अदालत की मुख्य टिप्पणियां एवं कानूनी निष्कर्ष
- अनुच्छेद 21 (स्वच्छ हवा का अधिकार) बनाम अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार का अधिकार):अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर गैर-धूम्रपान करने वाले नागरिकों को स्वच्छ हवा सांस में लेने का मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत है। यह अधिकार किसी व्यवसायी के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने के व्यावसायिक हितों से बहुत ऊपर और सर्वोपरि है।
- ‘स्मोकिंग ज़ोन’ में भी कोई सेवा नहीं दी जा सकती:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2017 के संशोधित नियम 4(3) के तहत धूम्रपान क्षेत्र (Designated Smoking Area) के भीतर भोजन, पेय पदार्थ, तंबाकू या हुक्का जैसी किसी भी प्रकार की सेवा (Service) देने पर पूर्ण प्रतिबंध है। इस नियम का उद्देश्य वहां काम करने वाले वेटर और कर्मचारियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
- नगर निगम या खाद्य सुरक्षा विभाग को लाइसेंस का अधिकार नहीं:कोर्ट ने कहा कि खाद्य सुरक्षा विभाग या नगर निगमों के पास रेस्तरां में हुक्का बार चलाने या हुक्का परोसने के लिए नियम बनाने या लाइसेंस जारी करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है।
- पुलिस की कार्रवाई का अधिकार कायम:अदालत ने साफ किया कि COTPA कानून का उल्लंघन करने वाले रेस्तरांओं और हुक्का बारों पर छापेमारी करने, उपकरण/तंबाकू जब्त करने और जुर्माना लगाने की पुलिस की शक्तियां पूरी तरह वैध हैं।
- हुक्का के खतरों पर चेतावनी:पीठ ने टिप्पणी की कि यह एक गलत धारणा है कि हुक्का सिगरेट से कम हानिकारक होता है। एक घंटे के हुक्का सत्र में 200 पफ लिए जाते हैं, जो 100 सिगरेट पीने के बराबर नुकसानदेह है। कोर्ट ने यूपी सरकार को अन्य राज्यों की तरह हुक्का परोसने पर सख्त दंडात्मक नियम बनाने और हुक्का पर भी सिगरेट की तरह वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनी लागू करने पर विचार करने को कहा।
प्रयागराज: सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health), वायु प्रदूषण नियंत्रण, रेस्तरांओं में तंबाकू उत्पादों के विनियमन और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ हवा में सांस लेने के अधिकार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने रेस्तरां संचालकों द्वारा पुलिसिया कार्रवाई व हस्तक्षेप के खिलाफ दायर 81 याचिकाओं के समूह को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि रेस्तरांओं में बने ‘निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र’ (Designated Smoking Area – DSA) के भीतर भी हुक्का परोसना पूर्णतः और बिना किसी छूट के प्रतिबंधित है। उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि उत्तर प्रदेश राज्य के किसी भी रेस्तरां में हुक्का बार चलाना या ग्राहकों को हुक्के की सेवा (Hookah Service) प्रदान करना सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA) तथा पब्लिक प्लेसेस रूल्स, 2008 (यथासंशोधित 2017) का खुला उल्लंघन है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक अवलोकन
1. अनुच्छेद 21 (स्वच्छ हवा) बनाम अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता)
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ ने दोनों संवैधानिक अधिकारों के टकराव पर स्पष्ट रूप से रेखांकित किया: “सार्वजनिक स्थान पर गैर-धूम्रपान करने वाले (Non-Smoker) नागरिक का स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक गारंटीकृत मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने का अधिकार रखने वाले किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के वित्तीय या वाणिज्यिक हितों के लिए कम या छीना नहीं जा सकता।”
