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ARBITRATION case: मध्यस्थता समझौतों में जानबूझकर अस्पष्टता डाली जाती है…जताई गई सुप्रीम चिंता

ARBITRATION case: सुप्रीम कोर्ट ने व्यावसायिक समझौतों में मध्यस्थता (arbitration) धाराओं के मसौदे को लेकर चिंता जताई और कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर मामलों को जटिल और लंबा बनाया जा रहा है।

खराब ढंग से तैयार की गई मध्यस्थता की धाराओं पर टिप्पणी

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस पर “गंभीर चिंता” व्यक्त की कि किस प्रकार इन समझौतों में जानबूझकर अस्पष्टता डाली जाती है। उन्होंने निचली अदालतों को निर्देश दिया कि वे खराब ढंग से तैयार की गई मध्यस्थता की धाराओं को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की ‘दृढ़ प्रवृत्ति’ अपनाएं। अदालत ने कहा, भारत में व्यावसायिक समझौतों में मध्यस्थता की धाराओं का मसौदा बहुत कुछ अधूरा छोड़ देता है। मध्यस्थता को तेज और प्रभावी विवाद निपटान के साधन के रूप में लाया गया था, लेकिन विडंबना है कि कुछ मामलों में इसका दुरुपयोग विवाद को और जटिल और लंबा करने के लिए किया जा रहा है। पीठ ने आगे जोड़ा, यह प्रशासनिक चूक का परिणाम है या खराब कानूनी सलाह का, यह एक अलग विचार का विषय हो सकता है।

कपटपूर्ण गतिविधियों के लिए व्यक्तिगत दायित्व तय किया जाएगा

कोर्ट ने यह भी आग्रह किया कि ऐसे मामलों में अदालतें अपनी “स्वप्रेरित (suo motu) शक्तियों” का उपयोग करें, जहां कानूनी फर्म या वकील जानबूझकर भ्रामक मध्यस्थता धाराएं बना रहे हों। पीठ ने कहा कि जल्द ही वह समय आएगा जब ऐसी कपटपूर्ण गतिविधियों के लिए व्यक्तिगत दायित्व तय किया जाएगा, और सबसे कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने कहा, हमें पूरा विश्वास है कि ये कदम भारतीय मध्यस्थता प्रक्रिया में ईमानदारी, पारदर्शिता और पेशेवर व्यवहार को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। मध्यस्थता प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसे समझौतों की पवित्रता की रक्षा अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

जानबूझकर और बेतुके ढंग से न्यायिक समय की बर्बादी निंदनीय है। अब समय आ गया है कि मध्यस्थता की धाराएं अत्यंत स्पष्टता और सटीकता के साथ तैयार की जाएं, न कि अस्पष्ट भाषा में। यह जिम्मेदारी हर कानूनी सलाहकार, अधिवक्ता और वकील की है, जिसे पूरी निष्ठा से निभाया जाना चाहिए।

न्यायपालिका को दी चेतावनी

पीठ ने कहा कि वह कानूनी समुदाय को “सलाह देना चाहती है, यदि चेतावनी नहीं भी दे, कि ऐसी प्रथाओं से दूर रहें जो न्यायिक समय की गंभीर बर्बादी का कारण बनती हैं। यदि कोई वकील केवल शब्दों के जाल में उलझाकर ऐसी धाराएं बनाते हैं, तो इससे उनकी पेशेवर साख को कोई लाभ नहीं मिलने वाला।

मामला क्या था?

यह टिप्पणियां उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गईं जो दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों को चुनौती दे रही थीं, जिनका संबंध दिल्ली नगर निगम और कुछ निजी ठेकेदारों के बीच पार्किंग और व्यावसायिक परिसरों के विकास को लेकर हुए रियायत समझौतों (Concession Agreements) से था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

वे मामले, जिनमें प्रथम दृष्टया यह दिखता है कि अनुबंधों में दुर्भावना निहित है, उन्हें न्यायालय से बाहर कर देना चाहिए। सभी न्यायालयों और न्यायिक मंचों को नीति स्वरूप यह रुख अपनाना चाहिए कि वे अस्पष्ट या कमजोर मध्यस्थता धाराओं को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दें।

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