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Prisoners’ Rights: मुंबई के पत्रकार जे. डे (J. Dey) हत्याकांड पर बड़ा अपडेट…सुधार बनाम सजा मामले में यह फैसला पढ़ें

Prisoners’ Rights: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने जेल में बंद कैदियों के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल पानसरे और जस्टिस निवेदिता मेहता की बेंच ने पत्रकार जे. डे (J. Dey) हत्याकांड में सजा काट रहे रोहित थंगप्पन जोसेफ (छोटा राजन का कथित सहयोगी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने कहा है कि केवल किसी विशेष कानून (जैसे MCOCA या POCSO) के तहत सजा पाने के आधार पर कैदी को फरलो (Furlough) देने से मना करना उसके मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लंघन है। चूंकि इस विषय पर हाई कोर्ट के पिछले दो फैसलों में अलग-अलग राय थी, इसलिए इस मामले को अब एक बड़ी बेंच (Larger Bench) को भेज दिया गया है।

विवाद क्या है? (The Controversy)

  • नियम में बदलाव: दिसंबर 2024 में, महाराष्ट्र सरकार ने जेल नियमों में संशोधन किया था। इसके तहत MCOCA, POCSO और अन्य गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कैदियों के लिए ‘फरलो’ (छुट्टी) पर रोक लगा दी गई थी।
  • अमरावती जेल का इनकार: जोसेफ ने अपने परिवार से मिलने के लिए 28 दिन की फरलो मांगी थी, लेकिन जेल प्रशासन ने नए नियमों का हवाला देते हुए उसे ठुकरा दिया।

‘फरलो’ का उद्देश्य क्या है? (Objective of Furlough)

  • अदालत ने जेल सुधार (Prison Reforms) के नजरिए से ‘फरलो’ के महत्व को समझाया।
  • पारिवारिक जुड़ाव: कैदी को अपने परिवार के संपर्क में रहने और पारिवारिक मामलों को सुलझाने का मौका देना।
  • मानसिक राहत: लगातार कैद के हानिकारक प्रभाव (Detrimental impact of continuous captivity) से राहत दिलाना।
  • उम्मीद बरकरार रखना: कैदी भविष्य के प्रति आशावादी बना रहे और जीवन में उसकी सक्रिय रुचि बनी रहे।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां

  • समानता का अधिकार: कोर्ट ने सवाल किया कि यह कैसे माना जा सकता है कि विशेष कानूनों के तहत सजा पाने वाले कैदियों पर निरंतर कैद का बुरा असर नहीं पड़ता?
  • भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण: बेंच ने कहा कि केवल अपराध की प्रकृति के आधार पर ‘फरलो’ पर पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Prohibition) लगाना सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) के खिलाफ है।
  • वर्ग के भीतर वर्ग (Class within a Class): संगठित अपराध के मामलों में हर सदस्य की भूमिका अलग होती है। सबको एक ही लाठी से हांकना “असामान को समान मानने” जैसा है, जो कानूनन गलत है।

मामला अब ‘बड़ी बेंच’ के पास क्यों?

भले ही वर्तमान बेंच का मानना है कि ‘फरलो’ से इनकार करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, लेकिन हाई कोर्ट के दो पुराने फैसलों में इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दी गई थी। न्याय की एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए, बेंच ने इस कानूनी सवाल को सुलझाने हेतु मामले को हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया है ताकि वे एक बड़ी बेंच का गठन कर सकें।

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
याचिकाकर्तारोहित थंगप्पन जोसेफ (जे. डे हत्याकांड का दोषी)।
मुख्य मुद्दाक्या विशेष कानून (MCOCA आदि) के दोषियों को फरलो मिलनी चाहिए?
कोर्ट का रुखइनकार करना मौलिक अधिकारों (Art 14, 21) का उल्लंघन है।
वर्तमान स्थितिमामला बड़ी बेंच (Larger Bench) को रेफर किया गया।

सुधार बनाम सजा

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह रुख यह याद दिलाता है कि जेल का मकसद केवल सजा देना नहीं, बल्कि अपराधी को सुधारकर समाज में वापस लौटने के लायक बनाना भी है। यदि कैदी का जेल में व्यवहार अच्छा है, तो उसे उसके मौलिक मानवीय अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, चाहे उसका अपराध कितना भी गंभीर क्यों न रहा हो।

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