Friday, October 2, 2026
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Alarming Trend: बच्ची को पिता पर झूठा पॉक्सो केस करने का दबाव…जानिए कौन था सूत्रधार, अदालत की सख्ती भरे फैसले को जान लें

Alarming Trend: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक नाबालिग लड़की के लिए ₹1 लाख के मुआवजे का आदेश दिया है।

पिता को हाईकोर्ट ने दी जमानत

हाईकोर्ट जस्टिस के.के. रामकृष्णन ने आरोपी पिता को जमानत देते हुए विरुद्धनगर के जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे इस पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्ची को पहुंचे मानसिक आघात (Trauma) के लिए मुआवजे का भुगतान करें। अदालत ने पाया कि बाल कल्याण अधिकारियों द्वारा उस लड़की को अपने ही पिता के खिलाफ यौन शोषण (POCSO) के झूठे आरोप लगाने के लिए कथित तौर पर मजबूर किया गया था। यह मामला कानून और सुरक्षा प्रणालियों के दुरुपयोग तथा बाल कल्याण समितियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है।

मामला क्या था? (The Real Context)

  • पारिवारिक कलह: पिता को 16 अप्रैल, 2026 को POCSO अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। पिता के वकील ने दलील दी कि पिता ने बेटी को केवल दिनभर मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने के लिए डांटा था, जिससे पति-पत्नी के बीच अक्सर झगड़े होते थे।
  • हेल्पलाइन पर कॉल: माता-पिता के झगड़े को रुकवाने के लिए बच्ची ने 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन पर कॉल किया था।
  • अधिकारियों का दबाव: आरोप है कि हेल्पलाइन और बाल कल्याण समिति (CWC) के अधिकारियों ने बच्ची को घर के झगड़े सुलझाने के बजाय यह शिकायत देने के लिए मजबूर किया कि उसके पिता ने उसे “गलत तरीके से छुआ” (Bad Touch) है। बच्ची को पांच दिनों तक शेल्टर होम में रखकर डराया-धमकाया गया।

कोर्ट का रुख और सीआरपीसी की धारा 164 का बयान

  • जब अदालत ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बच्ची के बयान (Section 164 CrPC) की जांच की, तो सच्चाई सामने आई।
  • बिना झिझक सच बोला: लड़की ने स्पष्ट किया कि उसने केवल माता-पिता का झगड़ा शांत कराने के लिए कॉल किया था, लेकिन अधिकारियों ने उस पर पिता के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने का दबाव डाला।
  • कोर्ट की टिप्पणी: “पीड़िता का बयान प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि उस पर याचिकाकर्ता (पिता) के खिलाफ आरोप लगाने के लिए दबाव और जबरदस्ती की गई थी।

“चिंताजनक चलन” और मुख्य सचिव को निर्देश

जस्टिस रामकृष्णन ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे एक “चिंताजनक चलन” (Alarming Trend) बताया, जहाँ बच्चे घरेलू विवादों की शिकायत लेकर आते हैं, लेकिन अधिकारी उन्हें परिवार के सदस्यों के खिलाफ ही यौन दुराचार के आरोप लगाने के लिए प्रेरित करते हैं।

अदालत ने निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं

  • चाइल्ड हेल्पलाइन का उद्देश्य: “1098 हेल्पलाइन का उद्देश्य संकट में फंसे बच्चों की सुरक्षा करना और उन्हें सहायता देना है। इसे बच्चों को मानसिक आघात और बदनामी देने के लिए दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
  • दिशानिर्देश (Guidelines) बनाने का आदेश: तमिलनाडु के मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया है कि वे हेल्पलाइन, बाल कल्याण समितियों, शेल्टर होम और पुलिस कर्मियों के लिए सख्त गाइडलाइंस बनाएं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चों के बयान निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से दर्ज किए जाएं और उन्हें ट्यूटर (सिखाया) न जाए।
  • आईजी को जांच के आदेश: आईजीपी (दक्षिण क्षेत्र) को इस मामले में शामिल दोषी अधिकारियों के खिलाफ जांच करने का निर्देश दिया गया है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणमुख्य तथ्य / निर्देश
अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ)।
मुआवजा राशिपीड़ित बच्ची को ₹1 लाख (जिला कलेक्टर द्वारा देय)।
मूल कारणमाता-पिता के झगड़े के कारण 1098 पर कॉल किया गया, जिसे POCSO केस में बदल दिया गया।
अदालत का संदेशझूठे आरोपों के परिणाम विनाशकारी होते हैं; बच्चों का इस्तेमाल औजार के रूप में न करें।

सुरक्षा तंत्र के आत्मनिरीक्षण का समय

यह फैसला आंखें खोलने वाला है। यह दर्शाता है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून (जैसे पोक्सो) और प्रणालियां (जैसे 1098) कभी-कभी अति-उत्साही या असंवेदनशील अधिकारियों के कारण निर्दोष परिवारों को तबाह कर सकती हैं। अदालत ने न केवल एक पिता को न्याय दिया, बल्कि उस बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा की भी रक्षा की जिसे कानून का डर दिखाकर मोहरा बनाया जा रहा था।

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