At A Glance | एक नजर में
- अदालत की सख्त टिप्पणी: जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने पूछा, “NCPCR का प्रमुख कौन है? वे इतने उदासीन कैसे हो सकते हैं?”
- व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश: अगली सुनवाई (27 अक्टूबर) में NCPCR अध्यक्ष और निदेशक को अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।
- विवाद का विषय: शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009 की धारा 12(1)(c) का पालन, जो निजी स्कूलों में EWS बच्चों के लिए 25% आरक्षण अनिवार्य करता है।
- सुप्रीम कोर्ट का संदेश: NCPCR की भूमिका केवल राज्यों से आंकड़े या सूचनाएं जुटाने (Data Collation) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे ‘पड़ोसी स्कूलों’ (Neighbourhood Schools) के माध्यम से सामाजिक समावेश को हकीकत में बदलना होगा।
नई दिल्ली: शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त (Private Unaided) स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए अनिवार्य 25 प्रतिशत प्रवेश कोटे के प्रभावी क्रियान्वयन और नियामक निगरानी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सुस्त और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर भारी नाराजगी
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि एनसीपीसीआर के अध्यक्ष (Chairperson) और निदेशक (Director) अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर रहें। अदालत ने दो-टूक कहा कि आयोग केवल राज्यों से आंकड़े संकलित (Collate) करने वाली कोई औपचारिक पोस्ट ऑफिस जैसी संस्था नहीं है, बल्कि आरटीई कानून के तहत एक वैधानिक नियामक संस्था है, जिसके कंधों पर ‘पड़ोस के स्कूलों’ (Neighbourhood Schools) के जरिए वर्ग, जाति और लैंगिक भेदभाव को तोड़ने का बड़ा दायित्व है। सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के सुस्त और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर भारी नाराजगी व्यक्त करते हुए उसके दाखिल हलफनामे को “असंतोषजनक” करार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं तीखी टिप्पणियां
1. ‘NCPCR का प्रमुख कौन है? वे इतने उदासीन कैसे हो सकते हैं?’ न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने एनसीपीसीआर की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी को संबोधित करते हुए कहा:
“अपर सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या, आप जानती हैं कि एनसीपीसीआर की इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। आपने हमारा फैसला देखा है ना? यह एक वैधानिक प्राधिकरण (Statutory Authority) है। जो कोई भी एनसीपीसीआर का प्रमुख है, उसे इस बात के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है कि आयोग के कंधों पर कितनी उम्मीदें और भरोसा रखा गया है। यह आरटीई अधिनियम के तहत नियामक निकाय है। इसलिए अधिनियम की धारा 12 के तहत परिकल्पित कानून के उद्देश्य और ‘पड़ोस के स्कूलों’ की अवधारणा को उन्हें ही धरातल पर हकीकत बनाना होगा।
वे इतने उदासीन (Indifferent) कैसे हो सकते हैं? एनसीपीसीआर का प्रमुख कौन है? हम उन्हें अगली सुनवाई पर उपस्थित रहने के लिए कहेंगे। यह कोई अवमानना (Contempt) की कार्यवाही नहीं है। यह केवल राज्यों से डेटा संकलित करने का सवाल नहीं है; उन्हें धारा 12 के वास्तविक उद्देश्य को संबोधित करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक पड़ोस का स्कूल इस अवधारणा को प्रभावी ढंग से लागू करे।”
2. ‘हम आयोग को सशक्त करेंगे, वे खुद को केवल कागजों तक सीमित न समझें’
- जब अदालत को बताया गया कि 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस संबंध में अपनी प्रतिक्रिया भेजी है और मसौदा केंद्रीय आरटीई नियम भी प्रसारित किए गए हैं, तथा एनसीपीसीआर को अभी कई कदम उठाने हैं, तो पीठ ने स्पष्ट किया:“हम उन्हें और अधिक कदम उठाने के लिए सशक्त (Empower) करेंगे। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे केवल कागजों (Just on paper) पर रहने के लिए हैं।”
मामले की विधिक पृष्ठभूमि: धारा 12(1)(c) और ‘सामाजिक एकीकरण’ का उद्देश्य
- जनवरी 2026 का ऐतिहासिक निर्णय:
- सर्वोच्च न्यायालय पूरे देश में शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 12(1)(c) के क्रियान्वयन की निरंतर निगरानी कर रहा है।
