Thursday, October 1, 2026
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Special intensive revision:  ‘EC पोस्ट ऑफिस नहीं’—SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

Special intensive revision: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, देश में पहले कभी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) नहीं हुई, यह तर्क चुनाव आयोग के उन फैसलों की वैधता पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता, जिनमें कई राज्यों में मतदाता सूची की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाई जा रही है।

SIR की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने SIR की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू की। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के पास फॉर्म-6 में दर्ज प्रविष्टियों की शुद्धता तय करने की अंतर्निहित संवैधानिक शक्ति है। फॉर्म-6 वह आवेदन है, जिसे भरकर कोई भी नागरिक मतदाता बनने के लिए अपना नाम शामिल कराता है।

आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं: सुप्रीम कोर्ट

बेंच ने दोहराया कि आधार कार्ड नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। CJI ने कहा, “आधार तो लाभ देने के लिए बना है। कोई व्यक्ति राशन के लिए आधार ले आया, तो क्या उसे मतदाता भी मान लिया जाए? मान लें कोई पड़ोसी देश का व्यक्ति यहां मजदूरी करता है…” बेंच ने एक दलील से असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि फॉर्म-6 जमा होने पर EC को नाम जोड़ना ही होगा। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, “प्रथम दृष्टया हां… जब तक कोई विपरीत सामग्री न हो।” इस पर कोर्ट ने कहा, “चुनाव आयोग के पास हमेशा दस्तावेजों की शुद्धता तय करने की संवैधानिक शक्ति रहती है।”

तमिलनाडु, केरल और बंगाल में SIR पर अलग-अलग तारीखों पर सुनवाई

– तमिलनाडु में SIR को चुनौती वाली याचिकाओं पर EC को 1 दिसंबर तक जवाब देना होगा। याचिकाकर्ता 2 दिसंबर तक rejoinder देंगे। सुनवाई 4 दिसंबर को होगी।
– केरल में SIR के खिलाफ याचिकाओं पर EC को 1 दिसंबर तक जवाब देना होगा। सुनवाई 2 दिसंबर को।
– बंगाल में SIR पर सुनवाई 9 दिसंबर को होगी। इस दौरान BLOs की कथित आत्महत्याओं का मुद्दा भी उठा। EC को वीकेंड में जवाब दाखिल करना होगा।
राज्य चुनाव आयोग और राज्य सरकार भी 1 दिसंबर तक अपना जवाब दे सकती है।

SIR लोकतांत्रिक अधिकार पर बोझ: सिब्बल

सिब्बल ने दलीलें शुरू करते हुए कहा कि SIR लोकतंत्र को प्रभावित करने वाला मुद्दा है, और यह साधारण मतदाताओं, खासकर अशिक्षित लोगों पर असंवैधानिक बोझ डालता है। उन्होंने कहा, “फॉर्म भरना मतदाता की जिम्मेदारी नहीं। कई लोग पढ़-लिख नहीं सकते। फॉर्म नहीं भर पाएंगे तो सूची से बाहर हो जाएंगे।” उन्होंने तर्क दिया कि एक बार नाम मतदाता सूची में दर्ज होने पर उसकी वैधता की धारणा बन जाती है। उन्होंने जोर दिया कि फॉर्म-6 का सेल्फ-डिक्लेरेशन नागरिकता का स्वीकार्य आधार है, “इसे बरकरार रखने के लिए अलग से कठोर मानक नहीं लगाए जा सकते।” सिब्बल ने कहा, “मेरे पास आधार है, यानी मैं यहां रहता हूं। आप इसे हटाना चाहते हैं तो नियम के मुताबिक हटाइए और उस प्रक्रिया की जांच अदालत में हो।” उन्होंने कहा कि इतने कम समय में डेटा इकट्ठा करना असंभव है। “देश के दूरदराज इलाकों में लोग एन्यूमरेशन फॉर्म भरना जानते भी नहीं”।

कोर्ट: फॉर्म-6 से ही नाम शामिल होगा, पर जांच जरूरी

जस्टिस बागची ने कहा कि फॉर्म-6 चुनाव आयोग को बिना जांच प्रविष्टियां स्वीकारने के लिए बाध्य नहीं करता। उन्होंने मृत मतदाताओं के हटाने की जरूरत का भी जिक्र किया।

असम में SIR पर सवाल

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने असम के SIR दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि वे अधिकारियों को गलत तरीके से नागरिकता तय करने का अधिकार देते हैं। CJI ने कहा कि असम का मामला विशिष्ट है—वहां D-वोटर्स पर फैसला विदेशी न्यायाधिकरण लेते हैं, BLO नहीं। वहीं, सिब्बल ने जोर दिया कि नागरिकता या मानसिक अक्षमता जैसी बातें केवल सक्षम वैधानिक प्राधिकरण—जैसे गृह मंत्रालय—ही तय कर सकता है। “BLO को इन मामलों में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं,” उन्होंने कहा। उन्होंने SIR को “त्रुटिपूर्ण और असंवैधानिक” बताया।

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