Tuesday, August 25, 2026
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SBI vs. Clerk: 32 साल लंबी कानूनी जंग में इस बैंक की हुई हार…दिवंगत क्लर्क के कानूनी वारिसों को सभी लाभ दें, सभी सरकारी कर्मी पढ़ें फैसला

SBI vs. Clerk: दिल्ली हाई कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को खारिज करते हुए 32 साल से चल रही लंबी कानूनी लड़ाई का अंत कर दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस शैल जैन की बेंच ने SBI की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें 2023 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद मामले को दोबारा खोलना ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। अदालत ने बैंक को आदेश दिया है कि वह दिवंगत क्लर्क के कानूनी वारिसों (Legal Heirs) को वे सभी वित्तीय लाभ जारी करे, जो उन्हें सेवा में रहने के दौरान मिलते।

मामले की पृष्ठभूमि (Case History: 1989-2026)

  • शुरुआत (1989): राजस्थान के सादुलशहर शाखा में कार्यरत क्लर्क एस. के. टापरिया पर वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी खातों के संचालन के आरोप लगे।
  • बर्खास्तगी (1994): विभागीय जांच के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त (Discharge) कर दिया गया।
  • लेबर कोर्ट का मोड़ (2003): औद्योगिक न्यायाधिकरण (Industrial Tribunal) ने बर्खास्तगी को अवैध माना और उन्हें 9% ब्याज के साथ पिछला वेतन और बहाली का आदेश दिया।
  • HC का सफर: SBI ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन मुकदमे के दौरान ही टापरिया की मृत्यु हो गई। उनके परिवार ने केस जारी रखा।

कोर्ट का कड़ा रुख: “प्रक्रियात्मक बारीकियां न्याय नहीं रोक सकतीं”

  • बैंक ने दलील दी कि लेबर कोर्ट को बैंक को नए सिरे से सबूत पेश करने का मौका देना चाहिए था।
  • असंभव प्रक्रिया: “चूंकि कर्मचारी (वर्कमैन) की मृत्यु हो चुकी है, इसलिए अब नए सिरे से गवाही या जिरह (Cross-examination) कराना अव्यावहारिक (Impracticable) है।”
  • एकतरफा कार्रवाई: यदि बैंक को अब सबूत देने की अनुमति दी गई, तो वर्कमैन की अनुपस्थिति में यह प्रक्रिया पूरी तरह से एकतरफा होगी, जो न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
  • अधिकारों का शुद्धीकरण (Crystallisation of Rights): कोर्ट ने कहा कि 32 साल बाद मृतक के वारिसों के हक अब पक्के (Crystallise) हो चुके हैं और उन्हें तकनीकी आधार पर नहीं छीना जा सकता।

‘रिव्यू’ (Review) की सीमाएं

  • अदालत ने SBI को कानून का पाठ पढ़ाया।
  • अपील बनाम रिव्यू: अगर आपको फैसले की मेरिट (गुण-दोष) पर आपत्ति है, तो आपको अपील करनी चाहिए थी। रिव्यू याचिका का इस्तेमाल मामले को दोबारा उसी तरह बहस करने के लिए नहीं किया जा सकता जैसे वह पहली बार सुना जा रहा हो।
  • अंतिम निर्णय (Finality): कानूनी विवादों का अंत होना जरूरी है। पुरानी बातों को बार-बार दोहराना ‘रिव्यू जूरिस्डिक्शन’ के दायरे में नहीं आता।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयविवरण
विवाद की अवधि32 वर्ष (1994 से 2026 तक)।
मुख्य आदेशक्लर्क को उसकी मृत्यु या सेवानिवृत्ति तक ‘निरंतर सेवा’ में माना जाए।
वित्तीय लाभपूरा पिछला वेतन, भत्ते और अन्य लाभ वारिसों को मिलेंगे।
न्याय का सिद्धांततकनीकी आधार पर वास्तविक न्याय (Substantial Justice) को नहीं रोका जा सकता।

निष्कर्ष: कर्मचारी के परिवार की जीत

यह फैसला उन संस्थानों के लिए एक नजीर है जो छोटे कर्मचारियों के खिलाफ दशकों तक मुकदमेबाजी जारी रखते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि मुकदमे की लंबी अवधि के दौरान यदि कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, तो संस्थान को उसकी अनुपस्थिति का फायदा उठाकर ‘नए सबूत’ लाने का अधिकार नहीं मिल जाता।

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