Monday, August 17, 2026
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Partition Suit: बुजुर्ग माता-पिता अपनी खरीदी संपत्ति का आनंद लें…बच्चे भी नहीं डाल सकते खलल…क्यूं स्थगन आदेश अदालत से जारी, पढ़ें केस

Partition Suit: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक संपत्ति विवादों और बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को लेकर एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

90 वर्षीय पिता के पक्ष में स्थगन आदेश बरकरार

हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक जैन की एकल पीठ ने एक 90 वर्षीय पिता के पक्ष में निचली अदालत द्वारा हटाए गए स्थगन आदेश (Injunction/Stay) को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाना “न्याय का मजाक” होगा और उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में उनके “मूल मानवाधिकारों” का हनन होगा। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बच्चे अपनी मर्जी से जब चाहें तब अदालत आकर अपने बुजुर्ग माता-पिता को उनकी ही संपत्ति का उपयोग करने या उसे बेचने (Alienating) से नहीं रोक सकते।

संपतियों के लिए दायर मामले की हुई सुनवाई

यह मामला मुकेश कुमार केवट और जय कुमार केवट द्वारा दायर दो जुड़ी हुई याचिकाओं से संबंधित है। विवाद एक विभाजन के मुकदमे (Partition Suit) से शुरू हुआ था, जिसे जय कुमार ने अपने 90 वर्षीय पिता गया प्रसाद केवट और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ कुछ संपत्तियों को लेकर दायर किया था।

मामला क्या था? (Background of the Dispute)

  • बेटों का दावा था कि हालांकि राजस्व रिकॉर्ड में संपत्तियां पिता के नाम पर दर्ज हैं, लेकिन ये जमीनें पूर्वजों से विरासत में मिली थीं। इसलिए, यह एक सहदायिक संपत्ति (Coparcenary Property) है, जिसमें सभी बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है।
  • शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने पिता को चार संपत्तियों (सर्वे नंबर 288/1, 71/1, 277/5 और 446) को बेचने, निर्माण करने या उनका कब्जा बदलने से रोकने का अंतरिम आदेश (Stay Order) दे दिया था।
  • इसके बाद, निचली अपीलीय अदालत ने इस आदेश को आंशिक रूप से बदलते हुए दो जमीनों (सर्वे नंबर 288/1 और 71/1) से स्टे हटा दिया था, क्योंकि प्रथम दृष्ट्या (Prima Facie) वे सहदायिक या पैतृक संपत्ति प्रतीत नहीं हो रही थीं। बेटों ने अपीलीय अदालत के इसी फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “बात-बात पर कोर्ट नहीं दौड़ सकते बच्चे”

  • बेटों की याचिकाओं को पूरी तरह खारिज करते हुए जस्टिस विवेक जैन ने पारिवारिक नैतिकता और कानूनी सिद्धांतों पर गंभीर टिप्पणियां कीं।
  • कड़ा कानूनी मापदंड आवश्यक: “बच्चों द्वारा अपने वृद्ध माता-पिता को उनकी अपनी संपत्ति के प्रबंधन से रोकने के लिए अदालत के सामने एक बेहद मजबूत ‘प्रथम दृष्ट्या मामला’ (Strong Prima Facie Case) साबित करना आवश्यक है।”
  • अधिकारों का हनन गलत: “बात-बात पर (At the drop of a hat) बच्चे अदालत में आकर अपने बूढ़े माता-पिता को अपनी संपत्ति बेचने या उसका आनंद लेने से नहीं रोक सकते।”
  • पीडिंग्स (दलीलें) काफी नहीं: कोर्ट ने साफ किया कि केवल कागजों पर यह लिख देने (Bare Pleadings) मात्र से बच्चों के पक्ष में पैतृक या सहदायिक अधिकार का कोई स्वतः अनुमान (Presumption) नहीं लगाया जा सकता।

जन्मसिद्ध अधिकार’ के पारंपरिक सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट की नजीर

  • हाई कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत कानूनी आधार देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया।
  • युधिष्ठिर बनाम अशोक कुमार (AIR 1987 SC 558): इस मामले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने दोहराया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के लागू होने के बाद, विरासत में मिली संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार का पारंपरिक सिद्धांत हर मामले में स्वचालित रूप से लागू नहीं होता।
  • समय का महत्व: विवादित संपत्तियों में से एक संपत्ति को साल 1961 में (यानी 1956 के कानून के लागू होने के बाद) अधिग्रहित किया गया था। इसलिए, शुरुआती चरण में इस पर स्वचालित सहदायिक अधिकार का दावा पूरी तरह संदिग्ध है। दूसरी संपत्ति के मामले में भी भाई यह साबित करने में असफल रहे कि वह जमीन वास्तव में पैतृक थी।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

कानूनी बिंदुहाई कोर्ट का दृष्टिकोण
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विवेक जैन (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय)
मुख्य पक्षकारजय कुमार केवट (बेटा) बनाम गया प्रसाद केवट (90 वर्षीय पिता)
अदालत का संदेशजब तक पैतृक संपत्ति होना पूरी तरह साबित न हो, तब तक माता-पिता के संपत्ति अधिकारों को बाधित नहीं किया जा सकता।
कानूनी स्थितिहिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के बाद अर्जित या विरासत में मिली हर संपत्ति पर बच्चों का स्वचालित अधिकार नहीं होता।

बुजुर्गों के सम्मान और वित्तीय सुरक्षा की रक्षा

यह निर्णय समाज के उस बढ़ते चलन पर रोक लगाता है जहाँ बच्चे माता-पिता के जीवित रहते ही केवल इस डर से उनकी संपत्ति पर स्टे लगवा देते हैं कि कहीं पिता अपनी मर्जी से संपत्ति किसी एक बेटे या किसी तीसरे पक्ष को न दे दें। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून बुजुर्गों को उनके जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी संपत्ति का शांतिपूर्वक उपभोग करने और उसकी मर्जी के मुताबिक व्यवस्था करने की पूरी आजादी देता है।

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