Thursday, October 1, 2026
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Triple Talaq: मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की जीत…प्रथा के नाम पर नहीं हो सकता शोषण, पढ़े यह अहम फैसला

Triple Talaq: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तीन तलाक (Triple Talaq/तलाक-ए-बिद्द्त) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में कानूनी स्पष्टता की।

पत्नी रूबीना कवि की याचिकाओं को स्वीकार किया

हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक जैन की एकल पीठ ने पत्नी रूबीना कवि की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पति रिज़वान अली द्वारा दायर मुकदमे को “तंग करने वाला और तुच्छ” (Vexatious and Frivolous) करार दिया और उसकी याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज (Reject) कर दिया। अदालत ने साफ किया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा शायरा बानो बनाम भारत संघ (Shayara Bano v. Union of India, 2017) मामले में तीन तलाक (Triple Talaq/तलाक-ए-बिद्द्त) को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद, अब कोई भी दीवानी या पारिवारिक अदालत ऐसे किसी तलाक को कानूनी रूप से मान्यता देने की घोषणा (Declaration) नहीं कर सकती।

पति द्वारा दायर दीवानी मुकदमे से जुड़ा मामला

यह मामला एक पति द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ दायर दीवानी मुकदमे से जुड़ा है। पति ने कोर्ट से यह घोषित करने की मांग की थी कि उसने 14 जनवरी 2015 को दो गवाहों की मौजूदगी में अपनी पत्नी को मौखिक रूप से ‘तीन तलाक’ दे दिया था और बाद में ‘तलाकनामा’ भी तैयार कर लिया था।

मामले का घटनाक्रम और कानून को बदलने की कोशिश

  • मुकदमे के दौरान आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला: जब यह मुकदमा निचली अदालत में लंबित था, तभी साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘शायरा बानो’ मामले में तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन घोषित कर दिया।
  • पत्नी की आपत्ति: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पत्नी ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के तहत याचिका लगाकर पति का केस खारिज करने की मांग की, क्योंकि कानूनन अब तीन तलाक अमान्य हो चुका था। हालांकि, 2018 में निचली अदालत ने यह कहकर इसे खारिज कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्यव्यापी (Prospective) है, यानी यह पुराने मामलों पर लागू नहीं होगा।
  • पति द्वारा बयान बदलना: मामला जब फैमिली कोर्ट पहुंचा, तो कानूनी शिकंजे से बचने के लिए पति ने साल 2023 में अपनी दलीलों में संशोधन (Amendment) कर दिया। उसने नया दावा किया कि यह ‘तत्काल तीन तलाक’ (Instant Triple Talaq) नहीं था, बल्कि उसने 2013 और 2014 के बीच अलग-अलग समय पर तलाक बोला था।

हाई कोर्ट के कड़े रुख और मुख्य कानूनी सिद्धांत

  • हाई कोर्ट ने पति के इस बदले हुए रुख को सिरे से खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए।
  • संविधान पीठ के फैसलों का भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव: जस्टिस विवेक जैन ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतों (सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट) द्वारा कानून की जो व्याख्या की जाती है, वह आमतौर पर भूतलक्षी (Retrospective) यानी पुराने मामलों पर भी लागू होती है, जब तक कि उस फैसले में विशेष रूप से यह न कहा गया हो कि यह केवल भविष्य के मामलों पर लागू होगा।
  • शायरा बानो फैसले से बचने की नाकाम कोशिश: अदालत ने पाया कि मूल ‘तलाकनामा’ साफ तौर पर 14 जनवरी 2015 को एक ही दिन में दिए गए तीन तलाक की बात करता है। पति द्वारा बाद में किया गया संशोधन केवल ‘शायरा बानो’ के फैसले के प्रभाव से बचने का एक बहाना था। कानूनन, मुकदमों में ऐसा संशोधन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जो केस के मूल स्वरूप या ‘कॉज ऑफ एक्शन’ (Cause of Action) को ही बदल दे।

अदालतें नहीं दे सकतीं अवैध प्रथा को मंजूरी

हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ही एक पूर्व खंडपीठ (Division Bench) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया, तो देश की कोई भी अदालत ऐसे तलाक को वैध ठहराने की डिक्री जारी नहीं कर सकती, भले ही वह कथित तलाकनामा शायरा बानो फैसले से पहले का ही क्यों न हो।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  • शुरुआती स्तर पर ही केस खारिज: हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और फैमिली कोर्ट दोनों को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पति के इस मुकदमे को शुरुआत में ही (At the threshold) खारिज कर देना चाहिए था। कोर्ट ने आदेश 7 नियम 11 के तहत पति की याचिका को पूरी तरह रद्द कर दिया।
  • पति को अन्य कानूनी विकल्प की आजादी: हालांकि कोर्ट ने तीन तलाक के आधार पर मान्यता देने से मना कर दिया, लेकिन साथ ही पति को यह छूट (Liberty) दी कि वह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उपलब्ध किसी भी अन्य कानूनी और वैध तरीके से तलाक की डिक्री के लिए नया मुकदमा दायर कर सकता है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

कानूनी बिंदुहाई कोर्ट का निष्कर्ष
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विवेक जैन (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय)
मूल विवादक्या 2017 के ‘शायरा बानो’ फैसले से पहले दिए गए ‘तीन तलाक’ को अदालतें मान्यता दे सकती हैं?
न्यायालय का निर्णयनहीं। तीन तलाक को न्यायिक रूप से कभी भी मान्य नहीं किया जा सकता, भले ही वह घटना 2017 से पहले की हो।
सीपीसी का नियमऐसे मामलों को ‘Order 7 Rule 11 CPC’ के तहत अदालत को तुरंत खारिज कर देना चाहिए।

महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की जीत

यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की तकनीकी कमियां निकालकर या अपनी दलीलों को तोड़-मरोड़कर पुरानी और असंवैधानिक प्रथाओं को अदालतों के जरिए जीवित रखना चाहते हैं। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि तात्कालिक तीन तलाक अपनी प्रकृति में एकतरफा और मनमाना है, जिसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती, इसलिए इसे किसी भी सूरत में कानूनी संरक्षण नहीं मिल सकता।

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