Suspended Judge’s Plea: गुजरात हाई कोर्ट ने एक निलंबित अतिरिक्त जिला जज जी.आर. सोनी की याचिका को खारिज कर दिया।
न्यायपालिका की निष्पक्षता पर लगाए गए आरोपों पर कोर्ट की सख्ती
हाईकोर्ट के जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओडेद्रा की खंडपीठ ने 8 मई, 2026 को यह कड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने जज की इस हरकत को “अदालत को बदनाम करने और उसकी गरिमा को कम करने की कोशिश” करार दिया। अदालत ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। यह मामला न केवल एक न्यायिक अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाता है, बल्कि उच्च न्यायपालिका की निष्पक्षता पर लगाए गए आरोपों पर कोर्ट की सख्ती को भी दर्शाता है।
जज जी.आर. सोनी पर लगे गंभीर आरोप
- विभागीय जांच (Departmental Inquiry) के अनुसार, अतिरिक्त जिला जज पर कई चौंकाने वाले आरोप हैं।
- अनुचित संबंध: एक आउटसोर्स क्लर्क के साथ “घनिष्ठ संबंध” रखना और उसके बिजनेस वेंचर के लिए कोर्ट स्टाफ का दुरुपयोग करना।
- निगरानी में बाधा: सीसीटीवी कैमरों को काम करने से रोकना या उन्हें ब्लॉक करवाना।
- अदालती गरिमा का उल्लंघन: कोर्ट की कार्यवाही के दौरान मोबाइल का उपयोग करना और प्रार्थना (Prayers) में व्यस्त रहना, जिससे नियमित सिटिंग में अनियमितता आई।
- गवाहों को धमकाना: चपरासियों (Peons) को उनके बयान वापस लेने के लिए डराना।
आपराधिक अवमानना का कारण
याचिका खारिज होने का मुख्य कारण वह लिखित सबमिशन था जो याचिकाकर्ता जज ने फैसला सुरक्षित होने के बाद स्वतंत्र रूप से दाखिल किया था। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ जज का सभी शाखाओं पर “अच्छा नियंत्रण” है। वह वरिष्ठ जज अपने जूनियर जजों को “निर्देश/दबाव” देने में सक्षम हैं। कोर्ट की टिप्पणी: “ये दावे स्पष्ट रूप से आपराधिक अवमानना हैं। यह न केवल एक जज, बल्कि पूरी न्यायपालिका की साख को गिराने और न्याय प्रशासन में बाधा डालने का प्रयास है।”
कोर्ट का कानूनी फैसला: जांच के लिए लिखित शिकायत जरूरी नहीं
- याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सी कवीना ने तर्क दिया था कि बिना किसी लिखित शिकायत या हलफनामे के विभागीय जांच शुरू नहीं की जा सकती। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
- स्वतंत्र शक्ति: हाई कोर्ट के पास अपने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई शुरू करने की स्वतंत्र और पूर्ण शक्ति है।
- नियम: गुजरात सिविल सेवा (अनुशासन और अपील) नियम, 1971 के तहत जांच के लिए किसी बाहरी शिकायत की आवश्यकता नहीं है; यदि अनुशासनात्मक प्राधिकारी (High Court) को लगता है कि आधार पर्याप्त हैं, तो वह जांच शुरू कर सकता है।
- गाइडलाइन्स का स्पष्टीकरण: मंत्रालय की जिन गाइडलाइन्स का हवाला दिया गया, वे केवल असंतुष्ट मुकदमों (Litigants) द्वारा की गई शिकायतों पर लागू होती हैं, हाई कोर्ट की अपनी शक्तियों पर नहीं।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | कोर्ट का आदेश / टिप्पणी |
| याचिकाकर्ता | जी.आर. सोनी (निलंबित अतिरिक्त जिला जज)। |
| कोर्ट का आदेश | याचिका खारिज; आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश। |
| अगली तारीख | 15 जून, 2026 (याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से अवमानना बेंच के सामने पेश होना होगा)। |
| सिद्धांत | न्यायिक अधिकारी का आचरण संदेह से परे होना चाहिए; कोर्ट की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता। |
न्यायपालिका की शुचिता का संरक्षण
गुजरात हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वह खुद एक जज ही क्यों न हो। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि अपने खिलाफ चल रही जांच से बचने के लिए उच्च न्यायालय के जजों पर पक्षपात के आरोप लगाना ‘स्कैंडलाइजिंग द कोर्ट’ की श्रेणी में आता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