2. 2017 के संशोधित नियम 4(3) का पूर्ण प्रतिबंध (Absolute Prohibition)
- अदालत ने ‘सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियमावली, 2008’ के नियम 4(3) (जिसे 2017 में संशोधित किया गया था) का विश्लेषण करते हुए कहा:“नियम 4(3) में 2017 का संशोधन किसी भी ‘डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया’ (DSA) के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा पर पूर्ण और बिना शर्त प्रतिबंध (Absolute and Unqualified Prohibition) लगाता है। यह निषेध किसी भी प्रकार की सेवा को छूट नहीं देता—चाहे वह भोजन, पेय पदार्थ, तंबाकू उत्पाद, हर्बल उत्पाद या हुक्का की सेवा ही क्यों न हो।”
- अदालत ने रेस्तरां संचालकों की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि वे हुक्का परोसने के बजाय केवल उपकरण ‘किराए’ पर देते हैं या वह ‘सेल्फ-सर्विस’ है। पीठ ने कहा कि लेनदेन की शब्दावली नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप (Substance of Transaction) को देखना होगा।
3. ‘वेटिंग स्टाफ और गैर-धूम्रपान कर्मियों की सुरक्षा’
- अदालत ने स्पष्ट किया कि धूम्रपान क्षेत्र में ‘नो सर्विस’ (No Service) का नियम इसलिए बनाया गया है ताकि रेस्तरां के वेटर, सर्विस स्टाफ और गैर-धूम्रपान करने वाले कर्मचारियों को जहरीले धुएं (Passive Smoking) के संपर्क में आने से बचाया जा सके। जब कोई रेस्तरां हुक्का तैयार करके कोयला, पाइप और तंबाकू टेबल पर सर्व करता है, तो वह सीधे कानून का उल्लंघन करता है।
4. भ्रांति पर प्रहार: ‘हुक्का सिगरेट जितना ही हानिकारक और विषाक्त’
- अदालत ने समाज में फैली इस धारणा को खारिज किया कि हुक्का सिगरेट से कम हानिकारक है: “हुक्का सिगरेट जितना ही व्यसनकारी (Addictive) है, सिगरेट जितना ही जानलेवा व हानिकारक है, और इसमें सिगरेट के समान ही जहरीले रसायन (Toxic Chemicals) मौजूद होते हैं।”
- अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जिस प्रकार सिगरेट के प्रत्येक पैकेट पर वैधानिक चेतावनी अनिवार्य है, उसी प्रकार हुक्के पर भी ऐसी चेतावनी को लेकर विधायी ध्यान देने की तत्काल आवश्यकता है।
5. खाद्य सुरक्षा विभाग और नगर निगम के पास लाइसेंस देने की शक्ति नहीं
- उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि राज्य के खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) विभाग या स्थानीय नगर निगमों के पास रेस्तरां में हुक्का बार स्थापित करने या हुक्का सेवा प्रदान करने का कोई विधिक लाइसेंस जारी करने का सांविधिक अधिकार नहीं है।
- इसके साथ ही, अदालत ने यह भी साफ किया कि पुलिस प्रशासन के पास COTPA अधिनियम के तहत नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों पर छापेमारी करने, उपकरण व तंबाकू जब्त करने (Search & Seizure), सामग्री कुर्क करने और वैधानिक अर्थदंड अधिरोपित करने की पूर्ण कानूनी शक्तियां मौजूद हैं।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक विवाद
- 81 याचिकाओं का समूह: उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों (लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, प्रयागराज, कानपुर आदि) के रेस्तरां और कैफे संचालकों (मुख्य याचिका: आफटेक फूड्स एंड बेवरेजेस प्राइवेट लिमिटेड) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं।
- याचिकाकर्ताओं की दलील:
- संचालकों का तर्क था कि उनके पास वैध खाद्य एवं रेस्तरां लाइसेंस मौजूद हैं और उन्होंने अपने परिसर में अलग से ‘स्मोकिंग जोन’ (DSA) बना रखे हैं।
- उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस बिना किसी विधिक अधिकार के उनके परिसरों में छापेमारी कर रही है, ग्राहकों को परेशान कर रही है और उनके वैध व्यापार में अड़चन डाल रही है।
