Justice Delay: साल 2001 से लटके एक कथित अपहरण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश की अदालतों में मुकदमों की कछुआ चाल पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
24-25 सालों तक ट्रायल का लंबित रहना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव भारती की एकल पीठ ने अजय कुमार व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की और सालों से अधर में लटके दो आरोपियों को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे दी। अदालत ने कहा, सिनेमा का संवाद तारीख पे तारीख जब देश की वास्तविक न्याय प्रणाली की हकीकत और पहचान बनने लगे, तो यह बेहद चिंताजनक और विचलित करने वाला है। किसी भी आपराधिक मुकदमे को अंतहीन स्थगन (Endless Adjournments) और प्रशासनिक ढिलाई की वेदी पर चढ़ाकर न्याय की हत्या नहीं की जा सकती। 24-25 सालों तक ट्रायल का लंबित रहना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले ‘त्वरित और निष्पक्ष न्याय के अधिकार’ (Speedy Trial) का सीधा उल्लंघन है।
मामला क्या है?: 2001 में अपहरण की एफआईआर, आज 3 बच्चों के माता-पिता
यह कानूनी कहानी जितनी पुरानी है, उसकी जमीनी हकीकत आज पूरी तरह बदल चुकी है।
मूल विवाद: 30 दिसंबर 2001 को पुलिस में एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी। आरोप था कि 15 साल की एक नाबालिग लड़की को गांव के अजय कुमार ने अपने साथी रामचंद्र की मदद से अगवा कर लिया है। पुलिस ने अप्रैल 2002 में चार्जशीट दाखिल की और अदालत ने संज्ञान लिया।
2007 का मोड़ और ‘कानूनी कोमा’: आरोपी पक्ष ने 2007 में हाई कोर्ट आकर केस रद्द (Quash) करने की अर्जी दी। हाई कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। लेकिन बाद में वकीलों की अनुपस्थिति के कारण वह याचिका खारिज हो गई और अंतरिम रोक हट गई। इसके बावजूद निचली अदालत में ट्रायल सालों तक ‘कोमा’ जैसी स्थिति में सोया रहा।
2026 में अचानक एक्शन: मई 2026 में निचली अदालत अचानक जागी और उसने दोनों आरोपियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिए। इसके खिलाफ आरोपी दोबारा अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट पहुंचे।
हाई कोर्ट का विधिक रुख: यह मुकदमा नहीं, महज़ एक औपचारिकता है
जस्टिस राजीव भारती ने कोर्ट के रिकॉर्ड और फाइलों की धूल को देखते हुए न्याय व्यवस्था की सुस्ती पर गंभीर सवाल उठाए।
ट्रायल एक औपचारिकता बना: कोर्ट ने केस डायरी देखकर निराशा व्यक्त की और कहा कि सालों तक बिना किसी सार्थक प्रगति के कार्यवाही रुकी रही, जिसने आपराधिक मुकदमे को महज़ एक कागजी औपचारिकता (Mere Formality) बनाकर रख दिया।
हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकते: आरोपियों के वकील ने कोर्ट को बताया कि यह कोई अपहरण का मामला नहीं था बल्कि दोनों आपसी सहमति के रिश्ते में थे। उन्होंने शादी कर ली है और आज 24 साल बाद वे पति-पत्नी के रूप में तीन बच्चों के साथ शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं। सरकारी पक्ष ने भी इस तथ्य का विरोध नहीं किया।
अग्रिम जमानत मंजूर: कोर्ट ने माना कि आरोपियों का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है, चार्जशीट बहुत पहले दाखिल हो चुकी है और वे ट्रायल में सहयोग करने को तैयार हैं। इसलिए कोर्ट ने उन्हें दो हफ्ते के भीतर निचली अदालत में सरेंडर करने और निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया।
विधिक केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट बनाम अंतहीन स्थगन वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राजीव भारती |
| केस संदर्भ | अजय कुमार एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य |
| एफआईआर की तारीख | 30 दिसंबर 2001 (लगभग 25 साल पुराना मामला) |
| संवैधानिक अधिकार | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (त्वरित विधिक सुनवाई का अधिकार) |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने पर अग्रिम जमानत की राहत |
जस्टिस राजीव भारती ने ‘तारीख पे तारीख’ के दर्द को बयां कर बिल्कुल सही कहा है कि अदालतों का काम सिर्फ तारीखें बदलना नहीं, बल्कि समय पर विवादों का निपटारा करना है। यह आदेश उन हजारों मुकदमों के लिए एक नजीर है जो न्याय व्यवस्था की सुस्ती के कारण दशकों से धूल फांक रहे हैं।

