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Railway Compensation Row: रेल टिकट गायब हो गया ताे क्या हुआ…मुआवजा का दावा खारिज नहीं हो सकता

Railway Compensation Row: दिल्ली हाई कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना (2016) के एक मामले में मानवीय और न्यायपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की बेंच ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल (RCT) के 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पिंकू नामक युवक की मौत पर उसके माता-पिता को मुआवजा देने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी यात्री की ट्रेन से गिरकर मौत हो जाती है, तो केवल टिकट न मिलने (Missing Ticket) के आधार पर मुआवजे के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था? (The 2016 Incident)

  • घटना: 5 जुलाई, 2016 को पिंकू कानपुर सेंट्रल से नई दिल्ली के लिए ‘भागलपुर-नई दिल्ली एक्सप्रेस’ से यात्रा कर रहा था। दादरी रेलवे स्टेशन के पास वह ट्रेन से गिर गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
  • ट्रिब्यूनल का रुख: 2017 में ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि शव के पास से टिकट बरामद नहीं हुआ, इसलिए वह ‘वैध यात्री’ (Bona fide passenger) नहीं था। साथ ही, चोटों की प्रकृति को देखते हुए इसे ‘अप्रिय घटना’ (Untoward Incident) मानने से इनकार कर दिया गया।

कोर्ट का तर्क: “अनुमान से ऊपर सबूत”

  • हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के नजरिए पर कड़ी आपत्ति जताई।
  • तर्क बनाम तथ्य: “ट्रिब्यूनल का यह दृष्टिकोण कि टिकट न मिलने और चोटों के स्थान के आधार पर दावा खारिज किया जाए, वास्तव में साक्ष्यों के ऊपर अनुमान (Conjecture) को प्राथमिकता देना है।”
  • पिता की गवाही: मृतक के पिता ने हलफनामा दिया था कि उनके बेटे ने उनकी मौजूदगी में कानपुर स्टेशन से टिकट खरीदा था। कोर्ट ने नोट किया कि इस गवाही को रेलवे की ओर से चुनौती नहीं दी गई थी।
  • कल्याणकारी कानून: रेलवे अधिनियम, 1989 एक सामाजिक कल्याण कानून है। इसका उद्देश्य तकनीकी आधारों पर नहीं, बल्कि पीड़ितों को सहायता पहुँचाना है।

अप्रिय घटना’ की व्याख्या (Defining ‘Untoward Incident’)

अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार जब यह स्थापित हो जाता है कि पीड़ित ट्रेन से यात्रा कर रहा था और वहां से गिर गया, तो यह मामला स्वतः अधिनियम के तहत ‘अप्रिय घटना’ की श्रेणी में आता है। टिकट का खो जाना या न मिलना इस सच्चाई को नहीं बदल सकता कि एक दुर्घटना हुई है।

देरी के लिए माफी (Condonation of Delay)

याचिकाकर्ता गरीब और अनपढ़ थे, जिसके कारण अपील दाखिल करने में 1,326 दिनों की देरी हुई थी। कोर्ट ने इस देरी को माफ करते हुए कहा, गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग समय पर कानूनी सलाह नहीं ले पाते। न्याय के हित में तकनीकी खामियों के कारण वास्तविक दावों को विफल नहीं होने देना चाहिए।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निर्णय
पीड़ितपिंकू (2016 की ट्रेन दुर्घटना का शिकार)।
मुख्य बाधायात्रा टिकट की बरामदगी न होना।
हाई कोर्ट का आदेशट्रिब्यूनल का आदेश रद्द, मुआवजा देने का निर्देश।
समय सीमाट्रिब्यूनल को 2 महीने के भीतर मुआवजे की राशि तय कर वितरित करने को कहा।

निष्कर्ष: गरीबों के लिए न्याय का द्वार

यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है जो कानूनी पेचीदगियों और “टिकट गायब होने” जैसे तकनीकी कारणों से रेलवे से मुआवजा नहीं पा पाते। दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘सोशल वेलफेयर लॉ’ का पालन करते समय अदालतों को उदार और न्याय-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

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