Dignity of Judiciary: पश्चिम बंगाल में न्यायपालिका और सोशल मीडिया के बीच बढ़ते टकराव को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने बेहद सख्त कदम उठाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जय सेनगुप्ता की एकल पीठ ने यह आदेश एक बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई के दौरान 21 मई 2026 को पारित किया। अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि वे न्यायाधीशों (Judges) और न्यायिक कार्यवाही को निशाना बनाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) तैयार कर कोर्ट में पेश करें।
हाई कोर्ट की नाराजगी और चिंता का कारण
अदालत को सूचित किया गया था कि यूट्यूब (YouTube) और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे वीडियो प्रसारित किए जा रहे हैं जो कोर्ट और जजों पर बेबुनियाद और अपमानजनक लांछन (Wanton Aspersions) लगा रहे हैं। अदालत ने अपनी टिप्पणी में बेहद चिंता जताते हुए कहा, यहां तक कि जिस दिन यह पीठ (Bench) बैठी भी नहीं थी, उस दिन भी ऐसी बातें फैलाई गईं मानो बंद कमरों के भीतर कोई प्रतिकूल कदम उठाए जा रहे हों। इसके अलावा, आम तौर पर इस अदालत के न्यायाधीशों के खिलाफ मानहानिकारक और अवमाननापूर्ण (Defamatory and Contumacious) बयानबाजी की गई। कुछ अन्य वीडियो भी थे जो वास्तव में बेहद परेशान करने वाले थे।
किस मामले की सुनवाई के दौरान आया यह निर्देश?
- यह पूरा विवाद पद्म श्री से सम्मानित हिंदू भिक्षु स्वामी प्रदीप्तानंद उर्फ कार्तिक महाराज (Kartik Maharaj) के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले से जुड़ा है।
- मूल मामला: नबग्राम पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के अनुसार, आरोप है कि कार्तिक महाराज ने साल 2013 में एक महिला को भारत सेवाश्रम संघ के तहत एक स्कूल में शिक्षण कार्य (Teaching Job) की पेशकश करने के बाद उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। पीड़िता ने उन पर जबरन गर्भपात (Forced Abortion) कराने और आपराधिक रूप से डराने-धमकाने का भी आरोप लगाया है।
- याचिकाकर्ता का स्टैंड: पिछले साल दायर अपनी याचिका में कार्तिक महाराज ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा राजनीतिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है।
- इन-कैमरा प्रोसीडिंग की मांग: महाराज ने अदालत से इस मामले की सुनवाई बंद कमरे में (In-Camera Proceedings) कराने की मांग की थी। इसी अर्जी के दौरान उन्होंने और उनके वकीलों ने कोर्ट का ध्यान उन वीडियो की तरफ खींचा, जिनमें जजों और खुद याचिकाकर्ता को सोशल मीडिया पर ट्रोल और टारगेट किया जा रहा था।
SOP और आगे की रूपरेखा
- अदालत ने माना कि सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ इस तरह की सुनियोजित बयानबाजी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। इसलिए पुलिस के पास ऐसे मामलों से तुरंत निपटने के लिए एक तय कानूनी गाइडलाइन (SOP) होनी चाहिए।
- अदालती प्रतिनिधित्व: याचिकाकर्ता (कार्तिक महाराज) की ओर से वरिष्ठ वकील बिल्वदल भट्टाचार्य, मयूख मुखर्जी, साग्निका बनर्जी, मेघा दत्ता और तमोघना प्रमाणिक पेश हुए। राज्य सरकार का पक्ष वकील के. भट्टाचार्य ने रखा।
- अगली सुनवाई: कलकत्ता हाई कोर्ट अब इस मामले और पुलिस द्वारा तैयार की जाने वाली SOP की समीक्षा 22 जून 2026 को करेगी।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी बिंदु | विवरण और अदालती निर्देश |
| अदालत / जज | कलकत्ता हाई कोर्ट, जस्टिस जय सेनगुप्ता |
| मूल याचिका | स्वामी प्रदीप्तानंद (कार्तिक महाराज) द्वारा बलात्कार के मामले को रद्द करने की मांग। |
| प्रशासनिक निर्देश | पश्चिम बंगाल के DGP को जजों को निशाना बनाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट के खिलाफ SOP बनाने का आदेश। |
| आगामी तारीख | मामले की अगली सुनवाई 22 जून 2026 को तय की गई है। |
निष्कर्ष (Legal Takeaway)
हाल के दिनों में देश की विभिन्न अदालतों ने इस बात पर चिंता जताई है कि संवेदनशील मुकदमों में मनमुताबिक फैसला न आने या सुनवाई के दौरान जजों को सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत रूप से ट्रोल किया जाता है। कलकत्ता हाई कोर्ट का DGP को SOP बनाने का यह निर्देश अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) और न्यायपालिका की गरिमा (Dignity of Judiciary) के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचने की कोशिश है, ताकि कोई भी सोशल मीडिया के जरिए अदालती कार्यवाही को प्रभावित या डरा न सके।

