Surrogacy Parentage: मद्रास हाईकोर्ट ने सरोगेसी (सरोगेट मदर के माध्यम से बच्चे को जन्म देने) से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
Surrogacy Parentage को लेकर क्रिमिनल रिवीजन केस पर सुनवाई
हाईकोर्ट जस्टिस शमीम अहमद की एकल पीठ ने क्रिमिनल रिवीजन केस पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इसके साथ ही कोर्ट ने सरोगेसी कानून के तहत महिलाओं की उम्र सीमा को लेकर एक बड़ा विधिक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी न्यायिक मजिस्ट्रेट, सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी पात्रता प्रमाणपत्रों (Eligibility Certificates) की दोबारा जांच करने वाली अपीलीय अथॉरिटी नहीं बन सकता। मद्रास हाई कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि इस आदेश की प्रति राज्य के सभी प्रधान जिला न्यायाधीशों को सर्कुलेट की जाए ताकि पूरे तमिलनाडु की निचली अदालतों में इस प्रक्रिया को सुचारू और त्वरित बनाया जा सके।
मामला क्या था?: नमक्कल के दंपत्ति की कानूनी लड़ाई
यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के नमक्कल निवासी एक पीड़ित दंपत्ति से जुड़ा है।
दुखद अतीत: याचिकाकर्ता 1 और 2 (श्री नंदिनी देवी और सरवनन) का विवाह 2005 में हुआ था। उनका 16 वर्षीय बेटा नवंबर 2024 में कार्डियक अरेस्ट के कारण दुनिया से चल बसा। इसके तुरंत पहले, चिकित्सीय कारणों से पहली याचिकाकर्ता (मां) का गर्भाशय निकालना पड़ा था, जिससे वह दोबारा गर्भधारण के अयोग्य हो गईं।
सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी: दंपत्ति ने सरोगेसी (नियमन) अधिनियम, 2021 के तहत आवेदन किया। स्वास्थ्य सेवा संयुक्त निदेशक (नमक्कल) ने दस्तावेजों की जांच के बाद 23 मई 2025 को उन्हें सरोगेसी के लिए पात्रता प्रमाणपत्र जारी किया। उनकी एक रिश्तेदार (कीर्तिगा पेरुमल) सरोगेट मदर बनने को तैयार हुईं, जिन्हें करूर प्राधिकारी ने मंजूरी दी।
मजिस्ट्रेट का इनकार: जब दंपत्ति ने बच्चे के पितृत्व और कस्टडी के आदेश के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट नंबर 1, नमक्कल के पास आवेदन (Crl.MP.No.258 of 2026) किया, तो मजिस्ट्रेट ने 18 मार्च 2026 को इसे दो आधारों पर खारिज कर दिया। आवेदन के समय पहली याचिकाकर्ता की उम्र 50 वर्ष, 9 महीने और 3 दिन थी, जिसे मजिस्ट्रेट ने तय सीमा (50 वर्ष) से अधिक माना। सरोगेट मदर के पति को कोर्ट के सामने गवाही के लिए पेश नहीं किया गया था।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और मजिस्ट्रेट को फटकार
जस्टिस शमीम अहमद ने मजिस्ट्रेट के दोनों तर्कों को पूरी तरह दोषपूर्ण और कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर माना।
मजिस्ट्रेट की भूमिका अपीलीय नहीं, केवल सुचारू विधिक प्रक्रिया सुनिश्चित करना है
अदालत ने कहा कि सरोगेसी अधिनियम के तहत मेडिकल बोर्ड और जिला प्राधिकारी विशेषज्ञ निकाय हैं। यदि उन्होंने एक बार पात्रता प्रमाणपत्र जारी कर दिया है, तो मजिस्ट्रेट को उसकी सत्यता पर संदेह करने या उसकी अपीलीय समीक्षा करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि प्रत्यक्ष रूप से कोई धोखाधड़ी या जालसाजी सामने न आए।
सरोगेट मदर के पति की गवाही अनिवार्य नहीं
अधिनियम की धारा 4(iii)(a)(II) के तहत कार्यवाही में केवल इच्छुक दंपत्ति और सरोगेट मां का शामिल होना आवश्यक है। प्राधिकारी पहले ही पति की सहमति की जांच कर प्रमाणपत्र दे चुका है, इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा दोबारा पति की गवाही पर अड़ना कानूनी रूप से निराधार है।
आयु सीमा की नई व्याख्या: 50 वर्ष की आयु 51वें जन्मदिन तक मान्य
अधिनियम की धारा 4(iii)(c)(I) में इच्छुक महिला की आयु “23 से 50 वर्ष के बीच” तय की गई है। मद्रास हाई कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले [राजिथा पी.वी. बनाम भारत संघ (2025)] और जनरल क्लॉज एक्ट, 1897 की धारा 9 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब कानून में 23 से 50 वर्ष लिखा है, तो इसका अर्थ है कि महिला अपने 50वें वर्ष के पूरे होने के बाद भी, यानी 51वें जन्मदिन की पूर्व संध्या तक सरोगेसी के लिए कानूनी रूप से पात्र रहेगी। 50 वर्ष की ऊपरी सीमा 50 वें वर्ष के अंतिम दिन तक विस्तारित होती है।
अदालत ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रजनन का अधिकार और सम्मान के साथ जीने की स्वतंत्रता व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। ऐसे कल्याणकारी कानूनों (Beneficial Legislation) की व्याख्या तकनीकी कमियों को ढूंढने के बजाय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।
मजिस्ट्रेटों के लिए हाई कोर्ट की नई गाइडलाइंस
अदालत ने भविष्य में सरोगेसी याचिकाओं की सुनवाई के लिए देश की निचली अदालतों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
पहचान और सहमति का सत्यापन: (प्राथमिक कार्य) मजिस्ट्रेट का मुख्य काम केवल इच्छुक माता-पिता और सरोगेट मां की पहचान सत्यापित करना, उनकी स्वैच्छिक सहमति सुनिश्चित करना और यह देखना है कि सरोगेट मां बच्चे पर अपना दावा स्वेच्छा से छोड़ रही है।
वाणिज्यिक सरोगेसी पर रोक: अदालत केवल यह सुनिश्चित करेगी कि इस प्रक्रिया में कोई व्यावसायिक लेनदेन (Commercial Surrogacy) या जबरदस्ती शामिल न हो।
त्वरित निस्तारण:समय सीमा: (4 सप्ताह) इन मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए, मजिस्ट्रेट को आवेदन दाखिल होने के चार सप्ताह के भीतर अंतिम आदेश पारित करना होगा। इसे एक पूर्ण दीवानी या फौजदारी मुकदमे (Trial) की तरह लंबा नहीं खींचा जा सकता।
केस मैट्रिक्स: मद्रास हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | मद्रास उच्च न्यायालय का विधिक आदेश (2026) |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (सिंगल बेंच) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस शमीम अहमद |
| केस संदर्भ | CRL RC No. 950 of 2026 (फैसला: 25 जून 2026) |
| निचली अदालत का आदेश | न्यायिक मजिस्ट्रेट नंबर 1, नमक्कल का खारिज करने का आदेश रद्द (Set Aside) |
| विधिक सिद्धांत लागू | Actus curiae neminem gravabit (अदालत की देरी से किसी का नुकसान नहीं होना चाहिए) |
| भविष्य के निर्देश | याचिकाकर्ताओं को 2 सप्ताह में पात्रता प्रमाणपत्र नवीनीकरण (22 मई 2027 तक) के लिए आवेदन करने और निचली अदालत को प्रमाणपत्र मिलने के 4 सप्ताह में आदेश जारी करने का निर्देश। |

