Friday, October 2, 2026
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Bombay HC: मुम्बई पुलिस “कॉपी-पेस्ट संस्कृति कब छोड़ेगी, और क्या कहा बॉम्बे हाई कोर्ट ने

Bombay HC: बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड करने में पुलिस द्वारा अपनाई जा रही “कॉपी-पेस्ट संस्कृति” पर सख्त नाराजगी जताई है।

कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया

न्यायमूर्ति विभा कांकणवाड़ी और संजय ए देशमुख की खंडपीठ ने शुरू में याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार किया और याचिका अंततः वापस ले ली गई। कोर्ट ने कहा, “कॉपी-पेस्ट संस्कृति”को रोकने के लिए त्वरित हस्तक्षेप और व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता बताई है। कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए धारा 161 (CrPC) के तहत दर्ज गवाहों के बयानों की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता जताई।

यह है याचिका

यह टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसे अमोल निकम और उनके चार परिजनों ने दायर किया था। उन्होंने 24 फरवरी 2024 को जलगांव जिले के एरंडोल पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई प्राथमिकी से उपजे मामलों को रद्द करने की मांग की थी। शुरुआत में यह मामला आकस्मिक मृत्यु (Accidental Death) के रूप में दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में यह आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) और फिर धारा 305 (नाबालिग की आत्महत्या के लिए उकसावा) में बदल दिया गया, क्योंकि मृतका की उम्र 17 वर्ष पाई गई थी।

यह क्यों खतरनाक है?

कोर्ट ने कहा कि ऐसी एकरूपता मूल रूप से सच मामलों की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है और अनजाने में आरोपियों को लाभ मिल सकता है। “ऐसे मामलों में एक सच्चे मामले की गंभीरता भी खत्म हो सकती है। यह प्रवृत्ति खतरनाक है। गंभीर अपराधों में भी जांच अधिकारी ने गवाहों के बयान शब्दशः कॉपी-पेस्ट कर दिए हैं। दो गवाह बिल्कुल एक जैसे बयान नहीं दे सकते। यहां तक कि हर पैराग्राफ एक ही शब्द से शुरू और एक ही शब्द पर खत्म हो रहा है।

आगे की कार्रवाई

कोर्ट ने एडवोकेट मुकुल कुलकर्णी को “एमिकस क्यूरी” (न्यायमित्र) नियुक्त किया है, जो इस मामले में प्रणालीगत सुधारों के लिए सुझाव देने वाली याचिका तैयार करेंगे। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पुलिस अधिकारियों के लिए विशेष दिशानिर्देश बनाए, खासकर गवाहों के बयान कैसे रिकॉर्ड किए जाएं, इस पर स्पष्ट मार्गदर्शन दे। अगली सुनवाई 27 जून को होगी, और एमिकस क्यूरी को 20 जून तक रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है।

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