Monday, August 17, 2026
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Black Magic: यदि आरोपी चुप रहता है उसे क्या दोषी मान लेंगे…झारखंड में डायन-बिसाही या अंधविश्वास में हो गई हत्या पर देखिए यह रहा फैसला

Black Magic: झारखंड हाईकोर्ट ने 22 वर्ष पुराने डायन-बिसाही या अंधविश्वास (Witchcraft) से जुड़े हत्या के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया।

यह मामला नवंबर 2000 में हुई ‘अल्फॉश सोरेन’ नाम के एक व्यक्ति की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपियों (तर्सियस सोरेंग और मारियानुस सोरेंग) के माता-पिता की मृत्यु हो गई थी, और उन्हें शक था कि पीड़ित ने उन पर कोई काला जादू (Black Magic) किया था। इसी रंजिश में दोनों भाइयों ने लकड़ी के लट्ठे से पीट-पीटकर उसकी हत्या कर दी।

निचली अदालत की दी सजा को किया रद्द

हाईकोर्ट के जस्टिस रोंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा 22 साल पहले (2004 में) दी गई सजा को रद्द करते हुए कहा कि “गवाहों के बयानों का रुख किसी सच्ची कहानी को नहीं दर्शाता और इस बात में गहरा संदेह है कि आरोपी घटना में शामिल थे। कोर्ट ने दो भाइयों को उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा से बरी (Acquit) कर दिया है।

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मुख्य गवाहों का मुकरना (Eye-Witnesses Turned Hostile)

  • कहानी में विरोधाभास: पुलिस की कहानी के अनुसार, घटना से ठीक पहले पीड़ित अपने दो दोस्तों (समीर लकड़ा और टिंटस सोरेन) के साथ ‘हड़िया’ (चावल की स्थानीय शराब) पी रहा था, तभी उन पर हमला हुआ।
  • अदालत में पलटे गवाह: हालांकि, मुकदमे (Trial) के दौरान ये दोनों मुख्य चश्मदीद गवाह अदालत में अपनी बात से पूरी तरह मुकर गए और उन्हें ‘होस्टाइल’ (Hostile) घोषित कर दिया गया। हाई कोर्ट ने कहा कि मुख्य गवाहों का इस तरह मुकर जाना अपने आप में एक अलग कहानी बयां करता है।

‘संदेह से परे’ सबूत पेश करने में नाकाम रहा अभियोजन पक्ष

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत (Trial Court) के 2004 के फैसले की समीक्षा करते हुए जांच में कई गंभीर खामियां पाईं।
  • भागते हुए देखने का झूठा दावा: पीड़ित के बेटे (शिकायतकर्ता) ने शुरुआत में दावा किया था कि उसने आरोपियों को अपने पिता पर हमला कर भागते हुए देखा था, लेकिन जिरह के दौरान वह इस दावे को साबित नहीं कर सका। कोर्ट ने पाया कि परिवार के सदस्यों के पास आरोपियों को देखने का कोई वास्तविक अवसर ही नहीं था।
  • कानून का सिद्धांत: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आरोपी चुप रहता है या अपने खिलाफ लगे आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं देता, तो उसकी चुप्पी को उसका अपराध नहीं मान लिया जा सकता। कानूनन, किसी भी आरोपी का दोष ‘संदेह के दायरे से परे’ (Beyond reasonable doubt) साबित करने की पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल अभियोजन पक्ष की होती है।
  • माननीय खंडपीठ की मुख्य टिप्पणी: “इस मामले में पेश किए गए साक्ष्यों का रुख किसी सच्ची कहानी के प्रति विश्वास नहीं जगाता। अपीलीय भाइयों की संलिप्तता पूरी तरह से संदिग्ध है। निचली अदालत ने गवाहों के बयानों में मौजूद गंभीर विरोधाभासों को नजरअंदाज करके कानून की बड़ी भूल की थी। इसलिए, दोनों भाइयों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए बरी किया जाता है।”

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य कानूनी बिंदुझारखंड उच्च न्यायालय का निष्कर्ष
माननीय न्यायाधीशजस्टिस रोंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
अपीलकर्ता (आरोपी भाई)तर्सियस सोरेंग (Tarsius Sorang) और मारियानुस सोरेंग (Maryanus Sorang)
घटनाक्रमहत्या की घटना (नवंबर 2000)- निचली अदालत से उम्रकैद (जनवरी 2004) -हाई कोर्ट से बाइज्जत बरी (मई 2026)
फैसले का आधारचश्मदीद गवाहों का मुकरना और परिवार के बयानों में भारी विरोधाभास।

22 साल बाद मिला न्याय

जनवरी 2004 में निचली अदालत ने इन दोनों भाइयों को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराते हुए कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ भाइयों ने हाई कोर्ट में अपील की थी। करीब 22 साल लंबे चले इस कानूनी सफर के बाद, हाई कोर्ट ने माना कि केवल अंधविश्वास की थ्योरी या किसी कहानी के आधार पर किसी को उम्रकैद की सजा नहीं दी जा सकती, जब तक कि पुख्ता और विश्वसनीय सबूत न हों। दोनों भाइयों को जेल से तुरंत रिहा करने का आदेश दिया गया है।

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