Division Bench: अदालतों के भीतर फैसलों में एकरूपता और न्यायिक मर्यादा को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने ‘डी. परमशिवम बनाम पी. अरुणाचलम व अन्य’ मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया कि जब तक किसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट या किसी बड़ी पीठ द्वारा पलटा नहीं जाता, तब तक वह समान शक्ति वाली सभी पीठों पर पूरी तरह बाध्यकारी (Binding) रहता है।
यह रही अदालत की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा, “न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) और निरंतरता किसी भी कानूनी प्रणाली की रीढ़ हैं। यदि दो जजों की एक खंडपीठ (Division Bench) ने किसी कानूनी विषय पर कोई फैसला सुना दिया है, तो समान शक्ति वाली (Coordinate Bench) कोई दूसरी खंडपीठ उससे असहमत होकर अपनी तरफ से कोई नया या अलग रुख नहीं अपना सकती। अगर बाद वाली पीठ को पहले के फैसले की कानूनी समझ पर कोई आपत्ति है, तो उसे मामले को खुद तय करने के बजाय चीफ जस्टिस के समक्ष भेजकर बड़ी पीठ (Larger Bench) के गठन की सिफारिश करनी चाहिए।
मामला क्या है?: दो खंडपीठों के बीच ‘केस लिस्टिंग’ को लेकर विरोधाभास
यह पूरा विवाद मद्रास हाई कोर्ट की रजिस्ट्री (Registry) द्वारा एक नियमित प्रथम अपील (First Appeal) को सीधे “एडमिशन” (सुनवाई के लिए स्वीकार करने) के लिए लिस्ट किए जाने के बाद शुरू हुआ। इस लिस्टिंग को लेकर हाई कोर्ट की दो अलग-अलग खंडपीठों के फैसलों में सीधा टकराव था।
पहला निर्णय (P.R. Saravanan बनाम Dhanalakshmi): इस मामले में जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन की पीठ ने पहले व्यवस्था दी थी कि जब भी कोई नई अपील दायर और रजिस्टर्ड होती है, तो रजिस्ट्री को सीधे प्रतिवादी को नोटिस जारी करना चाहिए। उस अपील को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 41 नियम 11 (एडमिशन सुनवाई) के तहत केवल तभी लिस्ट किया जाना चाहिए जब अदालत विशेष रूप से इसका निर्देश दे।
दूसरा विरोधाभासी निर्णय (Chennai Port Authority बनाम J. Chandrasekaran): इसके बाद आई एक अन्य खंडपीठ ने इस व्यवस्था से अलग रुख अपनाते हुए आदेश दे दिया कि हर एक अपील को संबंधित अदालत के समक्ष पहले “एडमिशन” के लिए ही लिस्ट किया जाना चाहिए। इस दूसरी पीठ ने अपने फैसले का आधार हाई कोर्ट की ‘रूल्स कमेटी’ (Rules Committee) द्वारा प्रस्तावित एक नए संशोधन को बनाया था।
हाई कोर्ट का विधिक रुख: “कितना भी बड़ा विद्वान हो, गलती सबसे हो सकती है”
जस्टिस स्वामीनाथन और जस्टिस लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने दूसरी पीठ के फैसले से पूरी तरह असहमति जताते हुए न्यायिक औचित्य और प्रक्रियाओं पर बहुत गंभीर बातें कहीं।
‘इवन होमर नॉड्स’ (गलती किसी से भी संभव है): बाद वाला फैसला सुनाने वाले वरिष्ठ जज के प्रति पूरा सम्मान व्यक्त करते हुए पीठ ने एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कहावत का इस्तेमाल किया— “इवन होमर नॉड्स” (यानी कोई व्यक्ति कितना भी कुशल, ज्ञानी या सिद्ध क्यों न हो, चूक किसी से भी हो सकती है)। कोर्ट ने कहा कि माननीय जज का न्यायिक अनुभव हम दोनों के संयुक्त अनुभव से भी अधिक है, फिर भी उनके फैसले में एक विधिक त्रुटि रह गई।
रूल्स कमेटी का प्रस्ताव कानून नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट की रूल्स कमेटी की भूमिका केवल सलाहकारी (Advisory) होती है। उसके द्वारा अनुमोदित किसी भी संशोधन को तब तक कानूनी ताकत नहीं मिलती जब तक उसे फुल कोर्ट (Full Court – सभी जजों की बैठक) द्वारा मंजूरी न मिले।
सीपीसी की धारा 126 के तहत राज्य सरकार की स्वीकृति न मिले। धारा 127 के तहत उसे आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचित (Notify) न किया जाए। चूकि यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, इसलिए केवल कमेटी के प्रस्ताव के आधार पर पुराना न्यायिक फैसला नहीं बदला जा सकता था।
अदालत का अंतिम निर्देश: पुराना फैसला ही रहेगा लागू
मद्रास उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री और विधिक व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए आदेश जारी किए।
रजिस्ट्री को निर्देश: हाई कोर्ट रजिस्ट्री को सख्त हिदायत दी गई है कि भविष्य में सभी प्रथम अपीलों को लिस्ट करते समय केवल ‘पी.आर. सरवनन’ मामले के मूल कानूनी सिद्धांत का ही पालन किया जाए।
शॉर्टकट पर रोक: कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि समान पीठ के तयशुदा फैसलों की अनदेखी कर अपनी मर्जी से नया कानून गढ़ने की प्रथा न्यायिक अराजकता को जन्म देती है, जिससे बचा जाना अनिवार्य है।
विधिक केस शीट: मद्रास हाई कोर्ट खंडपीठ बनाम कोऑर्डिनेट बेंच क्षेत्राधिकार (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय, चेन्नई |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन |
| केस संदर्भ | डी. परमशिवम बनाम पी. अरुणाचलम व अन्य |
| मुख्य कानूनी टकराव | ‘केस लिस्टिंग’ प्रक्रिया को लेकर दो खंडपीठों (Division Benches) के विचारों में मतभेद |
| लागू विधिक संहिता | सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 (आदेश XLI नियम 11, धारा 126 और 127) |
| अदालत का विधिक सिद्धांत | समान पीठ के फैसले बाध्यकारी हैं; असहमति की स्थिति में मामला ‘लार्जर बेंच’ को ही भेजा जा सकता है |
जस्टिस स्वामीनाथन की पीठ ने बेहद विनम्रता लेकिन पूरी दृढ़ता के साथ यह याद दिलाया है कि कानून की स्थापित प्रक्रियाएं किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत विद्वता से ऊपर होती हैं। रूल्स कमेटी का कोई भी प्रस्ताव तब तक कानून नहीं बनता जब तक वह सरकारी गजट का हिस्सा न बन जाए। यह आदेश भविष्य में अदालतों के भीतर इस तरह के विरोधाभासों को रोकने में मील का पत्थर साबित होगा।

