Darshan Srinivas: कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में ‘मीडिया ट्रायल’ (Trial by Media) पर सख्त रुख अपनाया है।
कन्नड़ अभिनेता और निर्माता दर्शन श्रीनिवास का मामला
हाईकोर्ट के जस्टिस सचिन शंकर मगादुम की एकल पीठ ने अभिनेता दर्शन की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को तुरंत दोषी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ दंडात्मक और विनियामक (Regulatory) कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। कन्नड़ अभिनेता और निर्माता दर्शन श्रीनिवास (Darshan Srinivas) से जुड़े एक मर्डर केस के मामले में अदालत ने साफ कहा कि प्रेस एक ‘वॉचडॉग’ (चौकीदार) है, लेकिन वह खुद ‘जज, जूरी और जल्लाद’ (Judge, Jury and Executioner) नहीं बन सकता।
टीवी चैनल व डिजिटल मीडिया की आक्रामक अभियान
यह मामला अभिनेता दर्शन श्रीनिवास के खिलाफ चल रही एक हत्या की जांच और अदालती कार्यवाही से जुड़ा है। दर्शन ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर शिकायत की थी कि सिविल कोर्ट के निषेधाज्ञा (Injunction Orders) और हाई कोर्ट के पुराने आदेशों के बावजूद, टीवी चैनल और डिजिटल मीडिया उनके खिलाफ आक्रामक और पूर्वाग्रही अभियान चला रहे हैं।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “स्टूडियो की चकाचौंध में न्याय प्रभावित नहीं हो सकता”
- जस्टिस सचिन शंकर मगादुम ने लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के बीच संतुलन को रेखांकित किया।
- लोकतंत्र के लिए खतरा: “वाक स्वतंत्रता (Freedom of Speech) एक मूल्यवान संवैधानिक मूल्य है। लेकिन जब यह मीडिया-संचालित फैसले (Media-driven Adjudication) का रूप ले लेती है, तो यह लोकतंत्र की रक्षक नहीं, बल्कि उसके लिए खतरा बन जाती है।”
- प्रक्रिया का मखौल: अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि टीवी चैनलों ने बकायदा अदालत कक्ष के दृश्यों को री-क्रिएट (Virtual Recreation) करना शुरू कर दिया था, जहां सिर्फ जज का चेहरा छिपाकर आरोपियों और वकीलों को लाइव दिखाया जाता था और समानांतर सुनवाई की जाती थी।
- न्याय पर ग्रहण: “अदालतें न्याय की प्रक्रिया पर स्टूडियो की लाइटों की चकाचौंध का साया नहीं पड़ने दे सकतीं।”
वैधानिक नियमों और अदालती आदेशों का उल्लंघन
- हाई कोर्ट ने पाया कि जांच के शुरुआती चरण में ही चार्जशीट की गोपनीय सामग्री को चुनिंदा तरीके से लीक करना और प्रसारित करना पूरी तरह गैर-कानूनी है।
- प्रोग्राम कोड का उल्लंघन: ‘केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995’ का प्रोग्राम कोड स्पष्ट रूप से ऐसी सामग्री के प्रसारण को रोकता है जो मानहानिकारक हो, अदालत की अवमानना करती हो या किसी व्यक्ति की छवि बिगाड़ने के लिए बनाई गई हो।
- आईटी एक्ट का उल्लंघन: इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया मध्यस्थों (Intermediaries) के लिए यह अनिवार्य है कि कोर्ट या सरकार के निर्देश के 36 घंटे के भीतर ऐसी अवैध सामग्री को हटाएं।
- लापरवाही पर फटकार: कोर्ट ने कहा कि सक्षम अधिकारियों (मंत्रालयों) द्वारा दर्शन की औपचारिक शिकायतों पर कार्रवाई न करना पूरी तरह से मनमाना और कानून के खिलाफ था।
हाई कोर्ट के कड़े निर्देश
- अदालत ने मामले की निष्पक्षता और आरोपी के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार’ को बहाल करने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए।
- तत्काल जांच और रोक: दोनों केंद्रीय मंत्रालय दर्शन के खिलाफ प्रसारित डिजिटल और टीवी कंटेंट की तुरंत जांच करें। यदि यह प्रोग्राम कोड के नियम 6 का उल्लंघन है, तो केबल टीवी नेटवर्क एक्ट की धारा 19 और 20 के तहत चैनलों के प्रसारण को तत्काल निलंबित, प्रतिबंधित या बंद किया जाए।
- समय सीमा: मंत्रालयों को दर्शन की शिकायत पर पूरी जांच कर 6 सप्ताह के भीतर वैधानिक आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया है।
- अनुपालन रिपोर्ट: कोर्ट ने प्राधिकारियों को 12 सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट में एक व्यापक अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करने को कहा है।
- अवमानना की छूट: कोर्ट ने याचिकाकर्ता दर्शन को छूट दी है कि वे अदालती आदेशों का उल्लंघन करने वाले मीडिया घरानों के खिलाफ स्वतंत्र रूप से ‘अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971’ (Contempt of Courts Act) के तहत कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| कानूनी पहलू | विवरण |
| अदालत और जज | कर्नाटक उच्च न्यायालय (जस्टिस सचिन शंकर मगादुम)। |
| याचिकाकर्ता | कन्नड़ अभिनेता दर्शन श्रीनिवास। |
| मुख्य मुद्दा | आपराधिक मामले में मीडिया द्वारा समानांतर अदालत (Media Trial) चलाना और कोर्ट रूम री-क्रिएशन करना। |
| न्यायालय का आदेश | I&B और MeitY मंत्रालय उल्लंघन करने वाले चैनलों के प्रसारण पर तुरंत रोक या निलंबन की कार्रवाई करें। |
आरोपी के अधिकारों की रक्षा
यह ऐतिहासिक आदेश स्पष्ट करता है कि प्रेस को अभिव्यक्ति की आजादी जरूर है, लेकिन वह किसी विचाराधीन (Sub-judice) मामले में जनता के बीच पहले से ही किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करने का नैरेटिव नहीं बना सकता। इससे अदालतों की तटस्थता प्रभावित होने का खतरा रहता है और निष्पक्ष न्याय की नींव कमजोर होती है।

