FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- मामले की पृष्ठभूमि और FIR का स्वरूप:याचिकाकर्ता के खिलाफ BNS की गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप था कि उसने दो अज्ञात हमलावरों को सुपारी देकर शिकायतकर्ता पर जानलेवा हमला करवाया। आरोपी ने BNSS की धारा 528 (CrPC धारा 482 के समान अंतर्निहित शक्तियां) के तहत याचिका दायर कर FIR रद्द करने की मांग की।
- तथ्य छिपाने (Material Suppression) का खुलासा:सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत 10 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट द्वारा खारिज कर दी गई थी। इसके खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सर्वोच्च न्यायालय ने भी 16 अक्टूबर 2026 को खारिज कर आरोपी को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता ने 21 अक्टूबर 2026 को दायर रद्दीकरण याचिका में इन दोनों ऐतिहासिक आदेशों को पूरी तरह छिपा लिया।
- उड़ीसा हाईकोर्ट नियम, 1948 की व्याख्या:आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि FIR quashing याचिका में जमानत खारिज होने का उल्लेख करना वैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने Rules of the High Court of Orissa, 1948 के अध्याय XVIII के नियम 5(1)(a) और 5(1)(b) का हवाला देकर इस तर्क को खारिज कर दिया। नियमों के तहत याचिकाकर्ता को यह घोषणा पत्र देना अनिवार्य है कि क्या उसी मामले में कोई अन्य याचिका (BNSS 430/482/483/528 या SC में दायर याचिकाएं) लंबित है या उसका क्या परिणाम रहा है।
मुख्य विधिक व प्रक्रियात्मक न्यायशास्त्र निष्कर्ष
1. स्वच्छ हाथों से अदालत में आने का सिद्धांत (Doctrine of Clean Hands):
यह निर्णय पुनर्गठित करता है कि असाधारण या अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers under Section 528 BNSS / Section 482 CrPC) की मांग करने वाले किसी भी वादकारी को अदालत के समक्ष पूर्ण और पारदर्शी प्रकटीकरण (Full and Candid Disclosure) करना अनिवार्य है। अदालती प्रक्रियाओं से प्रतिकूल आदेशों को छिपाना न्याय प्रशासन के साथ धोखा माना जाता है।
2. प्रक्रियात्मक नियमों (High Court Rules) का बाध्यकारी प्रभाव:
यह स्पष्ट करता है कि उच्च न्यायालयों के प्रक्रियात्मक नियम केवल औपचारिकताएं नहीं हैं। जमानत या रद्दीकरण याचिकाओं में पिछले न्यायिक आदेशों का विवरण न देना याचिका को खारिज करने और दंडात्मक लागत लगाने के लिए स्वतः पर्याप्त आधार (Self-Sufficient Ground) बनता है।
कटक: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति—पूर्ववर्ती CrPC धारा 482) व धारा 482 (अग्रिम जमानत—पूर्ववर्ती CrPC धारा 438), उड़ीसा उच्च न्यायालय नियमावली, 1948 (Rules of the High Court of Orissa, 1948) के अध्याय XVIII के खंड 5(1) व 5(2) (आपराधिक मामलों में पूर्व के सभी लंबित/निस्तारित आदेशों का शपथ पत्र पर अनिवार्य प्रकटीकरण), साम्या एवं रिट न्यायशास्त्र में ‘स्वच्छ हाथों का सिद्धांत’ (Doctrine of Clean Hands), तथा तथ्यों के दुर्भावनापूर्ण दमन (Suppression of Material Facts) के विधिक सिद्धांतों के तहत उड़ीसा उच्च न्यायालय ने एक सख्त और नज़ीरी फैसला सुनाया है।
उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा (Justice Sibo Sankar Mishra) की एकल पीठ ने भाड़े के हमलावरों द्वारा जानलेवा हमला कराने के आरोपी द्वारा दायर एफआईआर निरस्तीकरण याचिका (Quashing Petition) को खारिज (Dismissed) करते हुए अभियुक्त पर ₹50,000 का अनुकरणीय हर्जाना (Exemplary Cost) अधिरोपित किया।
अदालत ने यह जुर्माना इस बात के लिए लगाया क्योंकि याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय की समन्वय पीठ द्वारा 10 सितंबर 2026 को उसकी अग्रिम जमानत खारिज किए जाने के आदेश, और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 16 अक्टूबर 2026 को उसकी विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए उसे आत्मसमर्पण करने के दिए गए निर्देश को जानबूझकर छिपाया था। उच्च न्यायालय ने अभियुक्त की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि एफआईआर रद्द कराने की याचिका में अग्रिम जमानत खारिज होने के आदेशों का उल्लेख करना अनिवार्य नहीं होता। अदालत ने व्यवस्था दी कि न्यायालय के समक्ष पूर्ण और सत्य प्रकटीकरण (Full and Candid Disclosure) करना प्रत्येक मुकदमेबाज का बुनियादी दायित्व है, और तथ्यों का दमन करने वाले व्यक्ति को अदालत के दरवाजे से बिना मेरिट सुने बाहर कर दिया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अदालत के समक्ष पूर्ण प्रकटीकरण का दायित्व; तथ्य छिपाने पर याचिका सीधे खारिज होने योग्य’:
न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा ने अभियुक्त के वकील की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “याचिकाकर्ता के विद्वान वकील का यह तर्क कि एफआईआर रद्द कराने की मांग करने वाले अभियुक्त के लिए पूर्ववर्ती अग्रिम जमानत खारिज होने के आदेशों का खुलासा करना आवश्यक नहीं है, अदालत के समक्ष तथ्यों के प्रकटीकरण और एक वादकारी द्वारा पूर्ण व निष्कपट प्रकटीकरण (Full and candid disclosure) करने के सुस्थापित विधिक सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। तदनुसार, केवल इसी आधार पर (On this ground alone), वर्तमान याचिका सीधे खारिज किए जाने योग्य है।”
2. ‘उड़ीसा हाईकोर्ट नियमावली, 1948 के अध्याय XVIII का सीधा उल्लंघन’:
- अदालत ने नियमावली के खंड 5(1)(a) और 5(1)(b) का हवाला देते हुए रेखांकित किया:“उड़ीसा उच्च न्यायालय नियमावली के अध्याय XVIII का खंड 5 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि आपराधिक राहत मांगने वाली प्रत्येक याचिका में आवेदक या उसके अधिकृत एजेंट का शपथ पत्र सहित यह घोषणापत्र होना अनिवार्य है कि क्या BNSS की धारा 482 (अग्रिम जमानत), धारा 483 (नियमित जमानत) या धारा 528 के तहत कोई अन्य आवेदन लंबित है या उच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य अदालत द्वारा निस्तारित किया जा चुका है।इसके अतिरिक्त, खंड 5(1)(b) के तहत यह बताना भी अनिवार्य है कि क्या ऐसी राहत हेतु सर्वोच्च न्यायालय में कोई आवेदन किया गया था और उसका क्या परिणाम रहा। अतः यह दलील कि याचिकाकर्ता 10.09.2026 (हाईकोर्ट) और 16.10.2026 (सुप्रीम कोर्ट) के आदेशों का खुलासा करने के लिए बाध्य नहीं था, पूरी तरह से भ्रामक और योग्यताहीन (Wholly misconceived and devoid of merit) है।”
3. ₹50,000 का अनुकरणीय हर्जाना मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराने का आदेश:
- अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया को दूषित करने और अदालत को गुमराह करने के प्रयास को गंभीर कदाचार मानते हुए निर्देश दिया:“भौतिक तथ्यों के जानबूझकर किए गए दमन (Deliberate suppression of material facts) और स्वच्छ हाथों से अदालत के समक्ष उपस्थित न होने (Not approaching the Court with clean hands) के आधार पर याचिका को ₹50,000/- के अनुकरणीय हर्जाने के साथ खारिज किया जाता है।याचिकाकर्ता को निर्देश दिया जाता है कि वह इस लागत राशि को ओडिशा मुख्यमंत्री राहत कोष (Odisha Chief Minister’s Relief Fund) में जमा कराए।”

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (सितंबर – अक्टूबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | उड़ीसा उच्च न्यायालय, कटक (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / 482 CrPC) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा (Justice Sibo Sankar Mishra) (एकल पीठ) |
| साइटेशन | —————— |
| केस संदर्भ | आपराधिक विविध याचिका (CRLMC) / 2026 |
| याचिकाकर्ता (अभियुक्त) | गंभीर आपराधिक हमले का नामजद अभियुक्त (अधिवक्ता मिस्टर पांडा के माध्यम से प्रतिनिधित्व)। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. ओडिशा राज्य (गृह विभाग व पुलिस) 2. मूल सूचनाकर्ता/वादी (Informant)। |
| कथित अपराध का स्वरूप | अभियुक्त पर आरोप है कि उसने सूचनाकर्ता पर जानलेवा हमला करने के लिए दो अज्ञात हमलावरों को सुपारी देकर काम पर रखा था। उसके निर्देशों पर मोटरसाइकिल सवार दो अज्ञात बदमाशों ने रास्ते में वादी को रोका और उस पर लोहे के हथियारों से बेरहमी से हमला कर उसके शरीर के विभिन्न हिस्सों पर प्राणघातक चोटें पहुंचाईं। |
