Sex Discrimination: सुप्रीम कोर्ट ने देश में महिलाओं और विशेषकर बच्चियों के साथ होने वाले भेदभाव पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
कोर्ट ने कहा कि कन्या भ्रूण हत्या (Female Foeticide) इस सामाजिक बुराई का सबसे वीभत्स और क्रूर रूप है।
कोर्ट के कड़े शब्द
-भेदभाव अब भी जारी: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा, “देश के कई हिस्सों में बच्चियों और महिलाओं के साथ भेदभाव आज भी व्याप्त है। लिंग निर्धारण (Sex Determination) इस अपराध की ओर बढ़ने वाला पहला कदम है।”
- संविधान का हवाला: बेंच ने स्पष्ट किया कि PCPNDT एक्ट का मुख्य उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘बच्ची के जीवन के अधिकार’ की रक्षा करना है।
मामला क्या था?
गुड़गांव के एक रेडियोलॉजिस्ट (डॉ. नरेश कुमार गर्ग) ने अपने खिलाफ दर्ज PCPNDT एक्ट के मामले को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- ट्रायल नहीं रुकेगा: कोर्ट ने केस को शुरुआती स्तर पर (Nip in the bud) खत्म करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर ने गर्भवती महिला की सोनोग्राफी की थी, अब उन्होंने नियमों के अनुसार रिकॉर्ड रखा या नहीं, यह ट्रायल (मुकदमे) का विषय है।
- रिकॉर्ड रखना अनिवार्य: कोर्ट ने दोहराया कि रिकॉर्ड को निर्धारित फॉर्म में न रखना अपने आप में एक अपराध है।
प्रक्रिया में खामी पर भी उठी उंगली
हालांकि कोर्ट ने ट्रायल जारी रखने को कहा, लेकिन छापेमारी (Raid) के तरीके में गलती भी निकाली। कोर्ट ने पाया कि रेड मारने का फैसला डिस्ट्रिक्ट एप्रोप्रियेट अथॉरिटी द्वारा सामूहिक रूप से नहीं लिया गया था, बल्कि सिर्फ सिविल सर्जन के आदेश पर किया गया था। कानूनी तौर पर ऐसी छापेमारी के लिए पूरी अथॉरिटी की सहमति और बैठक का रिकॉर्ड होना जरूरी है।
कानून का उद्देश्य (PCPNDT Act)
- अदालत ने समझाया कि यह कानून क्यों जरूरी है: लिंगानुपात (Sex Ratio): गिरते लिंगानुपात को रोकना।
-हिंसा पर लगाम: बिगड़ा हुआ लिंगानुपात महिलाओं के खिलाफ हिंसा, तस्करी (Trafficking) और ‘दुल्हन खरीदने’ जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देता है।

