मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव (Bombay High Court) |
| याचिकाकर्ता | शिवाजी कांबले, प्रथमेश परब और विक्रांत तांबे |
| मामला | फर्जी कोविड-19 आरटी-पीसीआर रिपोर्ट बनाकर सोसाइटी सुरक्षा को गुमराह करना। |
| अदालत का निर्णय | लॉकडाउन के मानसिक तनाव और परिस्थिति को देखते हुए FIR रद्द; ₹10,000-₹10,000 का जुर्माना विशेष स्कूल में जमा करने का आदेश। |
Covid Time: बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने एक हाउसिंग सोसाइटी के तीन सदस्यों के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया है। इन तीनों पर कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अपनी सोसाइटी के सुरक्षा नियमों से बचने के लिए फर्जी ‘नेगेटिव’ आरटी-पीसीआर (RT-PCR) रिपोर्ट तैयार करने का आरोप था।
एकल पीठ के न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव (Justice Milind Jadhav) ने याचिका पर सुनवाई करते हुए माना कि हालांकि यह एक अपराध था, लेकिन यह कदम कोविड-19 महामारी के कठिन समय में उत्पन्न अत्यधिक मानसिक तनाव, घबराहट (Anxiety) और आपातकालीन परिस्थितियों (Exigency) के कारण उठाया गया था।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां (Key Court Observations)
- परिस्थितियों और मानसिक तनाव की समझ:“प्रथम दृष्टया, कोई भी उस आपातकालीन परिस्थिति को समझ सकता है जिसके कारण यह कथित अपराध हुआ। याचिकाकर्ताओं (कांबले और परब) की उम्र महज 24 वर्ष है। कोविड-19 महामारी लॉकडाउन अवधि के दौरान सामने आई चिंताओं और कठिनाइयों को दूर करने तथा सुरक्षा नियमों में ढील पाने के लिए यह कार्य किया गया था।”
- अपराध फिर भी अपराध है (मुआवजे का आदेश):
- न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि भले ही परिस्थितियों को समझा जा सकता है, लेकिन “एक आपराधिक कृत्य हमेशा अपराध ही रहेगा।” इसलिए कोर्ट ने FIR रद्द करने के साथ-साथ तीनों याचिकाकर्ताओं पर ₹10,000-₹10,000 (कुल ₹30,000) का जुर्माना (Cost) लगाया। यह राशि विशेष बच्चों के स्कूल ‘एके मुंशी योजना के जेटी शेठ मंदबुद्धि विकास केंद्र’ को दान करने का निर्देश दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- घटना: शिवाजी कांबले, प्रथमेश परब और विक्रांत तांबे ने मुंबई स्थित अपनी सोसाइटी के सुरक्षा कर्मचारियों को दिखाने के लिए फर्जी कोविड-19 रिपोर्ट तैयार की।
- फर्जीवाड़ा कैसे हुआ: आरोपी विक्रांत तांबे (एक युवा वेब डिजाइनर) ने अपने लैपटॉप और ‘Adobe Illustrator CS3’ सॉफ्टवेयर का उपयोग करके ‘मेट्रोपोलिस लेबोरेटरी’ की फर्जी नेगेटिव आरटी-पीसीआर टेस्ट रिपोर्ट बनाई थी।
- सोसाइटी का रुख: जब सोसाइटी के अध्यक्ष और सुरक्षाकर्मियों को रिपोर्ट में गफ़लत महसूस हुई, तो उन्होंने पुलिस में मामला दर्ज कराया।
- नो-ऑब्जेक्शन एफिडेविट (No Objection Affidavit): सुनवाई के दौरान सोसाइटी ने 21 जुलाई 2026 का एक हलफनामा कोर्ट में पेश किया। सोसाइटी ने कहा कि इस कृत्य से किसी भी सदस्य को कोई वास्तविक शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचा था, और तीनों की कम उम्र व उज्ज्वल भविष्य को देखते हुए सोसाइटी को FIR रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
- FIR रद्द: बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया।
- लागत/जुर्माना: तीनों आरोपियों को ₹10,000-₹10,000 की लागत राशि 150 विशेष बच्चों की शिक्षा और प्रशिक्षण में लगी संस्था को देने का निर्देश दिया।
- सामान की वापसी: कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि जांच के दौरान जब्त किया गया तांबे का लैपटॉप उसे वापस सौंप दिया जाए।

