Monday, August 10, 2026
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Dowry victim: पति के रिश्तेदारों को दहेज उत्पीड़न में फंसाने की प्रवृति बढ़ी, यह रही सुप्रीम टिप्पणी

Dowry victim: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दहेज उत्पीड़न के मामलों में पति के रिश्तेदारों को फंसाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

दहेज उत्पीड़न के मामले को किया खारिज

न्यायमूर्ति एहसानुद्दीन अमानुल्लाह और प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा, महिला के ननद, पति और ससुर के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं। इस टिप्पणी के साथ एक महिला के सास-ससुर के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न के मामले को खारिज कर दिया। हालांकि शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा किसी भी प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना का कोई स्पष्ट आरोप नहीं था। पीठ ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि पति के प्रत्येक रिश्तेदार को बिना ठोस साक्ष्य के फंसाना अनुचित है और इससे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है।

यह है केस का विवरण

यह विवाह 2014 में आंध्र प्रदेश के गुंटूर में हुआ था। विवाह के पांच महीने बाद ही महिला अपने पति को छोड़कर अपने माता-पिता के पास रहने लगी। वह कुछ समय के लिए फिर से ससुराल गई, लेकिन बाद में वापस मायके लौट आई। पति ने 2015 में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) के लिए याचिका दायर की। इसी बीच महिला ने 2016 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन फिर समझौता हो गया और पति ने केस वापस ले लिया। इसके बाद महिला बिना किसी सूचना के अमेरिका चली गई और विवाद जारी रहा। पति ने 21 जून 2016 को तलाक की याचिका दाखिल की, और इसके जवाब में महिला ने पुलिस में छह लोगों के खिलाफ फिर से शिकायत दर्ज कराई, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बिना ठोस आधार का मानते हुए खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

अदालत ने कहा

“आरोप केवल तानों और इस बयान तक सीमित है कि वे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और मंत्रियों से जुड़े हुए हैं। इसी कारण उन्होंने आरोपी 1 (पति) से लेकर आरोपी 3 (सास-ससुर) को और अधिक दहेज के लिए शिकायतकर्ता पर दबाव डालने के लिए उकसाया।”

यह रही सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

“दहेज पीड़ित महिलाओं द्वारा पति के सभी रिश्तेदारों को आरोपी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए, अदालत ने पहले भी इस प्रकार की प्रथाओं की आलोचना की है, खासकर भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 4 के तहत।”

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