- उनका कहना था कि जब कानून में हुक्का पीने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, तो वे वयस्कों को हर्बल या तंबाकू हुक्का उपलब्ध कराने के हकदार हैं।
- राज्य सरकार का रुख:
- अपर महाधिवक्ता और राज्य के वकीलों ने कड़ा विरोध करते हुए दलील दी कि रेस्तरां सार्वजनिक स्थान हैं। हुक्का बार की आड़ में नाबालिगों को नशे की ओर धकेला जा रहा है और 2017 के संशोधित नियमों के तहत स्मोकिंग जोन में किसी भी प्रकार की टेबल सर्विस गैरकानूनी है।
निर्णय का उपसंहार और राज्य को निर्देश
अदालत ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का निर्देश दिया ताकि इसका सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके:
- अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि वह अन्य राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि) की तर्ज पर हुक्का बारों के पूर्ण निषेध को लागू करने के लिए कड़े दंडात्मक प्रावधानों वाली औपचारिक अधिसूचना जारी करने पर विचार करे।
- फैसले के उपसंहार में न्यायाधीश ने तंबाकू के दुष्प्रभावों और मानवीय जीवन की रक्षा पर भी गंभीर साहित्यिक व न्यायिक चिंतन व्यक्त किया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आफटेक फूड्स एंड बेवरेजेस प्राइवेट लिमिटेड व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – 81 याचिकाओं का समूह – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA):
- धारा 4 (सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान का सामान्य निषेध एवं परंतुक के तहत डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया)
- धारा 12, 13 एवं 14 (सर्च, जब्ती और जब्तीकरण की पुलिस शक्तियां)
- सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियमावली, 2008 (यथासंशोधित 2017) का नियम 4(3) (स्मोकिंग एरिया में किसी भी प्रकार की सर्विस पर पूर्ण प्रतिबंध)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण एवं स्वास्थ्य की रक्षा)
- अनुच्छेद 19(1)(g) सहपठित अनुच्छेद 19(6) (व्यापार की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में उचित प्रतिबंध)
- अनुच्छेद 47 (जन स्वास्थ्य के संवर्धन हेतु राज्य का दायित्व)
- सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- मुरली एस. देवड़ा बनाम भारत संघ (2001, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान से गैर-धूम्रपान करने वालों के स्वास्थ्य को होने वाला नुकसान अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है; सार्वजनिक स्थलों पर स्मोकिंग पर प्रतिबंध वैध है।’
- नारायणन बनाम केरल राज्य (केरल हाईकोर्ट) — ‘रेस्तरां या भोजन परोसने वाले किसी भी सार्वजनिक स्थान पर हुक्का परोसना सार्वजनिक स्वास्थ्य और युवा पीढ़ी की सुरक्षा के लिए पूर्णतः निषिद्ध है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: सभी 81 याचिकाएं खारिज; यूपी के किसी भी रेस्तरां में हुक्का बार संचालन और सेवा पूर्णतः गैरकानूनी घोषित; पुलिस को जब्ती और दंडात्मक कार्रवाई जारी रखने के स्पष्ट निर्देश।
Hookah Service: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति शेखर बी. सर्राफ एवं न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी |
| याचिकाकर्ता | हुक्का बार व रेस्तरां संचालक (अफटेक फूड्स एंड बेवरेजेज प्रा. लि. व अन्य) |
| मुख्य निर्णय | यूपी के रेस्तरांओं में हुक्का बार/हुक्का सेवा पर रोक; पुलिस को जब्ती व कार्रवाई के पूरे अधिकार। |
| कानूनी आधार | COTPA अधिनियम, 2003 एवं ‘सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान का निषेध नियम, 2008’ का नियम 4(3) (2017 में संशोधित)। |

