Justice for Commandant: कलकत्ता हाई कोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक कमांडेंट के खिलाफ जारी दो ‘कारण बताओ नोटिस’ (Showcause Notices) को रद्द करते हुए बल की कड़ी आलोचना की है।
BSF में शामिल हुए एक कमांडेंट की याचिका पर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने 1988 में BSF में शामिल हुए एक कमांडेंट की याचिका पर सुनवाई करते हुए बल द्वारा उन्हें प्रशासनिक रूप से बर्खास्त करने की कोशिशों को “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन” करार दिया। कोर्ट ने इसे एक ऐसे अधिकारी को नौकरी से निकालने का पूर्वनियोजित (Premeditated) प्रयास बताया, जिसे दो बार की न्यायिक सुनवाई में यौन उत्पीड़न के आरोपों से दोषमुक्त (Not Guilty) पाया जा चुका था।
मामला क्या था? (The 2014 Allegations)
- आरोप: 2014 में एक महिला अधीनस्थ अधिकारी ने कमांडेंट पर व्हाट्सएप के जरिए “यौन संदेश” भेजने का आरोप लगाया था।
- अदालती कार्यवाही: 2017 में ‘जनरल सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट’ (GSFC) ने उन्हें सभी आरोपों से निर्दोष पाया।
- दोबारा सुनवाई: पुष्टि करने वाले अधिकारी (Confirming Authority) असंतुष्ट थे, इसलिए मामले को ‘रिवीजन ट्रायल’ के लिए भेजा गया। सितंबर 2018 में रिविजनल कोर्ट ने फिर से उन्हें “दोषमुक्त” घोषित किया।
प्रशासनिक चुनौती और “पूर्वनियोजित” नोटिस
- दो बार बरी होने के बावजूद, BSF के महानिदेशक (DG) ने दिसंबर 2020 और अप्रैल 2021 में नोटिस जारी किए।
- BSF का तर्क: बल ने दलील दी कि अधिकारी को सेवा में रखना “अवांछनीय” (Undesirable) है क्योंकि कोर्ट के निष्कर्ष सबूतों के खिलाफ थे।
- कोर्ट की टिप्पणी: हाई कोर्ट ने कहा कि जब न्यायिक ट्रायल में दोष सिद्ध नहीं हो सका, तो प्रशासनिक तरीके से अधिकारी को हटाना “दिखावा और आंखों में धूल झोंकने” जैसा है। कोर्ट ने दूसरे नोटिस को “विकृति का ज्वलंत उदाहरण” बताया क्योंकि यह बिना सुनवाई का अवसर दिए जारी किया गया था।
कानूनी अनिवार्यताओं का उल्लंघन
- कोर्ट ने BSF अधिनियम और नियमों की विस्तार से व्याख्या की।
- नियम 22(2): सक्षम प्राधिकारी के लिए यह अनिवार्य है कि वह अधिकारी को सभी प्रतिकूल रिपोर्टों की जानकारी दे और लिखित स्पष्टीकरण मांगे।
- विवेकाधिकार का दुरुपयोग: कानून ने प्राधिकारी को ‘विवेकाधिकार’ (Discretion) दिया है, लेकिन इसका उपयोग न्यायिक तरीके से होना चाहिए, न कि पहले से तय मन (Prejudged Mind) के साथ।
अंतिम फैसला और राहत
- चूँकि याचिकाकर्ता इसी महीने (मार्च 2026) रिटायर होने वाले हैं, कोर्ट ने मामले को वापस भेजने (Remand) के बजाय सीधे आदेश दिया।
- नोटिस रद्द: 31 दिसंबर 2020 और 26 अप्रैल 2021 के नोटिस पूरी तरह रद्द कर दिए गए हैं।
- पूर्ण लाभ: कमांडेंट को कानून के अनुसार सभी परिणामी लाभ (Consequential Benefits) 4 सप्ताह के भीतर दिए जाएं।
निष्कर्ष: वर्दी की गरिमा और न्याय
कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए बड़ी मिसाल है जो आंतरिक राजनीति या दुर्भावनापूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई का शिकार होते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि वर्दीधारी बलों में ‘अनुशासन’ के नाम पर किसी के मौलिक अधिकारों और न्यायिक फैसलों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

