Wednesday, October 28, 2026
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Scandalizing the Court: कड़कड़डूमा और रोहिणी कोर्ट के दो न्यायिक अफसर पर यूट्यूब पर टिप्पणी…जानिए पूरा केस व दिए निर्देश

Scandalizing the Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायिक संस्था के सम्मान और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच की सीमा रेखा तय करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस नवीन चावला और जज रविंद्र डूडेजा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट की कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग करना या न्यायिक प्रणाली की कमियों पर बहस करना अवमानना नहीं है, लेकिन जजों पर व्यक्तिगत हमले करना और जनता में उनकी छवि गिराना दंडनीय अपराध है। कोर्ट ने “Fight 4 Judicial Reforms” यूट्यूब चैनल चलाने वाले गुलशन पाहूजा को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का दोषी करार दिया है।

मामला क्या था? (The Background)

  • शिकायत: कड़कड़डूमा और रोहिणी कोर्ट के दो न्यायिक अधिकारियों (ACJ चरू असीवाल और ACJ अजय सिंह परिहार) ने गुलशन पाहूजा द्वारा यूट्यूब पर डाले गए विवादित वीडियो और बैनरों के खिलाफ शिकायत की थी।
  • यूट्यूब वीडियो: पाहूजा ने वकील शिव नारायण शर्मा का इंटरव्यू लिया था, जिसमें कुछ न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की गई थी। पाहूजा ने दावा किया था कि अगर इन जजों के सामने किसी का केस लगा है, तो उन्हें न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
  • माफी और डिस्चार्ज: मामले में आरोपी वकील शिव नारायण शर्मा और दीपक सिंह ने अदालत से बिना शर्त माफी मांग ली, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए उन्हें बरी कर दिया।

कोर्ट का ‘गुलशन पाहूजा’ पर कड़ा रुख

  • अदालत ने पाहूजा की दलीलों को खारिज करते हुए उन्हें दोषी ठहराने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए।
  • मर्यादा और मंशा (Mala fide Intent): कोर्ट ने कहा कि पाहूजा का उद्देश्य ‘स्वस्थ बहस’ (Healthy Debate) शुरू करना नहीं, बल्कि जजों को बदनाम करना और कोर्ट के अधिकार को कम करना था।
  • बिना सत्यापन के आरोप: पाहूजा ने इंटरव्यू में लगाए गए आरोपों को अदालती रिकॉर्ड से सत्यापित (Verify) तक नहीं किया था। उन्होंने इंटरव्यू को इस तरह से ‘ट्विस्ट’ किया जिससे लगे कि न्यायिक अधिकारी न्याय नहीं कर रहे हैं।
  • सत्यनिष्ठा पर हमला: “यदि किसी न्यायिक अधिकारी की निष्ठा या क्षमता पर हमला करना है, तो वह पुख्ता सबूतों के साथ होना चाहिए। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।”
  • सुप्रीम कोर्ट का अपमान: पाहूजा ने केवल निचली अदालतों ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के लिए भी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था, जिसे कोर्ट ने ‘अक्षम्य’ (Unpardonable) माना।

अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा

  • कोर्ट ने अनुच्छेद 19(1)(a) और अवमानना कानून के बीच संतुलन पर टिप्पणी की।
  • उचित आलोचना जायज है: कोर्ट ने स्वीकार किया कि कोई पक्ष फैसला आने पर निराश हो सकता है और कुछ अनुचित टिप्पणियाँ कर सकता है, जिसे अदालतों को उदारता से लेना चाहिए।
  • संरक्षण की कमी: पाहूजा के कृत्य Res Ipsa Loquitur (चीजें खुद बोलती हैं) की श्रेणी में आते हैं। उनके शब्द और कृत्य इतने स्पष्ट रूप से अवमाननापूर्ण हैं कि उन्हें संविधान के तहत ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
दोषीगुलशन पाहूजा (यूट्यूबर)।
धाराअवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)।
कोर्ट की टिप्पणी“यह न्यायिक प्रणाली का मजाक उड़ाने और उसकी गरिमा गिराने का प्रयास है।”
सजा पर सुनवाईपाहूजा को सजा की अवधि पर अपना पक्ष रखने के लिए 2 सप्ताह का समय दिया गया है।
बहालियाँवकील शिव नारायण शर्मा और दीपक सिंह (माफी स्वीकार होने के बाद डिस्चार्ज)।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए चेतावनी

यह फैसला उन सभी सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो न्यायिक सुधार के नाम पर जजों और अदालतों के खिलाफ सनसनीखेज और अपमानजनक सामग्री अपलोड करते हैं। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सुधार की मांग करना अधिकार है, लेकिन चरित्र हनन करना अपराध।

IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CORAM: HON’BLE MR. JUSTICE NAVIN CHAWLA, HON’BLE MR. JUSTICE RAVINDER DUDEJA
CONT.CAS.(CRL) 3/2025 & CRL.M.A. 1909/2026, CRL.M.A. 2184/2026, CRL.M.A. 5815/2026, CRL.M.A. 9152/2026

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