| प्राथमिकी (FIR) की धाराएं | भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS): • धारा 109(1) — हत्या का प्रयास (पूर्ववर्ती IPC 307) • धारा 118(1) — खतरनाक हथियारों से स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना (पूर्ववर्ती IPC 326) • धारा 126(2) — गलत तरीके से रोकना (पूर्ववर्ती IPC 341) • धारा 296 — अश्लील कृत्य व गाली-गलौज (पूर्ववर्ती IPC 294) • धारा 61(2) — आपराधिक षड्यंत्र (पूर्ववर्ती IPC 120B) • धारा 303(2) — चोरी/लूट संबंधी अपराध पठित धारा 3(5) (साझा आशय)। |
| पूर्व न्यायिक आदेशों का दमन | 1. उड़ीसा हाईकोर्ट आदेश (10.09.2026): समन्वय पीठ ने मामले की गंभीरता देखते हुए अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। 2. सुप्रीम कोर्ट आदेश (16.10.2026): अभियुक्त ने हाईकोर्ट के आदेश को एसएलपी द्वारा चुनौती दी; शीर्ष अदालत ने अग्रिम जमानत से इनकार करते हुए उसे ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत मांगने का आदेश दिया। |
| धोखाधड़ीपूर्ण याचिका (21.10.2026) | सुप्रीम कोर्ट के आत्मसमर्पण आदेश के मात्र 5 दिन बाद (21 अक्टूबर 2026 को), अभियुक्त ने दोनों अदालतों के आदेशों को पूरी तरह छिपाते हुए BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में यह याचिका लगा दी कि एफआईआर में कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, अतः मुकदमा रद्द किया जाए। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | याचिका पूर्णतः खारिज (Dismissed); अभियुक्त पर ₹50,000 का अनुकरणीय हर्जाना अधिरोपित, जिसे ओडिशा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराने का स्पष्ट निर्देश दिया गया। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘स्वच्छ हाथों का सिद्धांत, उड़ीसा हाईकोर्ट रूल्स और विधिक दायित्व’
- ‘स्वच्छ हाथों का सिद्धांत’ (Doctrine of Clean Hands) और प्रक्रिया का दुरुपयोग:
- सर्वोच्च न्यायालय ने के.डी. शर्मा बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड [(2008) 12 SCC 481] और दलिप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [(2010) 2 SCC 114] में सुस्थापित किया है कि न्यायपालिका का मंच सत्य पर आधारित है।
- यदि कोई पक्षकार अपने मामले से जुड़े किसी भी प्रतिकूल आदेश या महत्वपूर्ण सामग्री को छिपाकर अदालत से कोई अनुकूल आदेश प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो वह अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of the Process of Court) करता है। ऐसे व्यक्ति को गुण-दोष (Merits) पर सुने जाने का कोई विधिक अधिकार नहीं होता और उसकी याचिका को केवल कपट और तथ्य छिपाने के आधार पर तुरंत खारिज किया जाना चाहिए।
- उड़ीसा उच्च न्यायालय नियमावली, 1948 का सांविधिक अधिदेश:
- अध्याय XVIII का नियम 5(1)(a) और 5(1)(b) उच्च न्यायालय के समक्ष पेश होने वाले प्रत्येक आपराधिक अधिवक्ता और वादकारी पर यह वैधानिक दायित्व डालता है कि वह अपने हलफनामे में यह स्पष्ट घोषणा करे कि संबंधित मामले में निचली अदालत, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में कौन-कौन से आवेदन दायर हुए हैं और उनका क्या परिणाम रहा है।
- यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई भी अभियुक्त ‘फोरम शॉपिंग’ (Forum Shopping) न कर सके या एक अदालत से राहत न मिलने पर तथ्य छिपाकर दूसरी पीठ से चालाकी से राहत न ले सके।
- अग्रिम जमानत बनाम क्वैशिंग याचिका का अंतर्संबंध:
- यद्यपि अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS) और एफआईआर रद्द करना (धारा 528 BNSS) दो अलग-अलग विधिक उपचार हैं, किंतु दोनों का तथ्यात्मक आधार एक ही प्राथमिकी होती है।
- जब उच्च न्यायालय की एक समन्वय पीठ और देश की सर्वोच्च अदालत ने केस डायरी और साक्ष्यों को देखकर यह निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त की संलिप्तता गंभीर है और उसे हिरासत से सुरक्षा नहीं दी जा सकती, तो उस निष्कर्ष को छिपाकर यह दावा करना कि “प्रथम दृष्टया कोई केस ही नहीं बनता”, सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के आत्मसमर्पण के आदेश को निष्प्रभावी करने की एक दुर्भावनापूर्ण चाल थी।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: उड़ीसा उच्च न्यायालय, कटक (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: [Criminal Miscellaneous Case under Section 528 BNSS]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा (Justice Sibo Sankar Mishra) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज; महत्वपूर्ण न्यायिक आदेशों के दुर्भावनापूर्ण दमन हेतु अभियुक्त पर ₹50,000 का हर्जाना अधिरोपित; हर्जाना राशि ‘ओडिशा मुख्यमंत्री राहत कोष’ में जमा कराने का निर्देश।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 528 — उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां (पूर्ववर्ती CrPC धारा 482)
