Thursday, June 25, 2026
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Non-Application Of Mind: यह क्या, अपर मुख्य सचिव दिमाग नहीं लगाते हैं…गिरफ्तारी के कारण लिखित में देना संवैधानिक सुरक्षा है, पढ़ें

Non-Application Of Mind: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे लिखित में गिरफ्तारी के कारण न बताना उसके संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है।

उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का भारी जुर्माना

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मई 2026 में उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का भारी जुर्माना (Exemplary Costs) लगाते हुए एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और उसकी तीन महीने की जेल को “अवैध” घोषित कर दिया है। कोर्ट ने राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) की कार्यप्रणाली पर “दिमाग का इस्तेमाल न करने” (Non-Application of Mind) की कड़ी टिप्पणी की है। यह मामला एक ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) याचिका से जुड़ा है, जहाँ याचिकाकर्ता ने अपनी जनवरी 2026 की गिरफ्तारी को चुनौती दी थी।

संवैधानिक उल्लंघन: अनुच्छेद 22(1)

  • मामला: याचिकाकर्ता को गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo) में केवल केस नंबर लिखा था। उसे लिखित में यह नहीं बताया गया कि उसे क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है।
  • सुप्रीम कोर्ट के नजीर: कोर्ट ने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) और डॉ. राजेंद्र राजन बनाम भारत संघ (2026) के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों के अनुसार, गिरफ्तारी के कारणों को लिखित में साझा करना अनिवार्य है, अन्यथा गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक हिरासत (Remand) अवैध हो जाती है।

“उच्चतम स्तर पर लापरवाही”

  • कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) के व्यक्तिगत हलफनामे (Affidavit) पर कड़ी नाराजगी जताई।
  • जवाब का अभाव: कोर्ट ने पहले ही पूछा था कि इस अवैध हिरासत के लिए उन पर जुर्माना क्यों न लगाया जाए?
  • कोर्ट की टिप्पणी: “अपर मुख्य सचिव के हलफनामे में एक शब्द भी इस बारे में नहीं है कि अनुकरणीय जुर्माना (Exemplary Cost) क्यों न लगाया जाए। ऐसा लगता है कि उन्होंने कोर्ट का पिछला आदेश पढ़ा तक नहीं। अगर गृह विभाग के सबसे बड़े अधिकारी का यह हाल है, तो हम समझ सकते हैं कि राज्य के अन्य अधिकारी कैसे काम कर रहे होंगे।”

₹10 लाख का जुर्माना और बहाली

  • कोर्ट ने याचिकाकर्ता की तीन महीने की अवैध जेल को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गहरा आघात माना।
  • मुआवजा: राज्य सरकार को ₹10 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। यह राशि 4 सप्ताह के भीतर दी जानी है।
  • अधिकारियों से वसूली: कोर्ट ने सरकार को छूट दी है कि वह यह राशि उन दोषी अधिकारियों से वसूल सकती है जिनकी वजह से यह प्रक्रियात्मक चूक हुई।
  • तत्काल रिहाई: कोर्ट ने याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी और रिमांड ऑर्डर को रद्द करते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
मुख्य अधिकारअनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और 22(1) (गिरफ्तारी के विरुद्ध सुरक्षा)।
जुर्माने की राशि₹10,00,000 (दस लाख रुपये)।
कोर्ट की फटकारअपर मुख्य सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश सरकार।
कानूनी स्थितिगिरफ्तारी मेमो में कारणों का लिखित विवरण न होना गिरफ्तारी को असंवैधानिक बनाता है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पवित्रता

हाई कोर्ट ने रिनी जोहर बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) का उदाहरण देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को गैर-कानूनी तरीके से छीना जाता है, तो वह मानसिक और भावनात्मक रूप से टूट जाता है। यह फैसला पुलिस और प्रशासन को याद दिलाता है कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना “ऐच्छिक” नहीं बल्कि “अनिवार्य” है।

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