Monday, August 24, 2026
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Maternity Benefit: 80 दिन के काम करने की शर्त सरकारी संस्थानों पर लागू नहीं…आदेश- गेस्ट फैकल्टी को भी मिलेगा 26 हफ्ते का पूरा वेतन

Maternity Benefit: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मातृत्व लाभ (Maternity Benefit) को लेकर एक बड़ा और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।

तकनीकी नियमों की आड़ न लें संस्थान

हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगत की बेंच ने कटनी के गवर्नमेंट तिलक पीजी कॉलेज की एक गेस्ट फैकल्टी सदस्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ देना राज्य का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है, जिसे तकनीकी नियमों की आड़ में नहीं रोका जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी सरकारी संस्थान किसी महिला कर्मचारी को केवल इस आधार पर सवैतनिक (Paid) मातृत्व अवकाश देने से मना नहीं कर सकता कि उसने 80 दिनों की सेवा पूरी नहीं की है।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • पृष्ठभूमि: डॉ. प्रीति साकेत कटनी के सरकारी कॉलेज में अनुबंध (Contract) पर गेस्ट फैकल्टी थीं। उन्हें अप्रैल 2023 से 6 महीने का सवैतनिक मातृत्व अवकाश दिया गया था।
  • मोड़: जून 2023 में कॉलेज प्रशासन ने अपना आदेश संशोधित कर दिया और वेतन (Honorarium) देने से मना कर दिया।
  • तर्क: कॉलेज ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(2) का हवाला दिया, जिसके अनुसार लाभ पाने के लिए पिछले 12 महीनों में कम से कम 80 दिन काम करना अनिवार्य है।

कोर्ट का संवैधानिक तर्क (Constitutional Mandate)

  • हाई कोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए संविधान के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles) का हवाला दिया।
  • अनुच्छेद 38 और 39: राज्य का कर्तव्य है कि वह लोगों के कल्याण को बढ़ावा दे और महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा करे।
  • सामाजिक न्याय: भारत एक ‘समाजवादी’ गणराज्य है, जहाँ सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य और परिवार से जुड़े कल्याणकारी उपाय इसी सामाजिक न्याय का हिस्सा हैं।
  • 80 दिन का नियम: कोर्ट ने व्यवस्था दी कि धारा 5(2) में वर्णित ’80 दिनों की कार्य अवधि’ की शर्त राज्य सरकार के संस्थानों (Establishments) पर लागू नहीं होगी।

‘गेस्ट फैकल्टी’ भी हकदार (Contractual vs. Permanent)

  • सरकार ने तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता एक संविदा कर्मचारी (Contractual) है और उसे स्थायी कर्मचारियों के समान लाभ नहीं मिल सकते। कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
  • व्यापक परिभाषा: अधिनियम के तहत ‘संस्थान’ (Establishment) की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें वे सभी सरकारी संस्थान शामिल हैं जहाँ 10 या अधिक लोग काम करते हैं।
  • समान अधिकार: चाहे कर्मचारी स्थायी हो या अनुबंध पर, मातृत्व का अधिकार एक बुनियादी मानवीय अधिकार है जिसे काम के स्वरूप के आधार पर छीना नहीं जा सकता।

कोर्ट का अंतिम आदेश (The Relief Granted)

  • हाई कोर्ट ने कॉलेज के पुराने आदेश को रद्द करते हुए कई निर्देश दिए।
  • 26 हफ्ते का अवकाश: याचिकाकर्ता 26 सप्ताह के सवैतनिक मातृत्व अवकाश की हकदार है (8 सप्ताह प्रसव से पहले और 18 सप्ताह प्रसव के बाद)।
  • वेतन का भुगतान: इस वैधानिक अवधि के लिए उसे पूरा मानदेय (Wages) दिया जाए।
  • अतिरिक्त अवकाश: यदि वह 26 सप्ताह से अधिक छुट्टी लेती है, तो वह ‘बिना वेतन’ (Leave without pay) मानी जाएगी।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निष्कर्ष
80 दिन की शर्तसरकारी संस्थानों के लिए यह तकनीकी बाधा मान्य नहीं है।
संविधान का प्रभावअनुच्छेद 38, 39 और 39A (मुफ्त कानूनी सहायता) इस अधिकार को बल देते हैं।
महिला गरिमामहिला कर्मचारियों के स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा करना राज्य का सर्वोच्च दायित्व है।

निष्कर्ष: कामकाजी महिलाओं के लिए बड़ी जीत

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो सरकारी विभागों में संविदा, गेस्ट फैकल्टी या तदर्थ (Ad-hoc) आधार पर काम कर रही हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मातृत्व के सुख और स्वास्थ्य पर ‘दिनों की गिनती’ का पहरा नहीं बिठाया जा सकता।

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