Thursday, October 1, 2026
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Unauthorized detention: बिहार में ज़मानत के बाद भी 18 दिन जेल में रहा बंदी…कोर्ट बोली—यह मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन

Unauthorized detention: बिहार में एक बंदी को ज़मानत मिलने के बावजूद 18 दिन तक जेल में ही बंद रखे जाने के मामले में हाई कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई गई।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई

पटना हाईकोर्ट ने कहा, यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का साफ उल्लंघन है। कोर्ट ने संकेत दिया कि पीड़ित को क्षतिपूर्ति दिलाई जाएगी और यह मुआवज़ा सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारी से वसूला जाएगा। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई की थी।

यह है मामला

याचिकाकर्ता को सरबहदा थाना कांड संख्या 91/2025 (प्रोहिबिशन एक्ट के तहत) में 23.09.2025 को जमानत मिल गई थी। अदालत ने 29.09.2025 को रिहाई वारंट जारी कर इसे गया केंद्रीय कारा को भेज दिया। इसके बावजूद बंदी को रिहा नहीं किया गया। इस बीच, बक्सर सीजेएम कोर्ट से एक प्रोडक्शन वारंट आया था—लेकिन उसकी तारीख 04.09.2025 की थी, यानी जमानत आदेश पहुँचने तक वह पहले ही समाप्त हो चुकी थी।

कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

अदालत ने कहा, जेल अधीक्षक ने खुद पत्र (06.10.2025) में लिखा कि “रिहाई आदेश मिल गया है, कैदी रिहा है”, लेकिन अगले ही वाक्य में कहा कि “उसे प्रोडक्शन वारंट के आधार पर अब भी रखा गया है।”इससे साबित होता है कि व्यक्ति को किसी वैध अदालत आदेश के बिना हिरासत में रखा गया। यह असंगत, अवैध और अत्यंत चिंताजनक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस बल/वाहन के इंतज़ाम के नाम पर बंदी को jail में रखना कानूनन अस्वीकार्य है।

बिहार में ‘प्रैक्टिस’ बन चुका है?

सरकार की ओर से पेश एसी टू एजी ने स्वीकार किया कि “शायद राज्य में यह एक प्रचलित तरीका है”, हालाँकि यह रिकॉर्ड पर नहीं है। कोर्ट ने इस टिप्पणी को बेहद गंभीर माना।

18 दिन की अवैध हिरासत—कोर्ट बेहद नाराज़

कोर्ट ने कहा—

“इस मामले में बंदी की स्वतंत्रता 18 दिनों तक बिना किसी अधिकृत आदेश के छीनी गई। यह पूरी तरह अवैध है।”

कोर्ट ने कहा, 2 लाख रुपये मुआवज़ा उचित

कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड और पक्षों की दलीलें देखने के बाद कहा कि “अवैध हिरासत के लिए 2,00,000 रुपये की राशि मुआवज़े के तौर पर उपयुक्त और उचित है।” यह रकम गया केंद्रीय जेल के जेल अधीक्षक द्वारा की गई अनधिकृत हिरासत को ध्यान में रखकर तय की गई।

राज्यभर में गलत ‘प्रैक्टिस’ चलने पर गंभीर टिप्पणी

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे पता चला है कि राज्य के कई जिलों में जेल सुपरिंटेंडेंट्स इसी तरह की गलत प्रैक्टिस अपना रहे हैं, जहाँ कोर्ट के आदेश या संवैधानिक दायित्व की अवहेलना करके बंदियों को अनावश्यक रूप से रोका जाता है।

IG जेल को दो हफ्ते में नई गाइडलाइन जारी करने का आदेश

उच्च न्यायालय ने IG, Prisons & Correctional Services को निर्देश दिया कि राज्य के सभी जेल सुपरिंटेंडेंट्स को स्पष्ट गाइडलाइन जारी करें ताकि वे संवैधानिक प्रावधानों और अदालत के आदेश का सख्ती से पालन करें और यह गाइडलाइन दो सप्ताह के भीतर जारी हो जानी चाहिए। अदालत ने K.K. Pathak केस के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि “यह राशि बाद में कानूनी प्रक्रिया के अनुसार दोषी अधिकारी से ही वसूली जाएगी।”

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