Tuesday, September 1, 2026
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Digital Crime: सोशल मीडिया पर अश्लीलता…कानूनी सजा से बड़ी चोट, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह क्यों कहा, जानिए

Digital Crime: दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिगों की अश्लील सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट करने को लेकर एक बेहद सख्त और दूरगामी टिप्पणी की है।

नियमित जमानत याचिका खारिज

हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने यौन शोषण और अश्लील सामग्री प्रसारित करने के आरोपी सुमित की नियमित जमानत याचिका (Regular Bail) को खारिज कर दिया। कोर्ट ने डिजिटल युग में ‘वायरल’ होने वाली सामग्री के विनाशकारी प्रभाव को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि डिजिटल युग में किसी नाबालिग की निजी तस्वीरें इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर अपलोड करना उनकी गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को ऐसी क्षति पहुँचाता है, जो कानून द्वारा निर्धारित सजा से कहीं अधिक गंभीर है।

मामला क्या था? (The Background)

  • शिकायत: पीड़िता ‘T’ ने आरोप लगाया कि जब वह 15 वर्ष की थी (6 साल पहले), तब उसके पड़ोसी सुमित ने उसे नशीला पदार्थ पिलाकर उसका यौन शोषण किया।
  • ब्लैकमेलिंग: आरोपी के भाई शिवम ने कथित तौर पर इस कृत्य का वीडियो बनाया। आरोप है कि सुमित 6 साल तक उसे ब्लैकमेल करता रहा और उसके नाम से फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाकर उसकी निजी तस्वीरें और वीडियो दोस्तों और रिश्तेदारों को भेज दिए।
  • गिरफ्तारी: पुलिस ने आरोपी को जून 2025 में गिरफ्तार किया और उस पर IPC तथा POCSO Act के तहत चार्जशीट दाखिल की।

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां: डिजिटल चोट गहरी है

  • अनियंत्रित प्रसार: एक बार जब ऐसी सामग्री इंटरनेट पर अपलोड हो जाती है, तो वह बहुत कम समय में साझा और कॉपी हो जाती है, जो पीड़ित के नियंत्रण से बाहर होती है।
  • सामाजिक और भविष्य की क्षति: ऐसी हरकतों से पीड़ित की गरिमा, निजता और मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। यह उसके भविष्य की संभावनाओं और सामाजिक जीवन को पूरी तरह तबाह कर सकता है।
  • सजा बनाम नुकसान: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कृत्य से होने वाले नुकसान का आकलन केवल कानून में दी गई सजा (जैसे 7 या 10 साल की कैद) से नहीं किया जा सकता; यह उससे कहीं अधिक विनाशकारी है।

‘समानता’ (Parity) के तर्क को खारिज किया

  • आरोपी ने दलील दी थी कि उसके भाई शिवम को जमानत मिल चुकी है, इसलिए उसे भी मिलनी चाहिए। कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया।
  • भूमिका का अंतर: भाई पर केवल वीडियो रिकॉर्ड करने का आरोप था, जबकि सुमित पर यौन शोषण करने और उस सामग्री को ऑनलाइन वितरित (Distribute) करने का गंभीर आरोप है।
  • अपराधिक इतिहास: सुमित उत्तर प्रदेश में भी एक अन्य आपराधिक मामले में शामिल पाया गया।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुहाई कोर्ट का निष्कर्ष
मुख्य तर्कसहमति का रिश्ता होने या FIR में देरी होने से अपराध की गंभीरता कम नहीं होती।
डिजिटल सबूतफर्जी अकाउंट के लिए इस्तेमाल किया गया नंबर किसी और का था, लेकिन आरोपी ही उसे चला रहा था।
नतीजाजमानत याचिका खारिज; आरोपी को जेल में ही रहना होगा।
संदेशसोशल मीडिया का उपयोग किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाने के लिए करने वालों को कोई राहत नहीं मिलेगी।

डिजिटल युग की नई चुनौतियां

दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि कानून अब केवल ‘शारीरिक अपराधों’ तक सीमित नहीं है। ‘डिजिटल हिंसा’ और ऑनलाइन बदनामी को अब अदालतें अत्यंत गंभीर मान रही हैं, क्योंकि इंटरनेट पर छोड़े गए दाग कभी पूरी तरह नहीं मिटते।

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