Tuesday, October 27, 2026
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Maintenance Allowance: ₹75,000 महीना! कर्नाटक हाईकोर्ट ने भाजपा नेता को क्यों दिया यह कड़ा आदेश? जानें पूरा मामला

Maintenance Allowance: कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्न की बेंच ने एक बेहद पेचीदा मामले में अनोखा आदेश सुनाया।

हाईकोर्ट ने एक भाजपा नेता के बेटे को अपनी पूर्व स्कूल मित्र और उनके बच्चे के भरण-पोषण के लिए 75,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ चल रही FIR और ट्रायल की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है, लेकिन इसे इस भारी-भरकम राशि के भुगतान की शर्त से जोड़ा है। 22 वर्षीय आरोपी ने अपने खिलाफ दर्ज बलात्कार (धारा 64(2)(M)) और शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध (धारा 69, BNS) के आरोपों को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था।

कोर्ट का तर्क: बच्चा और मां अधर में नहीं छोड़े जा सकते

  • अदालत ने आरोपी के ‘सहमति से संबंध’ (Consensual Acts) वाले तर्क पर कड़ी टिप्पणी की।
  • सहमति बनाम जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि यदि यह केवल दो वयस्कों के बीच सहमति का मामला होता, तो हम कार्यवाही पर पूरी तरह रोक लगा देते। लेकिन यहां एक 10 महीने का बच्चा पैदा हो चुका है, जिसका जैविक पिता (Biological Father) आरोपी साबित हो चुका है।
  • मजबूरी: पीड़िता के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और बच्चे की परवरिश करने में असमर्थ हैं। कोर्ट ने कहा, “आरोपी भले ही छात्र हो, लेकिन उसकी हरकतों की वजह से मां और बच्चे को बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता।”

यूनिक प्रॉब्लम, यूनिक ऑर्डर (Technical Nuance)

  • जस्टिस नागप्रसन्न ने इस आदेश को ‘वन-ऑफ सॉल्यूशन’ (असाधारण समाधान) बताया।
  • शर्तिया रोक (Conditional Stay): हाई कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ निचली अदालत में चल रहे ट्रायल पर स्टे तो दिया है, लेकिन यह तभी तक प्रभावी रहेगा जब तक वह या उसके माता-पिता हर महीने 75,000 रुपये का भुगतान करेंगे।
  • भविष्य की चिंता: बेंच ने मौखिक रूप से कहा, “आपने उसका भविष्य पूरी तरह तबाह कर दिया है। वह अब क्या करे, अपना भविष्य देखे या बच्चे को पाले? सिर्फ इसलिए कि वह एक गरीब परिवार से है, आप ऐसा नहीं कर सकते।”

भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की नई धाराएं

  • यह मामला नई कानूनी धाराओं के तहत दर्ज किया गया है।
    धारा 69 (BNS): यह विशेष रूप से “शादी के झूठे वादे” या पहचान छिपाकर बनाए गए शारीरिक संबंधों के लिए सजा का प्रावधान करती है।
  • धारा 64 (2) (M): यह बलात्कार के गंभीर स्वरूपों से संबंधित है।

मीडिया और व्यवहार पर निर्देश

  • अदालत ने दोनों पक्षों के लिए कुछ मर्यादाएं तय की हैं।
  • मीडिया पर रोक: कोर्ट ने पीड़िता, उसके माता-पिता और रिश्तेदारों को सख्त निर्देश दिया है कि मामला विचाराधीन (Sub-judice) होने के दौरान वे मीडिया के पास न जाएं।
  • भुगतान की समय सीमा: इस महीने की राशि एक सप्ताह के भीतर जमा करने का आदेश दिया गया है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतकर्नाटक हाई कोर्ट (जस्टिस एम. नागप्रसन्न)।
मुख्य शर्त₹75,000 प्रति माह का भुगतान (जब तक याचिका का निपटारा न हो)।
अनोखी बातएक छात्र (आरोपी) को इतनी बड़ी राशि देने को कहा गया क्योंकि उसका पिता रसूखदार है और बच्चा बेसहारा है।
अगली सुनवाई5 जून, 2026।
अदालती संदेशरसूख और पैसा किसी की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने का लाइसेंस नहीं देते।

सामाजिक न्याय और कानून का मेल

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह आदेश इस बात का उदाहरण है कि कानून केवल किताबी धाराओं पर नहीं चलता, बल्कि कई बार ‘सामाजिक न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए उसे लीक से हटकर फैसले लेने पड़ते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक मुख्य केस (FIR रद्द होगी या नहीं) का फैसला नहीं होता, तब तक आरोपी को उस जीवन की जिम्मेदारी उठानी होगी जिसे उसने शुरू किया है।

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