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Exclusive NIA Court: हर 10-15 NIA केस पर होगी एक विशेष अदालत…एक महीने में एक फैसला आना ही चाहिए, पढ़िए नई गाइडलाइन

Exclusive NIA Court: सुप्रीम कोर्ट ने देश की सुरक्षा और न्याय प्रणाली को लेकर एक ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किया है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुविवरण
प्रभावी कानूनNIA एक्ट की धारा 11 और UAPA।
मुख्य निर्देशहर 10-15 केस पर 1 विशेष कोर्ट का गठन।
समय सीमाअदालतों का गठन 1 महीने के भीतर हो।
सुनवाई का तरीकाप्रतिदिन (Day-to-Day) सुनवाई अनिवार्य।
अदालती लक्ष्य1 महीने में कम से कम 1 फैसला/ट्रायल पूरा करना।

हर महीने कम से कम एक ट्रायल (मुकदमा) पूरा किया जाए

सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इन अदालतों का एकमात्र उद्देश्य त्वरित सुनवाई करना होगा, जिसमें लक्ष्य यह रखा गया है कि हर महीने कम से कम एक ट्रायल (मुकदमा) पूरा किया जाए। UAPA और NIA एक्ट जैसे गंभीर कानूनों के तहत लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए, कोर्ट ने केंद्र सरकार को हर 10 से 15 लंबित मामलों पर एक ‘विशेष NIA अदालत’ (Exclusive NIA Court) बनाने का आदेश दिया है। यह निर्णय ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) मामले की सुनवाई के दौरान लिया गया, जिसका उद्देश्य UAPA, NDPS और NIA जैसे विशेष कानूनों के तहत वर्षों से जेल में बंद आरोपियों और लंबित पड़े मुकदमों का समयबद्ध निपटारा करना है।

नई अदालतों का गणित: केस के आधार पर संख्या

  • सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों की संख्या के आधार पर विशेष अदालतों के गठन का पैमाना (Criteria) तय किया है।
  • 10 लंबित मामले: कम से कम 1 विशेष अदालत।
  • 15 से अधिक लंबित मामले: कम से कम 2 विशेष अदालतें।
  • 25 से अधिक लंबित मामले: कम से कम 3 विशेष अदालतें।
  • समय सीमा: ये अदालतें एक महीने के भीतर स्थापित की जानी चाहिए।

विशेष अदालतों के लिए सख्त नियम

  • कोर्ट ने इन अदालतों की कार्यप्रणाली को लेकर कुछ कड़े नियम बनाए हैं ताकि देरी की गुंजाइश न रहे।
  • अनन्य कार्यभार (Exclusive Work): इन विशेष अदालतों के पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) को NIA एक्ट की धारा 11 के अलावा कोई अन्य मामला नहीं सौंपा जाएगा।
  • प्रतिदिन सुनवाई (Day-to-Day Basis): सभी लंबित मुकदमों की सुनवाई प्रतिदिन के आधार पर होगी।
  • लक्ष्य (Goal): कोर्ट ने “सुझाव” और “निर्देश” दिया है कि ये अदालतें इस तरह काम करें कि हर महीने कम से कम एक ट्रायल का निष्कर्ष (Verdict) निकल सके।

फंडिंग और राज्यों की भूमिका

  • सुनवाई के दौरान ‘फंडिंग’ (वित्त पोषण) को लेकर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई।
  • केंद्र बनाम राज्य: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्र की फंडिंग वर्तमान में केवल धारा 11 (NIA द्वारा जांचे गए केस) की अदालतों के लिए है। राज्यों द्वारा गठित (धारा 22) अदालतों को इसमें शामिल करने से वित्तीय भार बढ़ेगा।
  • CJI का सुझाव: सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ये विशेष अदालतें पहले NIA के मुकदमों को निपटाएं, और समय बचने पर राज्य की एजेंसियों द्वारा जांचे गए मामलों को ले सकती हैं।
  • NDPS मामले: कोर्ट को बताया गया कि NDPS (नशीली दवा) मामलों के लिए भी विशेष अदालतों का गठन विचाराधीन है और इस दिशा में प्रगति हुई है।

स्पीडी ट्रायल – एक संवैधानिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘त्वरित सुनवाई’ (Speedy Trial) के अधिकार को मजबूत करता है। विशेष रूप से UAPA जैसे कड़े कानूनों में, जहाँ जमानत मिलना मुश्किल होता है, वहां मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इन विशेष अदालतों के बनने से न केवल निर्दोषों को जल्दी रिहाई मिलेगी, बल्कि दोषियों को भी जल्द सजा मिल सकेगी।

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