Friday, May 22, 2026
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POCSO Case: अगर युवा वयस्कों में आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बने…तो इसे अलग नजरिया से देखना चाहिए, छात्र की जमानत केस को पढ़ें

POCSO Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी करते हुए 19 साल के एक युवक को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे दी है।

शारीरिक संबंधों को लेकर अहम सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस प्रतीक जालान की एकल पीठ ने आरोपी युवक की कम उम्र को देखते हुए उसे हिरासत (Custody) में भेजने के जोखिम से बचाने के पक्ष में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि भले ही कानूनन नाबालिग की सहमति का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन युवा वयस्कों (Young Adults) के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंधों को अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए, भले ही उनका फैसला गुमराह (Misguided) करने वाला ही क्यों न रहा हो।

क्या है पूरा मामला? (The Background)

  • यह मामला एक नाबालिग लड़की की दुखद आत्महत्या से जुड़ा है।
  • आत्महत्या और FIR: 26 जनवरी 2025 को एक नाबालिग लड़की ने खुदकुशी कर ली थी। इसके बाद 6 फरवरी 2025 को पुलिस ने आरोपी युवक के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया।
  • व्हाट्सएप पर वीडियो: अभियोजन पक्ष (Prosecution) का आरोप था कि घटना से एक दिन पहले युवक ने लड़की को व्हाट्सएप पर कुछ आपत्तिजनक/अंतरंग तस्वीरें और वीडियो भेजे थे। इसके अलावा एक वीडियो भी मिला जिसमें लड़का लड़की को मंगलसूत्र पहना रहा था।
  • जांच में नया मोड़: मार्च 2026 में पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट में सामने आया कि दोनों लंबे समय से एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में थे और अपनी मर्जी से एक होटल भी गए थे, जहाँ वो वीडियो रिकॉर्ड किए गए थे। गवाहों के अनुसार, लड़की इस बात से परेशान थी कि लड़के ने किसी दूसरी लड़की के साथ संबंध बनाकर उसे धोखा दिया था।

Also Read; POCSO Case Verdict: नाबालिग से शारीरिक संबंध अपराध है…इसमें रिश्ता या सहमति मायने नहीं रखती, जन्म प्रमाण पत्र को बताया अकाट्य सबूत

हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत देते हुए क्या तर्क दिए?

  • अदालत ने गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी की उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए अपने विशेषाधिकार (Discretion) का इस्तेमाल किया।
  • वीडियो किसी तीसरे पक्ष को नहीं भेजे गए: अदालत ने विशेष रूप से नोट किया कि जो भी आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो थे, वे केवल उन दोनों के बीच की निजी बातचीत (Private Conversation) का हिस्सा थे। आरोपी ने उन्हें किसी तीसरे व्यक्ति (Third Party) या सोशल मीडिया पर वायरल नहीं किया था।
  • वीडियो खुद लड़की ने रिकॉर्ड किए थे: बचाव पक्ष की वकील श्वेता एस. कुमार ने दलील दी कि वीडियो को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि कैमरा खुद लड़की ने पकड़ा हुआ था, जिससे साफ है कि यह सब उसकी मर्जी से हुआ था। युवक एक छात्र है और उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
  • ‘सहमति’ पर कोर्ट का प्रगतिशील नजरिया: जस्टिस प्रतीक जालान ने अपने आदेश में लिखा, पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों से जुड़े मामलों में भले ही कानूनी रूप से सहमति (Consent) का कोई महत्व नहीं है, लेकिन इस अदालत ने हमेशा यह माना है कि युवा वयस्कों के बीच के ऐसे रिश्ते, जहां दोनों की वास्तविक मंजूरी (De facto approval) रही हो, उन्हें एक अलग पायदान (Different footing) पर रखकर देखा जाना चाहिए।

अभियोजन पक्ष और शिकायतकर्ता की दलीलें

  • सरकारी वकील युधवीर सिंह चौहान और पीड़ित पक्ष के वकील संदीप कुमार सिंह ने जमानत का पुरजोर विरोध किया था।
  • नाबालिग और बालिग का संबंध: घटना के समय लड़का बालिग (19 वर्ष) था, जबकि लड़की नाबालिग थी, इसलिए पॉक्सो एक्ट पूरी तरह लागू होता है।
  • जांच में असहयोग का आरोप: पुलिस ने आरोप लगाया कि लड़के ने जांच में सही से सहयोग नहीं किया और उस फोन को देने के बजाय (जिससे वीडियो रिकॉर्ड हुए थे) एक टूटा हुआ फोन पुलिस को सौंप दिया।
  • नेपाल का निवासी: पुलिस ने यह डर भी जताया कि आरोपी मूल रूप से नेपाल का रहने वाला है, इसलिए उसके भारत छोड़कर भागने का खतरा है।
  • मानसिक प्रताड़ना: पीड़ित पक्ष का आरोप था कि लड़का एक साथ कई लड़कियों के साथ रिश्ते में था और उसने अपने दोस्तों को ये वीडियो दिखाकर लड़की को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया था, जिससे तंग आकर उसने आत्मघाती कदम उठाया। हालांकि, कोर्ट ने पुलिस के असहयोग वाले तर्क को खारिज कर दिया क्योंकि लड़के ने उस फोन के इस्तेमाल से ही इनकार किया था।

मामले का अंतिम निष्कर्ष (Case Summary)

मुख्य बिंदुदिल्ली हाई कोर्ट की कानूनी स्थिति
आरोपी की उम्र19 वर्ष (कॉलेज छात्र) – साफ बैकग्राउंड।
अदालती राहतअंतरिम सुरक्षा को बरकरार रखते हुए अग्रिम जमानत मंजूर।
वीडियो सर्कुलेशनकिसी बाहरी व्यक्ति से साझा नहीं किया गया, इसलिए इसे ब्लैकमेलिंग का जरिया नहीं माना गया।
पॉक्सो पर दृष्टिकोणकानून की कड़ाई अपनी जगह है, लेकिन किशोरावस्था/युवावस्था के आपसी सहमति के मामलों में कोर्ट विवेक का इस्तेमाल कर सकता है।

निष्कर्ष (Analysis Takeaway)

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला देश की अदालतों के उस बदलते नजरिए को दर्शाता है, जहाँ ‘रोमियो-जूलियट’ जैसे आपसी सहमति वाले प्रेम संबंधों और वास्तविक यौन अपराधों (Sexual Assault) के बीच अंतर स्पष्ट किया जा रहा है। कोर्ट ने माना कि किसी 19 साल के युवा छात्र को जेल भेजकर उसका करियर और भविष्य दांव पर लगाना सही नहीं है, खासकर तब जब रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित रहा हो और कोई वीडियो लीक न किया गया हो।

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