Ideal Indian wife: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक तलाक के मामले में फैसला सुनाते हुए बताया कि एक आदर्श भारतीय पत्नी कैसी होती है।
शादी हिंदू परंपरा में एक पवित्र और अटूट बंधन
कोर्ट ने कहा कि शादी हिंदू परंपरा में एक पवित्र और अटूट बंधन है, जिसे निभाने के लिए पत्नी ने जिस तरह का आचरण किया, वह मिसाल है। यह मामला इंदौर के पिपलादा गांव का है, जहां पति-पत्नी की शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। 2002 में उनके एक बेटे का जन्म हुआ। लेकिन पति ने पत्नी पर शराब पीने और दूसरी महिलाओं से संबंध रखने के आरोप लगाने, वैवाहिक संबंधों में रुचि न लेने और गर्भावस्था के दौरान भी खुश न होने जैसे आरोप लगाकर तलाक मांगा।
पत्नी ने आरोपों को झूठा बताया
पत्नी ने इन आरोपों को झूठा बताया और कहा कि वह हमेशा वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने को तैयार रही। उसने यह भी कहा कि पति का एक महिला सहकर्मी से संबंध था। कोर्ट ने पाया कि पति के छोड़ने के बाद भी पत्नी अपने ससुराल में सास-ससुर, देवर और ननद के साथ संयुक्त परिवार में रह रही थी। उसने कभी ससुराल नहीं छोड़ा। कोर्ट ने कहा कि पति के परिवार का कोई भी सदस्य कोर्ट में उसके समर्थन में नहीं आया, जिससे साबित होता है कि उसके आरोप झूठे हैं।
पत्नी की सहनशीलता और आचरण की सराहना
कोर्ट ने पति की तलाक की याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह अपनी ही लापरवाही और अपमानजनक व्यवहार का फायदा नहीं उठा सकता। पत्नी अब भी ससुराल में इस उम्मीद में रह रही है कि एक दिन पति को समझ आएगी और वह वापस लौटेगा। कोर्ट ने पत्नी के आचरण की सराहना करते हुए उसे “आदर्श भारतीय पत्नी” बताया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला एक भारतीय महिला की निष्ठा और पारिवारिक जीवन को बचाने के प्रयासों का उदाहरण है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शादी एक संस्कार है, न कि कोई समझौता। एक आदर्श पत्नी, चाहे पति उसे छोड़ दे, फिर भी अपने धर्म, संस्कृति और वैवाहिक बंधन की मर्यादा में बनी रहती है।
धर्म में अडिग रही पत्नी
कोर्ट ने कहा कि पति के छोड़ने के दर्द के बावजूद पत्नी ने अपने धर्म का पालन किया। उसने न तो पति की वापसी की भीख मांगी, न ही उसे बदनाम किया। बल्कि अपने शांत आचरण और सहनशीलता से अपनी ताकत दिखाई। उसने अपने मायके और ससुराल की इज्जत को कभी ठेस नहीं पहुंचाई।
पति के बिना भी निभाया बहू का धर्म
कोर्ट ने कहा कि पति के न रहने पर भी पत्नी ने सास-ससुर की सेवा की। उसने कभी अपनी पीड़ा को सहानुभूति पाने का जरिया नहीं बनाया, बल्कि उसे आत्मबल में बदला। उसने न तो मंगलसूत्र उतारा, न ही सिंदूर छोड़ा, क्योंकि उसके लिए शादी कोई अनुबंध नहीं, बल्कि संस्कार है।
यह मामला क्यों है खास
कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर ऐसे मामलों में पत्नी आरोप लगाकर ससुराल छोड़ देती है, लेकिन इस मामले में पत्नी ने अकेलेपन के बावजूद ससुराल नहीं छोड़ा। उसने बहू के कर्तव्यों को नहीं छोड़ा, बल्कि सास-ससुर की सेवा को प्राथमिकता दी। उसने पति के खिलाफ कोई आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं कराया, जिससे उसका करियर और जीवन खराब हो सकता था। यह उसकी सहनशीलता और मजबूत चरित्र को दर्शाता है।
शादी का आधार है सहनशीलता
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शादी का आधार सहनशीलता, समायोजन और एक-दूसरे का सम्मान है। छोटी-छोटी बातों को बढ़ाकर उस रिश्ते को नहीं तोड़ा जाना चाहिए, जिसे स्वर्ग में बनाया गया माना जाता है।