- धारा 482 — अग्रिम जमानत संबंधी प्रावधान (पूर्ववर्ती CrPC धारा 438)
- धारा 483 — नियमित जमानत संबंधी शक्तियां (पूर्ववर्ती CrPC धारा 439)
- उड़ीसा उच्च न्यायालय नियमावली, 1948 (Rules of the High Court of Orissa, 1948):
- अध्याय XVIII (आपराधिक मामलों में प्रक्रिया) — नियम 5(1)(a), 5(1)(b) एवं 5(2) (पूर्व आदेशों और आपराधिक इतिहास का अनिवार्य प्रकटीकरण)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 109(1) — हत्या का प्रयास
- धारा 118(1) — खतरनाक आयुधों से गंभीर चोट
- धारा 61(2) पठित 3(5) — आपराधिक षड्यंत्र व साझा आशय
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता, तथ्यों का दमन और स्वच्छ हाथों के सिद्धांत का विधिक मानक: ‘जो व्यक्ति न्याय और अंतर्निहित शक्तियों के प्रयोग की गुहार लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है, उसका यह प्राथमिक और अपरिवर्तनीय विधिक कर्तव्य है कि वह पूरी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और स्वच्छ हाथों (Clean Hands) के साथ उपस्थित हो; किसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने (Quashing) की याचिका में यह दलील देना कि अभियुक्त पूर्व में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के प्रतिकूल आदेशों का खुलासा करने के लिए बाध्य नहीं था, पूरी तरह भ्रामक और कानून के स्थापित सिद्धांतों के प्रतिकूल है; उड़ीसा उच्च न्यायालय नियमावली के अध्याय XVIII का नियम 5 स्पष्ट रूप से उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित सभी पूर्ववर्ती आदेशों का शपथ पत्र पर प्रकटीकरण अनिवार्य बनाता है; महत्वपूर्ण तथ्यों और सर्वोच्च न्यायालय के आत्मसमर्पण आदेश को छिपाकर याचिका दाखिल करना न्यायालय के साथ धोखाधड़ी (Fraud on Court) है; तथा ऐसे कदाचार के मामलों में याचिका को केवल तथ्य छिपाने के आधार पर ही गुण-दोष पर विचार किए बिना सीधे खारिज किया जाना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया को दूषित करने के लिए अभियुक्त पर भारी अनुकरणीय हर्जाना अधिरोपित किया जाना न्याय प्रशासन के हित में अनिवार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: उड़ीसा उच्च न्यायालय के इस कड़े आदेश के बाद अभियुक्त के पास गिरफ्तारी से बचने का कोई विधिक विकल्प शेष नहीं रह गया है; उसे सर्वोच्च न्यायालय के 16 अक्टूबर के निर्देशानुसार तुरंत संबंधित विचारण अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा; इसके साथ ही, अभियुक्त को ₹50,000 का चालान ओडिशा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कर उसकी रसीद हाईकोर्ट रजिस्ट्री में प्रस्तुत करनी होगी, अन्यथा उसके विरुद्ध वसूली और अवमानना की कठोर दंडात्मक कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।
Doctrine of Clean Hands: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | ओडिशा उच्च न्यायालय (Orissa High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति शिव शंकर मिश्रा (Justice Sibo Sankar Mishra) |
| केस / नज़ीर | [Accused] v. State of Odisha |
| संबंधित कानून/प्रावधान | BNSS 2023 की धारा 528 (CrPC धारा 482 के समकक्ष), BNS की धाराएं 126(2), 296, 118(1), 109(1), 61(2), 303(2) r/w 3(5) एवं Orissa High Court Rules, 1948 की धारा 5(1) |
| मूल विवाद | जानलेवा हमले (BNS) के आरोपी द्वारा 10.09.2026 (HC) और 16.10.2026 (SC) के अग्रिम जमानत निरस्त आदेशों को छिपाकर 21.10.2026 को BNSS धारा 528 के तहत FIR रद्दीकरण याचिका दायर करना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका निरस्त व ₹50,000 हर्जाना: तथ्य छिपाने के आधार पर quashing याचिका खारिज; जुर्माना राशि ओडिशा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराने का निर्देश। |

