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Social Justice: नाम का लाभ नहीं, काम का अधिकार चाहिए… राजस्थान HC ने ट्रांसजेंडर्स को दिया 3% एक्स्ट्रा मार्क्स का वेटेज

Social Justice: राजस्थान हाई कोर्ट (जोधपुर बेंच) ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए ‘अफरमेटिव एक्शन’ (सकारात्मक कार्रवाई) पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

अधिसूचना बिना सार के अभ्यास है: कोर्ट

हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने गंगा कुमारी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार की 12 जनवरी 2023 की उस अधिसूचना को “बिना सार के अभ्यास” (Exercise in form without substance) करार दिया, जिसमें ट्रांसजेंडर्स को केवल OBC माना गया था। कोर्ट ने माना कि ट्रांसजेंडर्स को केवल OBC श्रेणी में डाल देना उन्हें वास्तविक लाभ देने के लिए “अपर्याप्त” है। अंतरिम राहत के रूप में, कोर्ट ने सरकारी भर्तियों और प्रवेश परीक्षाओं में उन्हें 3% अतिरिक्त अंकों (Mark Weightage) का लाभ देने का निर्देश दिया है।

कोर्ट का मुख्य तर्क: OBC वर्गीकरण क्यों है फेल?

  • अदालत ने याचिकाकर्ता की उन दलीलों में दम पाया जिनमें कहा गया था कि ट्रांसजेंडर्स को केवल OBC लिस्ट में डालने से उन्हें कोई वास्तविक फायदा नहीं हो रहा है।
  • नुकसानदेह विकल्प: यदि कोई ट्रांसजेंडर SC/ST वर्ग से है, तो OBC में शामिल होने पर उसे अपने मूल आरक्षण के लाभ से हाथ धोना पड़ता है, जो उसके लिए नुकसानदेह है।
  • शून्य परिणाम: राज्य सरकार खुद यह साबित नहीं कर पाई कि इस पुरानी नीति से अब तक किसी भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को कोई वास्तविक लाभ मिला हो।
  • संविधान का मजाक: कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक गारंटियों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता; उनका असर जमीनी स्तर पर दिखना चाहिए।

राजस्थान HC के दो प्रमुख निर्देश

  • कोर्ट ने इस मुद्दे के स्थायी समाधान के लिए राज्य सरकार को दो कड़े निर्देश दिए हैं।
  • पहला निर्देश: 3% अतिरिक्त अंक (Interim Relief) के तहत जब तक राज्य सरकार ट्रांसजेंडर्स के लिए कोई व्यापक नीति (Comprehensive Policy) नहीं बना लेती, तब तक सभी राज्य-स्तरीय भर्तियों और शैक्षणिक संस्थानों के प्रवेश में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंकों का वेटेज दिया जाएगा।
  • दूसरे निर्देश: B. हाई-लेवल कमेटी का गठन में सरकार को एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने का आदेश दिया गया है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन का विस्तृत अध्ययन करेगी। उनके लिए एक उपयुक्त आरक्षण ढांचे (Reservation Framework) की सिफारिश करेगी। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार को एक नई नीतिगत निर्णय लेना होगा।
  • क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) पर कोर्ट का रुख: याचिकाकर्ता ने ‘हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन’ (जैसे महिलाओं या दिव्यांगों को मिलता है) की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने इस स्तर पर इसे अनिवार्य करने से इनकार कर दिया:
  • न्यायिक सीमा: कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का ढांचा तैयार करना ‘कार्यपालिका’ (Executive) का काम है, इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं हैं।
  • व्यावहारिक चुनौतियां: ट्रांसजेंडर आबादी का कम हिस्सा और रोस्टर लागू करने की जटिलताओं को देखते हुए, कोर्ट ने फिलहाल वेटेज को ही बेहतर विकल्प माना।

गंगा कुमारी का संघर्ष

बता दें कि गंगा कुमारी राजस्थान की पहली ट्रांसजेंडर पुलिस कांस्टेबल रही हैं। उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर आधारित थी जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को एक अलग वर्ग के रूप में मान्यता देते हुए उनके लिए विशेष प्रावधानों की बात कही गई थी।

यह रहा अदालत का निष्कर्ष: समानता की ओर एक और कदम

राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्यधारा में लाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव साबित होगा। 3% एक्स्ट्रा मार्क्स का वेटेज उन्हें उन बाधाओं को पार करने में मदद करेगा जो सामाजिक भेदभाव के कारण उनके रास्ते में आती हैं।

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