Friday, May 29, 2026
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The Certified vs Web Copy Dispute: यह तो गंभीर मसला है…आयोग की वेब कॉपी व प्रतिमाणित कॉपी में अंतर कैसे हो गया, इस पर विचार करें

The Certified vs Web Copy Dispute: दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) को एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामले की जांच करने का निर्देश दिया है।

NCDRC के प्रमाणित प्रति में अंतर मामले पर सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह की शिकायत पर स्वयं NCDRC द्वारा उचित विचार किया जाना आवश्यक है और आयोग को इन आरोपों पर अपने विशिष्ट निष्कर्ष (Specific Findings) दर्ज करने चाहिए। अदालत ने आयोग से उस याचिकाकर्ता के आरोपों की जांच करने को कहा है जिसमें दावा किया गया है कि NCDRC पोर्टल पर अपलोड की गई आदेश की वेब कॉपी (Web Copy) और बाद में उन्हें दी गई प्रमाणित प्रति (Certified Copy) के बीच अंतर था।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता का दावा: यह याचिका NCDRC की निष्पादन कार्यवाहियों (Execution Proceedings) से जुड़े एक आदेश में “चोरी-छिपे हटाने” (Surreptitious Deletion) और बदलाव करने के आरोपों के बाद दायर की गई थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, NCDRC की वेबसाइट पर मूल रूप से 3 अक्टूबर 2024 को एक आदेश अपलोड किया गया था। लेकिन बाद में उस आदेश को पोर्टल से हटा दिया गया और उसकी जगह दूसरा संस्करण (Version) अपलोड कर दिया गया।

प्रमाणित प्रति में अंतर: जब याचिकाकर्ता ने इस विसंगति को लेकर NCDRC का रुख किया, तो आयोग ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वे हस्ताक्षरित आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) प्रदान करें। हालांकि, याचिकाकर्ता का आरोप है कि जो प्रमाणित प्रति उन्हें सौंपी गई, वह वेबसाइट पर शुरू में दिखे आदेश से काफी अलग थी। उनके पास इस विसंगति को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

हाई कोर्ट की विधिक टिप्पणी और नजीर (Judicial Precedent)

दस्तावेजों और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने न्यायिक शुचिता और रिकॉर्ड के रखरखाव पर एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया। कहा, यदि किसी पक्षकार को लगता है कि अदालत की कार्यवाही को गलत तरीके से रिकॉर्ड किया गया है या आदेश के रूप में गलत कॉपी अपलोड की गई है, तो संबंधित अदालत/फोरम के पास ही उसे सुधारने या दुरुस्त करने का कानूनी अधिकार है।

‘रामदास श्रीनिवास नायक’ मामले का हवाला

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम रामदास श्रीनिवास नायक (1982)’ पर भरोसा जताया। इस फैसले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि न्यायिक रिकॉर्ड (Judicial Records) आमतौर पर अकाट्य और अंतिम (Conclusive) माने जाते हैं।
यदि किसी रिकॉर्डिंग या आदेश की सटीकता को लेकर कोई चुनौती या विवाद है, तो उसे अनिवार्य रूप से उसी फोरम या अदालत के समक्ष उठाया जाना चाहिए जिसने वह आदेश पारित किया है, न कि सीधे किसी उच्च अदालत में।

अदालत का अंतिम निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पास मौजूद सबूतों को ध्यान में रखते हुए NCDRC को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से पुनर्विचार (Reconsider) करे। आयोग को यह जांच करनी होगी कि तकनीकी या प्रशासनिक स्तर पर आदेशों के अपलोडिंग में क्या विसंगति हुई थी और अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
माननीय उच्च न्यायालय बेंचजस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव (दिल्ली हाई कोर्ट)
प्रतिवादी संस्थाराष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC)
मुख्य विवादNCDRC पोर्टल की वेब कॉपी और आधिकारिक प्रमाणित प्रति (Certified Copy) में अंतर।
कानूनी नजीर (Precedent)स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम रामदास श्रीनिवास नायक (1982)
अदालत का आदेशNCDRC को पूरे मामले की जांच कर विशिष्ट निष्कर्ष (Findings) जारी करने का निर्देश।
पक्षकारों के वकीलयाचिकाकर्ता: एडवोकेट मोहित चौधरी, कुना सचदेवा, नवीन शर्मा
प्रतिवादी: सुश्री गौरी गोबर्धन (सीनियर पैनल काउंसिल)

निष्कर्ष (Takeaway)

यह मामला डिजिटल अदालती रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। आजकल आम लोग और वकील वेबसाइट पर अपलोड होने वाले आदेशों (Web Copies) पर पूरी तरह भरोसा करते हैं। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि यदि तकनीकी खराबी या किसी अन्य कारण से ऑनलाइन और ऑफलाइन कॉपियों में अंतर आता है, तो मूल अदालत को अपनी रजिस्ट्री के कामकाज की जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी होगी ताकि न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता बनी रहे।

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