- जनवरी 2026 में पारित अपने विस्तृत निर्णय में शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में 25% सीटें आरक्षित करने का उद्देश्य केवल गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना भर नहीं है, बल्कि समाज के विभिन्न आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के बच्चों को एक ही छत के नीचे साथ पढ़ाकर सामाजिक एकीकरण (Social Integration) को बढ़ावा देना और वर्ग, जाति व लिंग की खाई को पाटना है।
- NCPCR को पक्षकार बनाने का उद्देश्य:
- इस आदेश के अनुपालन हेतु अदालत ने एनसीपीसीआर को एक पक्षकार के रूप में जोड़ा था ताकि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा बनाए गए नियमों की समीक्षा करे, मानक संचालन प्रक्रिया (SoP) का क्रियान्वयन सुनिश्चित करे और राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी रखे।
धारा 12(1)(c) का वैधानिक ढांचा
- निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act, 2009):
- धारा 12(1)(c) के तहत, प्रत्येक निजी गैर-सहायता प्राप्त (Private Unaided) स्कूल के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी प्रारंभिक कक्षा (कक्षा 1 या प्री-स्कूल) की कुल स्वीकृत क्षमता का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा पड़ोस के कमजोर वर्गों (Economically Weaker Sections – EWS) और वंचित समूहों (Disadvantaged Groups – DG) के बच्चों के लिए आरक्षित रखेगा और उन्हें आठवीं कक्षा तक मुफ्त प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराएगा।
- सरकार इन छात्रों की शिक्षा पर आने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति (Reimbursement) प्रति-बच्चा राज्य लागत के आधार पर स्कूलों को करती है।
- NCPCR का विधिक अधिदेश:
- आरटीई अधिनियम, 2009 की धारा 31 के तहत राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को पूरे देश में बच्चों के शिक्षा के अधिकार के संरक्षण, निगरानी और उल्लंघन की शिकायतों की जांच करने का वैधानिक दायित्व सौंपा गया है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दिनेश बिवाजी अष्टीकर बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- एनसीपीसीआर / केंद्र की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता व वकील
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act, 2009):
- धारा 12(1)(c) (निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में 25% ईडब्ल्यूएस/वंचित वर्ग का आरक्षण)
- धारा 31 एवं 32 (एनसीपीसीआर और राज्य बाल आयोगों द्वारा निगरानी और शिकायतों का निवारण)
- बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (CPCR Act, 2005) की धारा 13 एवं 14 (आयोग के कार्य, जांच शक्तियां और सिविल कोर्ट के अधिकार)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21A (6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार)
- निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act, 2009):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- सोसाइटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स ऑफ राजस्थान बनाम भारत संघ (2012, सुप्रीम कोर्ट 3-जज बेंच) — ‘आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(c) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया; निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल सामाजिक दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते।’
- प्रमथी एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ (2014, 5-जज संविधान पीठ) — ‘अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर सभी निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों पर 25% ईडब्ल्यूएस कोटा अनिवार्य रूप से लागू होता है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्देश: एनसीपीसीआर के अध्यक्ष और निदेशक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का आदेश; मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को तय।
Admission Quota:Key Indicators | मुख्य बिंदु
| संकेत बिंदु | विवरण |
| मामला/याचिका | दिनेश बीवाजी आष्टीकर बनाम महाराष्ट्र राज्य |
| सुप्रीम कोर्ट की पीठ | जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे |
| NCPCR की ओर से पेश वकील | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी |
| मूल वैधानिक प्रावधान | RTE अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) – गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों की शुरुआती कक्षाओं में 25% EWS कोटा। |
| सुप्रीम कोर्ट का रुख | “यह अवमानना की कार्यवाही नहीं है, लेकिन आयोग को अपनी वैधानिक जिम्मेदारी और उम्मीदों के प्रति संवेदनशील होना होगा।” |
| अगली सुनवाई की तारीख | 27 अक्टूबर |

