अक्टूबर को केवल एक ही शिकायतकर्ता व्यक्तिगत रूप से हलफनामा लेकर उपस्थित हुआ, जबकि कुछ पुलिसकर्मी पेश हुए। डिजिटल पोर्टल पर बहुत कम और डाक/ईमेल से शून्य शिकायतें प्राप्त हुईं।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य आक्षेप1. हिंसा पर कोई FIR नहीं: अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने आरोप लगाया कि इतनी व्यापक हिंसा और छात्रों के घायल होने के बावजूद पुलिस ने आज तक एक भी प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की।
2. पैलेट गन का अनधिकृत प्रयोग: केंद्र सरकार ने समिति को यह रिकॉर्ड नहीं सौंपा है कि छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश किस सक्षम प्राधिकारी ने दिया था।
3. दस्तावेजी साक्ष्य: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि छात्रों में पुलिस प्रतिशोध का गहरा खौफ है, इसलिए वे सीधे समिति के पास नहीं आ रहे; याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में जो वीडियो और साक्ष्य दिए हैं, उन्हें ही समिति के हवाले किया जाए।
सॉलिसिटर जनरल का विधिक विरोधएसजी तुषार मेहता ने तर्क दिया कि जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने वाले याचिकाकर्ताओं को जमीनी घटनाओं का कोई प्रत्यक्ष/व्यक्तिगत ज्ञान (Personal Knowledge) नहीं है, अतः प्रत्येक शिकायत की प्रामाणिकता जरूरी है।
समिति की संरचना में संशोधनअदालत ने समिति के सदस्य रहे मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) डॉ. एल.आर. बिश्नोई (Dr. L.R. Bishnoi) का इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।
सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम आदेश1. याचिकाकर्ताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल संपूर्ण सामग्री, याचिकाएं, हलफनामे और वीडियो फुटेज समिति को सौंपने की अनुमति।
2. समिति को अज्ञात शिकायतों (Anonymous Complaints) और पीड़ितों की ओर से वकीलों द्वारा दिए गए साक्ष्यों का परीक्षण करने का निर्देश।
3. समिति को बिना देरी किए उपलब्ध रिकॉर्ड पर तथ्यान्वेषी रिपोर्ट (Fact-finding Report) तैयार करने का आदेश।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘राज्य हिंसा, पीड़ित संरक्षण और स्वतंत्र जांच आयोगों की विधिक शक्ति’

  • राज्य के विरुद्ध शिकायतों में पीड़ितों का मनोवैज्ञानिक अवरोध:
    • जब छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस हिंसा का आरोप हो और छात्रों पर ही आपराधिक मुकदमे दर्ज होने का खतरा मंडरा रहा हो, तो सामान्य प्रक्रिया के तहत थाने या आयोग में जाकर शिकायत दर्ज कराना किसी भी छात्र के लिए अपने भविष्य को दांव पर लगाने जैसा होता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य [(1996) 1 SCC 742] और डी.के. बसु [(1997) 1 SCC 416] में माना है कि जहाँ नागरिकों के मन में पुलिस का भय हो, वहाँ अदालतों को प्रक्रियात्मक कठोरता छोड़कर ऐसे वैकल्पिक तंत्र अपनाने चाहिए जिससे सच्चाई दफन न हो।
  • अज्ञात शिकायत (Anonymous Reporting) की विधिक मान्यता:
    • HPEC द्वारा पोर्टल पर फोन नंबर या नाम दिए बिना शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था करना और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिसकर्मियों के लिए अलग-अलग टैब (Separate Tabs) बनाना एक आधुनिक और प्रगतिशील विधिक कदम है।
    • इससे छात्र बिना अपनी पहचान उजागर किए पुलिस ज्यादतियों के डिजिटल साक्ष्य, फोटोग्राफ और मेडिकल पर्चियां जांच आयोग तक पहुंचा सकेंगे।
  • याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधि प्राधिकार (Representative Standing):
    • जनहित याचिकाओं में याचिकाकर्ता स्वयं ‘पीड़ित’ नहीं होते, किंतु वे पीड़ितों की आवाज बनकर अदालत में आते हैं।
    • सॉलिसिटर जनरल के इस तर्क को कि “याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत ज्ञान नहीं है”, सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर संतुलित किया कि यद्यपि वे केवल प्रतिनिधि हैं, किंतु उनके द्वारा पत्रावली पर रखे गए वीडियो और एफिडेविट भौतिक साक्ष्य (Real/Documentary Evidence) हैं। समिति इन वीडियो की सत्यता (फोरेंसिक जांच) और टाइम-स्टैम्प की पड़ताल कर स्वतः यह निष्कर्ष निकाल सकती है कि घटना स्थल पर क्या घटा था।
  • पैलेट गन के उपयोग पर उत्तरदायित्व:
    • जैसा कि अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने उठाया, भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन का प्रयोग मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की श्रेणी में आता है। समिति का प्राथमिक दायित्व यह तय करना है कि क्या न्यूनतम बल प्रयोग के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality & Minimum Force) का पालन किया गया था और फायरिंग का औपचारिक आदेश किसने जारी किया था।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
  • केस संदर्भ: इन री: जुलाई छात्र विरोध प्रदर्शन हिंसा जांच [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
  • पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi)
  • आदेश की तिथि: नवंबर 2026 (बुधवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPEC) को याचिकाकर्ताओं द्वारा पीड़ितों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत संपूर्ण सामग्री, वीडियो और हलफनामों की जांच करने की अनुमति; समिति को शिकायतों का अनिश्चितकाल तक इंतजार न करते हुए उपलब्ध साक्ष्यों पर तथ्य-खोज रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश; मेघालय के पूर्व डीजीपी डॉ. एल.आर. बिश्नोई का इस्तीफा स्वीकृत।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) की ओर से: अधिवक्ता मोनिका गुसाईं (Amicus Curiae)।
  • भारत संघ / पुलिस प्रशासन की ओर से: भारत के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता (Tushar Mehta)।
  • पीड़ितों / याचिकाकर्ताओं की ओर से:
    • वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Senior Advocate Gopal Sankaranarayanan)
    • वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन (Senior Advocate N Hariharan)
    • अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर (Advocate Vrinda Grover)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचारों का अधिकार
      • अनुच्छेद 21 — प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (पुलिस बर्बरता से सुरक्षा)
      • अनुच्छेद 19(1)(a) व 19(1)(b) — शांतिपूर्ण सभा और विरोध प्रदर्शन की मौलिक स्वतंत्रता
    • जांच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) — साक्ष्य संकलन, गवाहों को समन करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने की शक्तियां
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / पुलिस नियम — भीड़ नियंत्रण, बल प्रयोग के मानक और संज्ञेय अपराधों में अनिवार्य प्राथमिकी दर्ज करने का दायित्व
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • सार्वजनिक आंदोलनों में पुलिस हिंसा, साक्ष्य संकलन और जांच आयोगों का विधिक मानक: ‘जब लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग या पैलेट गन जैसे घातक साधनों के इस्तेमाल के आरोप हों, तो राज्य मशीनरी के डर से पीड़ितों द्वारा व्यक्तिगत रूप से सामने न आना एक स्वाभाविक जमीनी बाधा हो सकती है; न्याय के हित में उच्चाधिकार प्राप्त जांच आयोगों को केवल औपचारिक शिकायतों पर निर्भर रहने के बजाय जनहित याचिकाकर्ताओं द्वारा पीड़ितों की ओर से प्रस्तुत प्राथमिक वीडियो, हलफनामों और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने की पूर्ण विधिक अनुमति है; पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु पहचान गोपनीय रखते हुए अज्ञात शिकायतें स्वीकार करना और उनका सत्यापन करना एक वैध जांच प्रक्रिया है; किसी न्यायिक जांच समिति का गठन पुलिस विभाग को दोषी कर्मियों के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से नहीं रोकता; तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष तथ्यान्वेषी रिपोर्ट तैयार करने हेतु आयोगों को अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा करने के बजाय उपलब्ध डिजिटल व भौतिक साक्ष्यों के आधार पर समयबद्ध निष्कर्ष निकालने चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद याचिकाकर्ता वकीलों की टीम अपने पास मौजूद सभी वीडियो क्लिप, फोटोग्राफ और छात्रों के बयानों का संकलन जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी समिति को औपचारिक रूप से सौंप रही है; समिति इन डिजिटल साक्ष्यों का फोरेंसिक विश्लेषण कराएगी और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित छात्रों व पुलिस अधिकारियों को बंद कमरे में सुनवाई (In-Camera Proceedings) हेतु समन जारी करेगी। समिति की अंतिम तथ्यान्वेषी रिपोर्ट के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट दोषी पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने, छात्रों को मुआवजा देने और भीड़ नियंत्रण नियमावली में सुधार के अंतिम निर्देश जारी करेगा।

Victim Fear vs Evidence:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची
जांच समिति (HPEC)अध्यक्ष: न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी (पूर्व एससी जज) | अमिकस क्यूरी: अधिवक्ता मोनिका गुसाईं
प्रमुख प्रतिनिधि वकीलयाचिकाकर्ता पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन | राज्य/केंद्र पक्ष: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
विवाद का बिंदुजुलाई छात्र विरोध प्रदर्शन में पुलिस हिंसा; HPEC पोर्टल पर पीड़ितों की सीधी कम शिकायतें दर्ज होना; पुलिस द्वारा अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई न करना।
अदालत का अंतिम आदेशसाक्ष्य HPEC को भेजने की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट में दाखिल सभी हलफनामे, वीडियो व याचिकाएं HPEC को स्थानांतरित होंगी; पूर्व DGP डॉ. एल.आर. बिश्नोई का HPEC से इस्तीफा स्वीकार।
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