Special Marriage Act: दिल्ली हाई कोर्ट ने अंतरधार्मिक प्रेम संबंधों (Interfaith Relationships) और सामाजिक रूढ़ियों को लेकर एक बेहद भावुक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
विशेष विवाह अधिनियम को लेकर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस विमल कुमार यादव की एकल पीठ ने 11 मई 2026 को दिए अपने फैसले में माना कि कथित पीड़िता घटना के समय बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत शादी की थी, लेकिन बाद में पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण उसने अदालत में अपने बयान बदल लिए थे। अदालत ने साल 2008 से अपहरण और बलात्कार के मामले में दोषी करार दिए गए एक मुस्लिम व्यक्ति को बाइज्जत बरी (Acquit) करते हुए कहा कि “गहरे धड़ों में बंटा भारतीय समाज प्रेमियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता।”
भारतीय समाज के बंटवारे पर हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
अदालत ने देश में अंतरधार्मिक और अंतर्जातीय संबंधों को लेकर समाज के संकुचित दृष्टिकोण पर गहरी चिंता व्यक्त की। कहा, सभी वर्गों में खंडित, स्तरित और गहराई से विभाजित भारतीय समाज व्यावहारिक रूप से युवा प्रेमियों को अपना जीवनसाथी चुनने की कोई गुंजाइश नहीं देता। यदि समाज द्वारा तय की गई इन सीमाओं को तोड़ने का प्रयास किया जाता है, तो इसके परिणाम इतने गंभीर होते हैं कि कई बार उन्हें अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। अदालत ने आगे जोड़ा, ऐसे गहराई से बंटे समाज में, जिसने न केवल जीवन, धर्म, जाति, क्षेत्र या भाषा को विभाजित किया है, बल्कि एक ही सामाजिक समूह के भीतर भी उप-विभाजन पैदा कर दिए हैं, एक अंतर-धार्मिक विवाह किसी पाप से कम नहीं माना जाता। इसी सामाजिक ताने-बाने का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि लड़की पर अपने परिवार का इतना भारी दबाव था कि स्वेच्छा से भागकर शादी करने और दो महीने तक साथ रहने के बाद भी वह मुकदमे के दौरान मुकर गई और सारा दोष पुरुष पर मढ़ दिया।
अदालत द्वारा दोषसिद्धि रद्द करने के मुख्य आधार
पीड़िता की मर्जी और आचरण (Consensual Relationship): मामला साल 2004 का है, जब यह जोड़ा दिल्ली से भागकर पश्चिम बंगाल गया था। कोर्ट ने कहा कि यात्रा के दौरान और शादी करने तक लड़की के पास शोर मचाने या मदद मांगने के पर्याप्त अवसर थे। उसकी चुप्पी यह साबित करती है कि वह अपनी मर्जी और इच्छा से युवक के साथ गई थी। रिकॉर्ड पर मौजूद स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 का विवाह प्रमाणपत्र भी इसकी तस्दीक करता है।
उम्र का निर्धारण और चिकित्सा साक्ष्य (Ossification Test): मेडिकल रिपोर्ट: अस्थिकरण परीक्षण (Ossification Test) के अनुसार, घटना के समय लड़की की उम्र 14 से 16 वर्ष के बीच बताई गई थी।
मार्जिन ऑफ एरर: कोर्ट ने कानूनन प्लस/माइनस 2 वर्ष का ‘मार्जिन ऑफ एरर’ (त्रुटि का अंतर) लागू करते हुए माना कि उसकी अधिकतम उम्र 18 वर्ष मानी जा सकती है, जो कि सहमति से संबंध बनाने और शादी करने की कानूनी उम्र है।
स्वयं के बयान: लड़की ने स्वयं मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए बयान (धारा 164 CrPC) और मेडिकल जांच (MLC) के दौरान अपनी उम्र 18 वर्ष बताई थी।
2004 का तत्कालीन कानून और वैवाहिक अपवाद: अदालत ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी बिंदु स्पष्ट किया कि भले ही लड़की की उम्र को 18 से थोड़ा कम मान लिया जाए, तो भी साल 2004 के तत्कालीन कानून (बलात्कार पर आईपीसी की धारा 375) के अनुसार, यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है और पत्नी की उम्र 15 वर्ष से कम नहीं है, तो उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जाता था (वैवाहिक बलात्कार का अपवाद)। चूंकि दोनों विवाहित थे, इसलिए बलात्कार का आरोप वैसे भी नहीं टिकता।
मामले का सफर (Case Timeline)
- 2004: जोड़ा दिल्ली से पश्चिम बंगाल भागा और शादी की। लड़की के पिता ने दिल्ली में अपहरण की एफआईआर दर्ज कराई, जिसके बाद दोनों को वापस लाया गया।
- 2008: निचली अदालत (Trial Court) ने युवक को अपहरण और बलात्कार का दोषी मानते हुए सजा सुनाई।
- 2009: दोषी युवक ने अपनी सजा के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की।
- 2026 (वर्तमान): दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी सबूतों को देखने के बाद युवक को आरोपों से पूरी तरह मुक्त (बरी) कर दिया।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी बिंदु | विवरण और अदालती रुख |
| सुनवाई करने वाले न्यायाधीश | जस्टिस विमल कुमार यादव |
| बचाव पक्ष के वकील | एडवोकेट समर सिंह कछवाहा, अर्श रनपाल, कविता विनायक और यश दद्रीवाल |
| अदालत का निष्कर्ष | लड़की ने सामाजिक और पारिवारिक दबाव के कारण अदालत में झूठी गवाही दी थी। |
| अंतिम फैसला | दोषसिद्धि रद्द; मुस्लिम पति को सभी आपराधिक आरोपों से बाइज्जत बरी किया गया। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे सामाजिक प्रतिष्ठा और झूठी शान (Honor) के नाम पर परिवार खुद अपनी बेटियों पर दबाव डालकर आपसी सहमति के प्रेम संबंधों को ‘अपराध’ का रूप दे देते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने न केवल एक बेकसूर व्यक्ति को 18 साल पुराने कानूनी दंश से मुक्ति दी, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के उस प्रगतिशील रुख को भी दोहराया जो वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी पसंद से जीने के अधिकार की रक्षा करता है।

