Tuesday, September 8, 2026
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Legal Ruling: पत्नी पर क्रूरता करने के मामले में बरी होने का मतलब यह नहीं कि उसे गुजारा भत्ता न दें…उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल, पढ़ें केस

Legal Ruling: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस गजेन्द्र सिंह की बेंच ने इंदौर के एक दंपति (जो दोनों ही कानून स्नातक/Law Graduates हैं) के मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने न केवल पति की याचिका खारिज की, बल्कि पत्नी और बच्चे के लिए भरण-पोषण की राशि को बढ़ा भी दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि IPC की धारा 498A (क्रूरता) के मामले में पति का बरी (Acquittal) हो जाना, पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।

मामला क्या था? (Background of the Dispute)

  • दंपति: दोनों कानून के जानकार (Law Graduates) हैं। उनकी शादी 2013 में हुई थी और 2017 में एक बच्चा हुआ।
  • विवाद: 2018 में पत्नी ने दहेज उत्पीड़न और क्रूरता का आरोप लगाते हुए ट्रायल कोर्ट में मामला दर्ज कराया और CrPC की धारा 125 के तहत ₹75,000 प्रति माह गुजारा भत्ता मांगा।
  • पति का तर्क: पति ने दावा किया कि पत्नी ने उसके खिलाफ धारा 498A का झूठा मामला दर्ज कराया था, जिसमें वह बरी हो चुका है। इसलिए, वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है।

कोर्ट का मुख्य कानूनी तर्क (Key Legal Grounds)

A. धारा 125 (CrPC) बनाम धारा 498A (IPC)

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 125(4) या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144(4) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पति को केवल इसलिए छूट दे कि वह आपराधिक मामले में बरी हो गया है।
  • जरूरी शर्तें: भरण-पोषण के लिए पत्नी को केवल दो बातें साबित करनी होती हैं: वह अपना और बच्चे का खर्च उठाने में असमर्थ है। पति के पास पर्याप्त साधन हैं लेकिन वह भरण-पोषण करने में लापरवाही बरत रहा है।

B. ‘कानून की डिग्री’ होने का मतलब ‘आय’ नहीं

  • पति ने तर्क दिया कि पत्नी एक वकील है और उसके पिता के नाम पर संपत्ति है। कोर्ट ने इसे खारिज कर दी।
  • नामांकन ही काफी नहीं: स्टेट बार काउंसिल में केवल नामांकन (Enrolment) होने से यह नहीं मान लिया जा सकता कि वह इतना कमा रही है कि अपना खर्च उठा सके।
  • संपत्ति: पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी होने का मतलब यह नहीं है कि उसे वर्तमान में उससे कोई लाभ या आय मिल रही है।

बरी होने (Acquittal) की हकीकत

    कोर्ट ने गौर किया कि पति आपराधिक मामले (498A) में इसलिए बरी हुआ क्योंकि पत्नी और उसके माता-पिता ‘होस्टाइल’ (Hostile) हो गए थे। पत्नी ने बताया कि यह एक समझौते (Compromise) का हिस्सा था। कोर्ट ने माना कि ऐसे समझौते के आधार पर मिली ‘बरी’ का लाभ पति भरण-पोषण रोकने के लिए नहीं उठा सकता।

    फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

    बिंदुविवरण
    भरण-पोषण में वृद्धि₹10,000 से बढ़ाकर ₹16,000 प्रति माह (पत्नी और बच्चे के लिए)।
    धारा 498A का प्रभावबरी होना गुजारा भत्ता न देने का ‘अपवाद’ नहीं है।
    रहने की स्थितिपत्नी ने उसी घर में अलग रहने के ठोस कारण दिए, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया।
    अगली दिशापति को अब हर महीने संशोधित राशि का भुगतान करना होगा।

    सामाजिक सुरक्षा का कानून

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला इस सिद्धांत को पुख्ता करता है कि भरण-पोषण का कानून (Section 125) एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिलाएं और बच्चे बेसहारा न हों। आपराधिक मुकदमे का नतीजा चाहे जो भी हो, यदि पत्नी की वित्तीय स्थिति कमजोर है और पति सक्षम है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

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