ANIMALS CUSTODY: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि जो मुकदमे की सुनवाई लंबित रहने के दौरान पशुओं को मालिकों की कस्टडी (हिरासत) से बाहर रखने की अनुमति देते हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए इसे इसी तरह के मुद्दे पर लंबित एक अन्य याचिका के साथ जोड़ दिया है। शीर्ष अदालत नियमों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है।
विवाद की मुख्य जड़ क्या है?
- याचिका में मुख्य रूप से ‘पशु क्रूरता निवारण (केस प्रॉपर्टी पशुओं की देखभाल और रखरखाव) नियम, 2017’ के नियम 3 को चुनौती दी गई है।
- याचिकाकर्ता का तर्क: नियम 3 के तहत, किसी व्यक्ति पर दोष सिद्ध (Conviction) होने से पहले ही उसके पशुओं को जब्त करना, स्थानांतरित करना या मालिकाना हक से स्थायी रूप से वंचित करना असंवैधानिक है।
- कानूनी विरोधाभास: याचिका में कहा गया है कि यह नियम 1960 के मूल अधिनियम की धारा 29 के खिलाफ है। धारा 29 के अनुसार, केवल दोषी ठहराए जाने के बाद ही अदालत किसी व्यक्ति को पशु के स्वामित्व से वंचित करने की शक्ति रखती है।
संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
- याचिका में दावा किया गया है कि वर्तमान नियम संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेदों का उल्लंघन करते हैं।
- अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता का अधिकार।
- अनुच्छेद 300A: किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति (पशुओं को संपत्ति माना गया है) से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले का महत्व
अक्सर पशु क्रूरता के आरोपों में पुलिस या संबंधित संस्थाएं मुकदमे के दौरान ही पशुओं को जब्त कर गौशालाओं या शेल्टर होम भेज देती हैं। पशु मालिकों का तर्क है कि जब तक वे दोषी साबित नहीं होते, तब तक उनकी आजीविका के साधन (जैसे मवेशी) उनसे छीनना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। सुप्रीम कोर्ट अब इस बात की जांच करेगा कि क्या 2017 के नियम अपनी शक्तियों का उल्लंघन कर रहे हैं या वे पशु कल्याण के लिए आवश्यक हैं।

