Sunday, August 30, 2026
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Maintenance Ruling: छात्र हो तो क्या हुआ, पत्नी के भरण-पोषण का खर्च उठाओ…यह टिप्पणी तलाक केस लड़ने वालों के लिए अहम

Maintenance Ruling: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा, पति का अपनी पत्नी का भरण-पोषण (Maintenance) करना एक ‘पूर्ण कानूनी दायित्व’ (Absolute Legal Obligation) है।

इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग छात्र की पुनर्विचार याचिका खारिज

हाईकोर्ट की जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की बेंच ने 22 वर्षीय एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग छात्र द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया। अदालत ने फरीदाबाद फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति को अपनी पत्नी को ₹2,500 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति केवल इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह अभी एक छात्र है।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • शादी: जोड़े की शादी जून 2020 में हुई थी। उस समय पति की उम्र मात्र 16 साल 4 महीने थी, जबकि पत्नी 25 साल की थी।
  • विवाद: पति ने 2023 में ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम’ के तहत शादी को रद्द करने की याचिका दायर की। इसके बाद, करीब 3 साल से अलग रह रही पत्नी ने धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग की।
  • पति का तर्क: पति ने दलील दी कि वह एक छात्र है, उसकी कोई कमाई नहीं है और उसका परिवार उसकी मां की ₹3,000 की विधवा पेंशन पर निर्भर है। उसने यह भी कहा कि पत्नी अपने माता-पिता और कमाने वाले भाइयों के साथ रह रही है।

कोर्ट का कड़ा रुख: मजबूत शरीर, तो कमाना होगा

  • अदालत ने पति की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
  • सक्षम शरीर (Able-bodied): कोर्ट ने कहा कि पति स्वस्थ है और किसी दिव्यांगता से ग्रस्त नहीं है। कानून की नजर में, एक स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति अपनी पत्नी का समर्थन करने के लिए बाध्य है।
  • दैनिक वेतन का अनुमान: फैमिली कोर्ट के उस तर्क को सही ठहराया गया कि भले ही पति की आय शून्य दिखाई गई हो, लेकिन आज के समय में एक दिहाड़ी मजदूर भी महीने के ₹12,000 से ₹13,000 आसानी से कमा लेता है।
  • शिक्षा बनाम जिम्मेदारी: जस्टिस नागपाल ने कहा, “शिक्षा प्राप्त करना अपनी जगह है, लेकिन पत्नी का भरण-पोषण करने का कानूनी दायित्व रिश्ते के अस्तित्व से उत्पन्न होता है और यह पूर्ण (Absolute) है।”

कानून का उद्देश्य: सजा नहीं, सहायता

  • कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान (2015)’ मामले का हवाला देते हुए भरण-पोषण के पीछे के दर्शन को समझाया।
  • निवारक उपाय: यह पति को दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि बेसहारा पत्नी को दर-दर भटकने और गरीबी से बचाने के लिए एक त्वरित उपाय है।
  • बहानेबाजी की अनुमति नहीं: कोर्ट ने कहा कि “नौकरी नहीं है” या “व्यापार ठीक नहीं चल रहा” जैसे तर्क कानून में स्वीकार्य नहीं हैं।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
कोर्ट का आदेश₹2,500 प्रति माह भरण-पोषण का आदेश बरकरार।
मुख्य टिप्पणीछात्र होना या वित्तीय तंगी भरण-पोषण से बचने का वैध आधार नहीं है।
कानूनी धाराधारा 125 CrPC (अब नए कानूनों के तहत प्रासंगिक प्रावधान)।
नतीजापति की पुनर्विचार याचिका खारिज।

व्यावहारिक न्याय (Practical Justice)

अदालत ने बढ़ती महंगाई का जिक्र करते हुए कहा कि ₹2,500 की राशि आज के दौर में पत्नी के जीवित रहने के लिए ‘न्यूनतम’ है। यह फैसला उन युवाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो शादी के बाद अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने के लिए अपनी ‘छात्र’ होने की स्थिति का हवाला देते हैं।

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