Sunday, August 30, 2026
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POCSO Ruling: शादी कर लेना बलात्कार के अपराध से मुक्ति नहीं…समझते हैं यह एक चाल है, POCSO केस में निर्देश सभी के लिए सबक, पढ़ें

POCSO Ruling: दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO (पॉक्सो) एक्ट के तहत एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया की बेंच ने ‘गयासुद्दीन बनाम राज्य’ मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि नाबालिग के साथ किए गए बार-बार के दुष्कर्म की गंभीरता निकाहनामे से कम नहीं हो जाती। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग के साथ बलात्कार करता है, तो बाद में उससे शादी कर लेने मात्र से उसका अपराध खत्म नहीं हो जाता। कोर्ट ने इसे जमानत पाने के लिए अपनाई गई एक “चाल” (Ploy) करार दिया।

मामला क्या था? (The Background)

  • शिकायत: पीड़िता ने आरोप लगाया था कि जब वह 16 साल की थी, तब आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ बार-बार बलात्कार किया। इस दौरान वह दो बार गर्भवती हुई और उसे गर्भपात (Abortion) कराना पड़ा।
  • शादी से इनकार: जब वह 18 साल की हुई, तो आरोपी ने शादी से मना कर दिया और उसके साथ मारपीट की, जिसके बाद उसने FIR दर्ज कराई।
  • जेल के बाद निकाह: आरोपी के गिरफ्तार होने के बाद, फरवरी 2026 में दोनों का निकाह हुआ। आरोपी ने इसी आधार पर जमानत मांगी कि अब वे पति-पत्नी हैं।

“निकाह” सिर्फ एक पैंतरा (Marriage as a Ploy)

  • दबाव में शादी: आरोपी ने शादी तब की जब वह जेल पहुँच गया। यह स्पष्ट रूप से खुद को कानूनी कार्रवाई से बचाने और बेल पाने के लिए किया गया एक समझौता था।
  • नाबालिग का शोषण: कोर्ट ने कहा कि निकाहनामा उन अपराधों को नहीं मिटा सकता जो तब किए गए थे जब पीड़िता नाबालिग थी। पॉक्सो कानून के तहत नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी मूल्य नहीं होता।

लॉ स्टूडेंट पीड़िता का यू-टर्न (The Retraction)

  • मामले में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब पीड़िता (जो एक कानून की छात्रा है) अपने बयानों से मुकर गई।
  • पीड़िता की दलील: उसने हाई कोर्ट में कहा कि उसे FIR की सामग्री के बारे में पता नहीं था और उसने बिना पढ़े हस्ताक्षर किए थे।
  • कोर्ट की टिप्पणी: जस्टिस कठपालिया ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा, “एक लॉ स्टूडेंट इतनी भोली नहीं हो सकती कि वह इतने गंभीर आरोपों वाली शिकायत बिना पढ़े साइन कर दे।” कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पीड़िता की गवाही को झूठा माना।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयदिल्ली हाई कोर्ट का निष्कर्ष
शादी का प्रभावPOCSO के तहत हुए अपराध में शादी कोई बचाव (Defense) नहीं है।
आरोपी की मंशाशादी केवल जेल से बाहर आने का एक रास्ता था।
पीड़िता का बयानएक कानून की छात्रा द्वारा बयानों से मुकरना संदेहास्पद है।
नतीजाजमानत याचिका खारिज

निष्कर्ष: कानून का कड़ा संदेश

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ा सबक है जो पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में शादी को “समझौते” के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध एक सामाजिक बुराई है, जिसे किसी भी निजी व्यवस्था या बाद में की गई शादी के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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