Monday, August 17, 2026
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Navy Discipline: वर्दी में सीनियर पर हाथ उठाना बर्दाश्त नहीं…भारतीय नौसेना के एक नाविक के केस में यह दिया संदेश

Navy Discipline: राजस्थान हाई कोर्ट ने भारतीय नौसेना (Indian Navy) के एक नाविक (Sailor) की बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए एक बेहद कड़ा संदेश दिया है।

हाइकोर्ट के जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की बेंच ने पूर्व नौसेना नाविक यशपाल यादव की याचिका खारिज कर दी। यादव ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें सेवा से बर्खास्त करने और 90 दिनों की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सशस्त्र बलों में अनुशासन (Discipline) सर्वोपरि है और अपने वरिष्ठ अधिकारी (Superior Officer) पर हाथ उठाना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है, चाहे उकसावा (Provocation) ही क्यों न हो।

मामला क्या था? (The INS Savitri Incident)

  • घटना: 27 मई, 2013 को INS सावित्री पर तैनात नाविक यशपाल यादव ने अपने वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर ब्रजेश कुमार के साथ मारपीट की थी।
  • चोटें: मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी के नाक से खून बह रहा था, चेहरे पर चोट के निशान थे और कंधे में गंभीर चोट आई थी।
  • नाविक का तर्क: नाविक ने दावा किया कि अधिकारी ने उसे गाली दी और लात मारी, जिसके बाद हुई हाथापाई में दोनों को चोटें आईं। उसने अपनी ‘वेरी गुड’ सर्विस रिकॉर्ड का हवाला देते हुए सजा को बहुत सख्त बताया।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: अनुशासन ही सेना की पहचान

  • अदालत ने अनुशासन को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।
  • खेल का नियम नहीं: कोर्ट ने कहा कि सेना अपनी सख्त अनुशासन के लिए जानी जाती है। यदि कोई भी अधीनस्थ अपने वरिष्ठ पर प्रहार करता है, तो उससे उस पूरे उद्देश्य को धक्का लगता है जिसके लिए सेना का गठन किया गया है।
  • उकसावा कोई बहाना नहीं: “भले ही वरिष्ठ अधिकारी का आचरण कुछ हद तक गलत रहा हो, लेकिन यह किसी अधीनस्थ को अपने सीनियर पर शारीरिक हमला करने का अधिकार नहीं देता।”
  • सख्ती जरूरी: यदि अदालतें ऐसे मामलों में उदारता दिखाने लगें, तो इससे सशस्त्र बलों में गंभीर अनुशासनहीनता पैदा होगी और देश की सुरक्षा के प्रति कर्तव्यों का पालन करना मुश्किल हो जाएगा।

न्यायिक समीक्षा की सीमा (Limited Judicial Review)

  • हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेना के अनुशासनात्मक मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप सीमित होता है।
  • अधिकार क्षेत्र: सजा तय करना सेना के अधिकारियों और विधायिका का कार्यक्षेत्र है।
  • हस्तक्षेप कब?: अदालत केवल तब हस्तक्षेप कर सकती है जब सजा तथ्यों के मुकाबले बहुत ज्यादा (Disproportionate) हो या प्रक्रिया का पालन न किया गया हो। इस मामले में, अधिकारी को लगी गंभीर चोटों को देखते हुए बर्खास्तगी की सजा सही पाई गई।

पिछले मामलों से भिन्नता

याचिकाकर्ता ने कुछ पुराने अदालती फैसलों (जैसे आर. कार्तिक और नितेश राय केस) का हवाला दिया था जहाँ बर्खास्तगी रद्द कर दी गई थी। कोर्ट ने उन्हें खारिज करते हुए कहा, उन मामलों में सबूत कमजोर थे या चोटें गंभीर नहीं थीं। यशपाल यादव के मामले में मेडिकल रिपोर्ट ने साबित कर दिया कि हमला जोरदार और गंभीर था।

निष्कर्ष: जीरो टॉलरेंस की नीति

राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला सैन्य पदानुक्रम (Hierarchy) और ‘कमांड स्ट्रक्चर’ की गरिमा को बनाए रखने की दिशा में एक बड़ी नजीर है। यह साफ करता है कि वर्दी पहनने वाले व्यक्ति के लिए आत्म-संयम अनिवार्य है, और हिंसा का रास्ता चुनने पर करियर और सम्मान दोनों का अंत निश्चित है।

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