Tuesday, August 18, 2026
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Sedition Provisions: BNS की धारा 152 को चुनौती… याचिका में देशद्रोह कानून की वापसी का आरोप

Sedition Provisions: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

देशद्रोह से जुड़ी ये याचिकाएं 2021 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित

यह धारा पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A यानी देशद्रोह कानून की जगह लाई गई है, जिसे पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया था। याचिका में कहा गया है कि BNS की धारा 152 ने देशद्रोह कानून को नए रूप में फिर से लागू कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह मामला पहले से लंबित उन याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है, जिनमें IPC की धारा 124A को चुनौती दी गई है। देशद्रोह से जुड़ी ये याचिकाएं 2021 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

नई याचिका दाखिल होने से लंबित याचिकाओं की सुनवाई तेज होगी

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी विचार किया था कि क्या इस मामले को सात जजों की संविधान पीठ को भेजा जाए, क्योंकि पहले पांच जजों की पीठ ने देशद्रोह कानून को सही ठहराया था। इस मामले से जुड़े एक वकील ने बताया कि नई याचिका दाखिल होने से लंबित याचिकाओं की सुनवाई तेज होने की उम्मीद है, जो सितंबर 2023 से नहीं हुई है।

सरकार ने कहा था- कानून की समीक्षा करेंगे

11 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जब तक सरकार देशद्रोह कानून की समीक्षा कर रही है, तब तक इस कानून के तहत कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसके बाद IPC को हटाकर 1 जुलाई 2024 से BNS लागू कर दी गई। लेकिन तब से अब तक लंबित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हुई।

याचिका में क्या कहा गया

यह याचिका रिटायर्ड मेजर जनरल एसजी वोंबटकेरे ने दाखिल की है। उन्होंने पहले भी IPC की धारा 124A को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद कोर्ट ने इस कानून पर रोक लगाई थी। अब उन्होंने कहा है कि BNS की धारा 152 उसी देशद्रोह कानून को नए रूप में फिर से लागू करती है, जो कोर्ट के आदेश और लंबित सुनवाई के बावजूद किया गया है।

धारा 152 में क्या है

इस धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर या समझते हुए कोई ऐसा बयान देता है—चाहे वह बोले, लिखे, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो, प्रतीकात्मक हो या आर्थिक—जो देश से अलगाव, विद्रोह या सरकार विरोधी गतिविधियों को भड़काता है या भड़काने की कोशिश करता है, तो उसे अपराध माना जाएगा।

याचिका में किया गया दावा

याचिका में कहा गया है कि इस धारा की भाषा बहुत व्यापक और अस्पष्ट है। इसमें’अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देने’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डालता है और इसका दायरा बहुत बड़ा है।

संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन

याचिका में कहा गया है कि धारा 152 संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है। इसमें अस्पष्ट और परिभाषित न किए गए शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे लोगों में डर पैदा होगा और वे अपनी बात कहने से डरेंगे।

कानूनी कसौटी पर नहीं उतरती धारा

याचिका में यह भी कहा गया है कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत तय की गई वैधानिकता, आवश्यकता और संतुलन की कसौटी पर भी खरी नहीं उतरती। इसलिए इसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाना चाहिए।

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