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Promise To Marry: सहमति से संबंध Vs रेप…शादी का वादा टूटना रेप नहीं, अगर नीयत में खोट न हो, इंसाफ की नई तस्वीर केस पढ़कर समझ सकेंगे

Promise To Marry: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस रजनी दुबे की बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ‘सहमति’ (Consent) और ‘शादी के वादे’ (Promise to Marry) के बीच के कानूनी अंतर को फिर से स्पष्ट किया है।

यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसे निचली अदालत ने एक किशोरी के साथ यौन शोषण के आरोप में IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया था। हाई कोर्ट ने इस सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने एक व्यक्ति की दुष्कर्म (Rape) के मामले में दोषसिद्धि (Conviction) को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि शादी के वादे का केवल टूट जाना अपने आप में दुष्कर्म नहीं है, जब तक कि यह साबित न हो कि वादा शुरुआत से ही झूठा था।

कोर्ट का मुख्य कानूनी तर्क (Key Legal Principle)

  • अदालत ने ‘शादी के वादे’ और ‘यौन सहमति’ के संबंधों पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
  • शुरुआती नीयत (Initial Intent): कोर्ट ने कहा कि केवल शादी का वादा पूरा न कर पाना अपराध नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही धोखाधड़ी की थी और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया था।
  • सहमति का मामला: कोर्ट ने पाया कि इस मामले में पीड़िता और आरोपी के बीच लगभग तीन वर्षों तक लगातार शारीरिक संबंध रहे, जो एक लंबे प्रेम प्रसंग (Longstanding Love Affair) का हिस्सा थे।

उम्र और साक्ष्यों की कमी (Lack of Evidence)

  • हाई कोर्ट ने जांच और सबूतों में कई बड़ी खामियां पाईं।
  • उम्र का विवाद: हालांकि स्कूल रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता घटना के समय नाबालिग (16 वर्ष) दिख रही थी, लेकिन कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष उसकी सटीक उम्र साबित करने के लिए कोई “कानूनी रूप से स्वीकार्य और निर्णायक सबूत” पेश करने में विफल रहा।
  • DNA टेस्ट का अभाव: हालांकि पीड़िता ने एक बच्चे को जन्म दिया था, लेकिन आरोपी का कोई DNA टेस्ट नहीं कराया गया। जन्म रजिस्टर में पिता के रूप में आरोपी का नाम केवल पीड़िता की जानकारी पर आधारित था, जिसे कोर्ट ने “कमजोर साक्ष्य” माना।
  • देरी से शिकायत: शिकायत तब दर्ज कराई गई जब आरोपी ने गांव की बैठक में शादी से इनकार कर दिया, न कि संबंधों की शुरुआत में।

‘उचित संदेह’ का लाभ (Benefit of Reasonable Doubt)

  • जस्टिस दुबे ने अपने फैसले में कई बिंदुओं को स्पष्ट किया।
  • बल का प्रयोग नहीं: रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि सहमति बलपूर्वक (Force) या किसी गलतफहमी (Misconception of Fact) के तहत प्राप्त की गई थी।
  • संदेह का लाभ: जब मामले में इतनी कमियां हों, तो ‘उचित संदेह’ (Reasonable Doubt) का लाभ हमेशा आरोपी को मिलना चाहिए।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतछत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (जस्टिस रजनी दुबे)।
धाराIPC की धारा 376(1) (दुष्कर्म के लिए सजा)।
घटनाक्रम2004 से 2006 तक आपसी सहमति से संबंध।
मुख्य निष्कर्षशादी का वादा टूटना (Breach of Promise) बलात्कार नहीं है।
परिणामआरोपी की सजा रद्द और उसे बरी किया गया।

सहमति और कानून की सीमाएं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल है जहाँ लंबे समय तक आपसी सहमति से बने रिश्तों के टूटने के बाद बलात्कार के आरोप लगाए जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया है कि कानून का उद्देश्य उन लोगों को सजा देना है जो ‘धोखाधड़ी’ करते हैं, न कि उन लोगों को जिनका रिश्ता आपसी कारणों से विफल हो गया हो।

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