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Rajasthan HC on Section 319: ट्रायल से पहले एलीबाय का बहाना नहीं चलेगा…कहा- चश्मदीद की गवाही समन भेजने के लिए काफी

Rajasthan HC on Section 319: राजस्थान हाई कोर्ट ने Section 319 CrPC (अब BNSS की धारा 358) के तहत अतिरिक्त आरोपियों को समन करने के संबंध में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप कुमार ढंड की बेंच ने एक आपराधिक मामले में अतिरिक्त आरोपियों को समन करने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा है कि ‘प्ली ऑफ एलीबाय’ (Plea of Alibi) यानी अपराध के समय कहीं और मौजूद होने का तर्क केवल मुकदमे (Trial) के दौरान साबित किया जाना चाहिए, न कि समन जारी करने के चरण में।

मामला क्या था? (The Ajmer Murder Case)

  • घटना: 10 नवंबर, 2016 को अजमेर के एक इंडोर स्टेडियम में शिकायतकर्ता के पति की हत्या कर दी गई थी।
  • पुलिस की जांच: जांच एजेंसी (CID-CB) ने मोबाइल टॉवर लोकेशन के आधार पर याचिकाकर्ताओं को निर्दोष माना था और उन्हें चार्जशीट से बाहर कर दिया था (Section 169 CrPC के तहत)।
  • मोड़: ट्रायल के दौरान, चश्मदीद गवाह (PW-4) ने अदालत में शपथ लेकर याचिकाकर्ताओं का नाम लिया और हत्या में उनकी विशिष्ट भूमिका बताई। इसके बाद, कोर्ट ने उन्हें धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन किया।

‘Plea of Alibi’ पर कोर्ट का रुख

  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मोबाइल लोकेशन और पुलिस की रिपोर्ट साबित करती है कि वे मौके पर नहीं थे। इस पर हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया।
  • बचाव का विषय: “कहीं और मौजूद होने का तर्क (Alibi) बचाव का मामला है और इसे औपचारिक रूप से ट्रायल के दौरान ही साबित किया जाना चाहिए।”
  • समन का मानक: धारा 319 के तहत किसी को बुलाने के लिए केवल “प्रथम दृष्टया मामले से कुछ अधिक” (More than a prima facie case) संतुष्टि की आवश्यकता होती है, न कि “संदेह से परे सबूत” (Proof beyond reasonable doubt) की।
  • गवाह की अहमियत: यदि किसी चश्मदीद ने कोर्ट में नाम लिया है, तो कोर्ट को उस समय गवाह की क्रॉस-एग्जामिनेशन करने की जरूरत नहीं है। समन जारी करने के लिए वह गवाही काफी है।

‘प्रथम दृष्टया’ संतुष्टि और ट्रायल का उद्देश्य

  • अदालत ने ‘हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य (2014)’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया।
  • सत्य की खोज: “आपराधिक मुकदमे का पूरा उद्देश्य मामले की सच्चाई तक पहुँचना है। एक बार जब अदालत संतुष्ट हो जाती है कि उसके सामने किसी व्यक्ति द्वारा अपराध करने के सबूत हैं, तो वह उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।”
  • मोबाइल लोकेशन बनाम गवाही: पुलिस द्वारा जांच में इस्तेमाल किए गए सबूतों (जैसे मोबाइल लोकेशन) को ट्रायल के दौरान परखा जाएगा, लेकिन वे चश्मदीद की गवाही के आधार पर जारी किए गए समन को नहीं रोक सकते।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत की व्यवस्था
Plea of Alibiयह ट्रायल के दौरान साबित करने वाली बात है, समन के चरण में नहीं।
धारा 319 CrPCअतिरिक्त आरोपियों को शामिल करने की शक्ति, जब सबूत उनके खिलाफ हों।
समन का आधारचश्मदीद गवाह की कोर्ट में दी गई शपथबद्ध गवाही।
नतीजायाचिका खारिज; आरोपी को 24 अप्रैल, 2026 तक ट्रायल कोर्ट में पेश होने का निर्देश।

निष्कर्ष: चश्मदीद की गवाही को प्राथमिकता

यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि जांच एजेंसी द्वारा दी गई ‘क्लीन चिट’ अंतिम नहीं है। यदि ट्रायल के दौरान अदालत के सामने ऐसे सबूत आते हैं जो किसी व्यक्ति की संलिप्तता दर्शाते हैं, तो अदालत अपनी शक्तियों का उपयोग कर उसे न्याय के कटघरे में ला सकती है। ‘प्ली ऑफ एलीबाय’ की सत्यता का फैसला ट्रायल के अंत में होगा, न कि शुरुआत में।

HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN BENCH AT JAIPUR
HON’BLE MR. JUSTICE ANOOP KUMAR DHAND
S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 3521/2019
Vikram Sharma S/o Late Shri Munni Lal Sharma, Sanjay Singh S/o Shri Prem Singh
Versus
State Of Rajasthan, Snehlata Choudhary S/o Shri Dharmendra Choudhary,

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